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SIMI Ban Extension: सिमी पर प्रतिबंध पांच साल बढ़ाए जाने के फैसले पर लगी मुहर; न्यायिक अधिकरण का बड़ा फैसला
Wed, 07 Aug 2024 09:54 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
न्यूज डेस्क, अमर उजाला
Published by: पवन पांडेय
Updated Wed, 07 Aug 2024 09:54 PM IST
सार
न्यायिक अधिकरण ने स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) पर लगाए गए प्रतिबंध को पांच साल के लिए बढ़ाए जाने की पुष्टि की है। इसके साथ ही अधिकरण ने कहा कि संगठन ने इस्लाम के लिए 'जेहाद' के अपने उद्देश्य को नहीं छोड़ा है।
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सिमी पर प्रतिबंध पांच साल बढ़ाए जाने के फैसले पर लगी मुहर
- फोटो : ANI
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विस्तार
स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया यानि सिमी ने इस्लाम के लिए 'जेहाद' के अपने उद्देश्य को नहीं छोड़ा है और यह भारत में इस्लामी शासन की स्थापना के लिए काम करना जारी रखेगा। इस वजह से न्यायिक अधिकरण ने सिमी पर लगाए गए प्रतिबंध को पांच साल के लिए बढ़ाए जाने की पुष्टि की है। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की सदस्यता वाले न्यायिक अधिकरण का गठन गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत किया गया था, जब केंद्र ने 29 जनवरी, 2024 को सिमी पर प्रतिबंध को पांच साल के लिए बढ़ाने का फैसला किया था।
न्यायिक अधिकरण सिमी पर प्रतिबंध की घोषणा की पुष्टि की
दरअसल न्यायिक अधिकरण का गठन 16 फरवरी को ये फैसला लेने के लिए किया गया था कि सिमी को गैरकानूनी संगठन घोषित करने के लिए पर्याप्त कारण हैं या नहीं। एक आधिकारिक अधिसूचना में कहा गया है कि 24 जुलाई को न्यायिक अधिकरण ने यूएपीए की धारा 4 की उपधारा (3) की तरफ से प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए सिमी पर प्रतिबंध की घोषणा की पुष्टि करते हुए एक आदेश पारित किया।
सिमी पर प्रतिबंध के कई कारण- न्यायिक अधिकरण
न्यायिक अधिकरण ने सिमी पर प्रतिबंध की पुष्टि के लिए कई कारणों का हवाला देते हुए कहा कि यह समूह प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस/दाइश के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए भारत में इस्लामी शासन की स्थापना के लिए काम करना जारी रखता है। अधिसूचना में कहा गया है कि सिमी के घोषित उद्देश्य इस्लाम के लिए 'जेहाद' (धार्मिक युद्ध), राष्ट्रवाद का विनाश और इस्लामी शासन या खिलाफत की स्थापना, इस्लाम के प्रचार में छात्रों और युवाओं का उपयोग करना और 'जेहाद' के लिए समर्थन प्राप्त करना है।
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'इस्लामी शासन के गठन पर भी जोर देता है सिमी'
सिमी इस्लामी इंकलाब के माध्यम से शरीयत आधारित इस्लामी शासन के गठन पर भी जोर देता है और यह राष्ट्र राज्य, साथ ही संविधान या धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में विश्वास नहीं करता है और यह मूर्ति पूजा को पाप मानता है और इसका पवित्र कर्तव्य इसे समाप्त करना है। सिमी पर प्रतिबंध बढ़ाते हुए सरकार ने कहा था कि समूह आतंकवाद को बढ़ावा देने और देश में शांति और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने में शामिल रहा है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश - 10 राज्य सरकारों ने यूएपीए के प्रावधानों के तहत सिमी को गैरकानूनी संगठन घोषित करने की सिफारिश की है।
'देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं सिमी'
गृह मंत्रालय ने कहा था कि सिमी अपनी विध्वंसक गतिविधियों को जारी रखे हुए है और अपने कार्यकर्ताओं को फिर से संगठित कर रहा है जो अभी भी फरार हैं, यह सांप्रदायिक, वैमनस्य पैदा करके, राष्ट्र विरोधी भावनाओं का प्रचार करके और उग्रवाद का समर्थन करके अलगाववाद को बढ़ावा देकर लोगों के दिमाग को प्रदूषित करके देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बाधित कर रहा है और ऐसी गतिविधियाँ कर रहा है जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं।
