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Politics: 'JPC पर भरोसा नहीं..', PM-CM को पद से हटाने के बिल पर बनी समिति का ओ'ब्रायन ने किया बहिष्कार
Fri, 29 Aug 2025 11:12 AM IST
निर्मल कांत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली।
Published by: निर्मल कांत
Updated Fri, 29 Aug 2025 11:12 AM IST
सार
Politics: प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री के जेल में 30 दिन रहने पर पद से हटाने संबंधी विधेयकों की जांच के लिए बनी जेपीसी का टीएमसी सांसद डेरेक ओ'ब्रायन ने बहिष्कार किया है। ओ'ब्रायन ने जेपीसी की निष्पक्षता पर सवाल उठाते हुए इसके पिछले उदाहरणों का हवाला दिया है। कई विपक्षी दलों ने समिति में शामिल न होने का फैसला किया है।
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तृणमूल कांग्रेस के नेता डेरेक ओ ब्रायन
- फोटो : एएनआई (फाइल)
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विस्तार
केंद्र सरकार की ओर से हाल ही में पेश किए गए उन विधेयकों पर एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) बनाई गई है, जो यह प्रावधान करते हैं कि अगर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आरोपों में तीस दिन तक जेल में रहते हैं, तो उन्हें पद से हटाया जा सकेगा। अब विपक्षी दलों ने इस समिति का बहिष्कार करने का एलान किया है।
तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने शुक्रवार को कहा कि इस तरह की जेपीसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जेपीसी आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों से भरी होती है, जिससे निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अपने ब्लॉग 'जेपीसी पर भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता – 6 कारण' में उन्होंने कई पुराने मामलों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि 1987 में बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए गठित जेपीसी का कई विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया था, क्योंकि उसमें कांग्रेस के सांसदों की बहुलता थी। उस वक्त टीडीपी और एजीपी जैसे दल भी इस समिति से दूरी बनाई थी, जो अब भाजपा के सहयोगी हैं। उस जेपीसी की रिपोर्ट को विपक्ष ने खारिज कर दिया था।
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उन्होंने 2013 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले की जांच के लिए बनी जेपीसी का भी जिक्र किया। उस समय राज्यसभा में नेता विपक्ष रहे अरुण जेटली ने इस समिति को 'बेकार की कवायद' और 'ध्यान भटकाने की कोशिश' बताया था। डेरेक ने यह भी बताया कि 2014 से अब तक 11 जेपीसी बनाई जा चुकी हैं, जिनमें से सात बार ये जेपीसी संसद सत्र के आखिरी दिन बनाई गईं। जबकि 2004 से 2014 के बीच केवल 3 जेपीसी बनी थीं और वे सत्र के दौरान सामान्य प्रक्रिया के तहत गठित हुई थीं। उन्होंने वक्फ संशोधन विधेयक पर बनी जेपीसी का भी उदाहरण दिया, जिसकी रिपोर्ट संसद में पेश करते समय विपक्ष की आपत्तियां हटाकर पेश की गईं। बाद में विरोध के कारण भाजपा सांसद मेधा कुलकर्णी को दोबारा दोपहर बाद एक संशोधित रिपोर्ट पेश करनी पड़ी।
ये भी पढ़ें: PM मोदी का दो दिवसीय जापान दौरा: क्वाड, बुलेट ट्रेन से AI तक.. भारत के एजेंडे में क्या, कौन से करार अहम? जानिए
ओ'ब्रायन ने यह भी कहा कि 1987 में बोफोर्स मामले पर जेपीसी बनाकर कांग्रेस 1989 में सत्ता से बाहर हो गई थी। इसी तरह 1992 में हर्षद मेहता घोटाले पर बनी जेपीसी के बाद कांग्रेस 1996 में चुनाव हार गई थी। भाजपा ने 2002-03 में केतन पारेख मामले में जेपीसी बनाई और कांग्रेस ने 2011 और 2013 में 2जी और वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले पर जेपीसी बनाई और इन सभी के बाद संबंधित पार्टियों को लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। डेरेक ने पूछा- क्या यह महज संयोग है या एक चलन बन गया है?
