जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने घाटी में इंटरनेट पर पाबंदी को सही ठहराया
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जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने अनुच्छेद-370 हटाने के बाद कश्मीर में इंटरनेट, मोबाइल सेवा आदि पर पाबंदी को सही ठहराते हुए कहा कि आतंकवाद बढ़ाने के लिए इंटरनेट सबसे सरल माध्यम है। आतंकवाद फैलाने में सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जा रहा है। मेहता ने पीठ को सीलबंद लिफाफे में दस्तावेज पेश कर यह बताने की कोशिश की कि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और इसमें संवेदनशील जानकारी है।
जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष जम्मू-कश्मीर प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता पेश हुए। 5 अगस्त से पहले महबूबा मुफ्ती, गुलाम नबी आजाद, उमर अब्दुल्ला व अलगाववादी नेताओं द्वारा कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से उकसाने वाले बयानों का हवाला देते हुए राज्य में पाबंदियों को सही बताया। मेहता ने कहा कि इनके बयानों में धमकी और अंजाम भुगतने की बात कही गई थी। इंटरनेट पर पाबंदी की एक वजह यह भी थी।
उन्होंने कहा कि पूरे राज्य में इंटरनेट पर पाबंदी की बात सही नहीं है। जम्मू और लद्दाख क्षेत्र में कोई पाबंदी नहीं है। मेहता ने कहा कि अखबार संवाद का एकतरफा माध्यम होता है, लेकिन सोशल मीडिया का प्रचार-प्रसार व्यापक है और वह गुणात्मक तरीके से करोड़ों लोगों तक पहुंचता है।
इंटरनेट पर पाबंदी का मकसद सीमा पार से आने वाले संदेश को रोकना था। मेहता ने पाकिस्तान के मेजर जनरल आसिफ गफूर के ट्वीट का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि खतरा बाहर से ही नहीं अंदर से भी है।
असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी
मेहता ने कहा कि कश्मीर की स्थिति असाधारण थी और आजादी के बाद से वहां ऐसी स्थिति है। असाधारण स्थिति के लिए असाधारण उपाय जरूरी है। उन्होंने कहा कि पाबंदी का स्तर क्या होना चाहिए यह वहां के अधिकारियों पर छोड़ देना चाहिए। जब तक सीधे तौर पर ऐसा न लगे कि निर्णय मनमाने तरीके से लिया गया है, तब तक उसमें दखल देने का कोई कारण नहीं बनता। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि वहां किसी व्यक्ति की आवाजाही पर पाबंदी नहीं है। केवल समूह की आवाजाही पर पाबंदी है।
लैंडलाइन पर पाबंदी क्यों लगाई गई
याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अनुच्छेद-19 अधिकारों के संतुलन की बात करता है। इसी के नाते वह जानना चाहते हैं कि आखिर लैंडलाइन पर पाबंदी क्यों लगाई गई। प्रशासन ने कहा कि 99 फीसदी बच्चे परीक्षा में बैठे, लेकिन सवाल यह है कि आखिर उन बच्चों के पास विकल्प ही क्या था। परीक्षा में न बैठने पर उनका एक वर्ष चला जाता। इसके अलावा बहुत लोग इंटरनेट के जरिये व्यवसाय करते हैं, लेकिन यह बंद होने से वह कुछ नहीं कर पा रहे हैं।