2001 में पहली बार सिमी पर लगा था प्रतिबंध
बता दें कि सिमी को पहली बार 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान गैरकानूनी घोषित किया गया था और तब से प्रतिबंध को समय-समय पर बढ़ाया गया है। सिमी की स्थापना 25 अप्रैल, 1977 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में युवाओं और छात्रों के एक अग्रणी संगठन के रूप में की गई थी, जो जमात-ए-इस्लामी-हिंद (जेईआईएच) में विश्वास रखते थे। हालांकि, संगठन ने 1993 में एक प्रस्ताव के माध्यम से खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया।
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न्यायिक अधिकरण सिमी पर प्रतिबंध की घोषणा की पुष्टि की
दरअसल न्यायिक अधिकरण का गठन 16 फरवरी को ये फैसला लेने के लिए किया गया था कि सिमी को गैरकानूनी संगठन घोषित करने के लिए पर्याप्त कारण हैं या नहीं। एक आधिकारिक अधिसूचना में कहा गया है कि 24 जुलाई को न्यायिक अधिकरण ने यूएपीए की धारा 4 की उपधारा (3) की तरफ से प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए सिमी पर प्रतिबंध की घोषणा की पुष्टि करते हुए एक आदेश पारित किया।
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सिमी पर प्रतिबंध के कई कारण- न्यायिक अधिकरण
न्यायिक अधिकरण ने सिमी पर प्रतिबंध की पुष्टि के लिए कई कारणों का हवाला देते हुए कहा कि यह समूह प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन आईएसआईएस/दाइश के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए भारत में इस्लामी शासन की स्थापना के लिए काम करना जारी रखता है। अधिसूचना में कहा गया है कि सिमी के घोषित उद्देश्य इस्लाम के लिए 'जेहाद' (धार्मिक युद्ध), राष्ट्रवाद का विनाश और इस्लामी शासन या खिलाफत की स्थापना, इस्लाम के प्रचार में छात्रों और युवाओं का उपयोग करना और 'जेहाद' के लिए समर्थन प्राप्त करना है।
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'इस्लामी शासन के गठन पर भी जोर देता है सिमी'
सिमी इस्लामी इंकलाब के माध्यम से शरीयत आधारित इस्लामी शासन के गठन पर भी जोर देता है और यह राष्ट्र राज्य, साथ ही संविधान या धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था में विश्वास नहीं करता है और यह मूर्ति पूजा को पाप मानता है और इसका पवित्र कर्तव्य इसे समाप्त करना है। सिमी पर प्रतिबंध बढ़ाते हुए सरकार ने कहा था कि समूह आतंकवाद को बढ़ावा देने और देश में शांति और सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने में शामिल रहा है। आंध्र प्रदेश, गुजरात, झारखंड, केरल, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, उत्तर प्रदेश - 10 राज्य सरकारों ने यूएपीए के प्रावधानों के तहत सिमी को गैरकानूनी संगठन घोषित करने की सिफारिश की है।
'देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं सिमी'
गृह मंत्रालय ने कहा था कि सिमी अपनी विध्वंसक गतिविधियों को जारी रखे हुए है और अपने कार्यकर्ताओं को फिर से संगठित कर रहा है जो अभी भी फरार हैं, यह सांप्रदायिक, वैमनस्य पैदा करके, राष्ट्र विरोधी भावनाओं का प्रचार करके और उग्रवाद का समर्थन करके अलगाववाद को बढ़ावा देकर लोगों के दिमाग को प्रदूषित करके देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने को बाधित कर रहा है और ऐसी गतिविधियाँ कर रहा है जो देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं।
2001 में पहली बार सिमी पर लगा था प्रतिबंध
बता दें कि सिमी को पहली बार 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के दौरान गैरकानूनी घोषित किया गया था और तब से प्रतिबंध को समय-समय पर बढ़ाया गया है। सिमी की स्थापना 25 अप्रैल, 1977 को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में युवाओं और छात्रों के एक अग्रणी संगठन के रूप में की गई थी, जो जमात-ए-इस्लामी-हिंद (जेईआईएच) में विश्वास रखते थे। हालांकि, संगठन ने 1993 में एक प्रस्ताव के माध्यम से खुद को स्वतंत्र घोषित कर दिया।