पिछले हफ्ते लोकसभा में सरकार ने तीन अहम विधेयक पेश किए- 'केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) बिल 2025', 'संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025' और 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025'। विपक्ष ने इनका जोरदार विरोध किया। विधेयकों की प्रतियां फाड़ी गईं और सत्ता व विपक्ष के सांसद आमने-सामने आ गए। इन विधेयकों को जेपीसी को सौंप दिया गया है। जेपीसी में लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य होंगे। समिति से कहा गया है कि वह शीतकालीन सत्र तक अपनी रिपोर्ट पेश करे। यह सत्र नवंबर के तीसरे सप्ताह में शुरू हो सकता है। फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने स्पष्ट कहा है कि वे इस जेपीसी में अपने किसी सांसद को नहीं भेजेंगे।
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तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) नेता डेरेक ओ'ब्रायन ने शुक्रवार को कहा कि इस तरह की जेपीसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि जेपीसी आमतौर पर सत्तारूढ़ पार्टी के सांसदों से भरी होती है, जिससे निष्पक्षता की उम्मीद नहीं की जा सकती। अपने ब्लॉग 'जेपीसी पर भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता – 6 कारण' में उन्होंने कई पुराने मामलों का हवाला दिया। उन्होंने बताया कि 1987 में बोफोर्स घोटाले की जांच के लिए गठित जेपीसी का कई विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया था, क्योंकि उसमें कांग्रेस के सांसदों की बहुलता थी। उस वक्त टीडीपी और एजीपी जैसे दल भी इस समिति से दूरी बनाई थी, जो अब भाजपा के सहयोगी हैं। उस जेपीसी की रिपोर्ट को विपक्ष ने खारिज कर दिया था।
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उन्होंने 2013 में अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले की जांच के लिए बनी जेपीसी का भी जिक्र किया। उस समय राज्यसभा में नेता विपक्ष रहे अरुण जेटली ने इस समिति को 'बेकार की कवायद' और 'ध्यान भटकाने की कोशिश' बताया था। डेरेक ने यह भी बताया कि 2014 से अब तक 11 जेपीसी बनाई जा चुकी हैं, जिनमें से सात बार ये जेपीसी संसद सत्र के आखिरी दिन बनाई गईं। जबकि 2004 से 2014 के बीच केवल 3 जेपीसी बनी थीं और वे सत्र के दौरान सामान्य प्रक्रिया के तहत गठित हुई थीं। उन्होंने वक्फ संशोधन विधेयक पर बनी जेपीसी का भी उदाहरण दिया, जिसकी रिपोर्ट संसद में पेश करते समय विपक्ष की आपत्तियां हटाकर पेश की गईं। बाद में विरोध के कारण भाजपा सांसद मेधा कुलकर्णी को दोबारा दोपहर बाद एक संशोधित रिपोर्ट पेश करनी पड़ी।
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ओ'ब्रायन ने यह भी कहा कि 1987 में बोफोर्स मामले पर जेपीसी बनाकर कांग्रेस 1989 में सत्ता से बाहर हो गई थी। इसी तरह 1992 में हर्षद मेहता घोटाले पर बनी जेपीसी के बाद कांग्रेस 1996 में चुनाव हार गई थी। भाजपा ने 2002-03 में केतन पारेख मामले में जेपीसी बनाई और कांग्रेस ने 2011 और 2013 में 2जी और वीवीआईपी हेलिकॉप्टर घोटाले पर जेपीसी बनाई और इन सभी के बाद संबंधित पार्टियों को लोकसभा चुनावों में हार का सामना करना पड़ा। डेरेक ने पूछा- क्या यह महज संयोग है या एक चलन बन गया है?
पिछले हफ्ते लोकसभा में सरकार ने तीन अहम विधेयक पेश किए- 'केंद्र शासित प्रदेशों की सरकार (संशोधन) बिल 2025', 'संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025' और 'जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक 2025'। विपक्ष ने इनका जोरदार विरोध किया। विधेयकों की प्रतियां फाड़ी गईं और सत्ता व विपक्ष के सांसद आमने-सामने आ गए। इन विधेयकों को जेपीसी को सौंप दिया गया है। जेपीसी में लोकसभा से 21 और राज्यसभा से 10 सदस्य होंगे। समिति से कहा गया है कि वह शीतकालीन सत्र तक अपनी रिपोर्ट पेश करे। यह सत्र नवंबर के तीसरे सप्ताह में शुरू हो सकता है। फिलहाल, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आम आदमी पार्टी और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) ने स्पष्ट कहा है कि वे इस जेपीसी में अपने किसी सांसद को नहीं भेजेंगे।
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