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पुराना रुतबा पाने के लिए धर्मनिरपेक्षता के अपने एजेंडे पर लौटेगा जदयू, भविष्य में भाजपा से टकराव के आसार
Tue, 29 Dec 2020 04:58 AM IST
देव कश्यप
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
हिमांशु मिश्र, नई दिल्ली
Published by: देव कश्यप
Updated Tue, 29 Dec 2020 04:58 AM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (फाइल फोटो)
- फोटो : PTI
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विधानसभा चुनाव के झटके से उबरने के लिए जदयू फिर से अपने सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता के पुराने एजेंडे पर लौटेगा। रविवार को हुई पार्टी की राष्ट्रीय परिषद में आम राय थी कि गठबंधन में भाजपा के मूल मुद्दे हावी रहने का पार्टी को नुकसान उठाना पड़ा। पार्टी ने भविष्य में पिछड़े मुसलमानों को फिर से साधने और भाजपा के हिंदूवादी एजेंडे से अपना अलग रुख तय करने का फैसला किया है।
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अरुणाचल प्रदेश में जदयू विधायकों के पाला बदल कर भाजपा में जाने के बाद हुई इस बैठक में खासतौर पर विधानसभा चुनाव में प्रदर्शन की समीक्षा हुई। बैठक में आम राय थी कि नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) पर पार्टी अलग रुख पेश नहीं कर सकी। इसके कारण जदयू के साथ रहने वाला मुसलमानों का एक वर्ग इस बार विपक्षी महागठबंधन और एआईएमआईएम के साथ चला गया।
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हिंदूवादी एजेंडे पर टकराव तय
जदयू के रुख के बाद हिंदूवादी एजेंडे पर भाजपा से खींचतान तय है। जदयू ने धर्मांतरण विरोधी कानून के खिलाफ स्वर बुलंद करने की रणनीति बनाई है। रविवार की बैठक में पार्टी महासचिव केसी त्यागी ने इसे समाज में घृणा फैलाने वाला कानून बताया। गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह सहित प्रदेश भाजपा के कई नेता ऐसा ही कानून बिहार में बनाने की मांग कर रहे हैं। जबकि जदयू इस मुद्दे पर सख्त रुख अपना कर मुसलमानों को सकारात्मक संदेश देना चाहता है।
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इसलिए दबाव बना रहे नीतीश
कम सीट हासिल करने के बावजूद नीतीश को मुख्यमंत्री बनाने के बाद भाजपा अब मंत्रिमंडल में आनुपातिक आधार पर ज्यादा हिस्सेदारी चाहती है, लेकिन नीतीश ऐसा नहीं चाहते। नीतीश पहले की तरह बराबर की भागीदारी चाहते हैं। चूंकि भाजपा गठबंधन में खुद को बड़ा भाई बनने का सियासी संदेश देना चाहती है, लेकिन पार्टी इस मामले में समझौता नहीं करना चाहती। ऐसे में नीतीश अपने नेतृत्व में सरकार चलाने के लिए भाजपा पर दबाव बना रहे हैं।
क्यों चिंतित है जदयू
जदयू की चिंता का कारण विधानसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन है। नीतीश को लगता है कि भविष्य में अनुकूल परिस्थितियां आते ही भाजपा राज्य में अपना मुख्यमंत्री बना लेगी। भाजपा की इस रणनीति की काट के लिए नीतीश नई रणनीति पर काम कर रहे हैं। गौरतलब है कि बीते चार चुनावों में जदयू का वोट लगातार घट रहा है। 2005 में 25 फीसदी, 2010 में करीब 23 फीसदी, 2015 में 17 फीसदी और इस चुनाव में करीब 15 फीसदी मत मिले।
घटक दलों के अनुरोध पर नीतीश ने सीएम बनना स्वीकार किया : मोदी
नीतीश कुमार के उस दावे को कि वह मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे, भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने सही ठहराया है। सुशील मोदी का कहना है कि नीतीश ने राजग के घटक दलों जदयू, भाजपा और वीआईपी नेताओं के अनुरोध पर मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया था।
पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार मुख्यमंत्री नहीं बनना चाहते थे। मोदी ने कहा, भाजपा और जदयू नेताओं ने उनसे आग्रह किया कि वे उनके नाम पर चुनाव में उतरे थे और लोगों ने उनके लिए मतदान किया था। तब वह मुख्यमंत्री बनने को तैयार हुए।
उन्होंने कहा कि जदयू के नेता पहले ही कह चुके हैं कि अरुणाचल प्रदेश में जो कुछ हुआ उससे बिहार में गठबंधन और सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बिहार में हमारा गठबंधन अटूट है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी।