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निर्भया के बाद बने जुवेनाइल कानून की जकड़ से बच सकता है जामिया में गोली चलाने वाला नाबालिग

Fri, 31 Jan 2020 07:41 PM IST
अनवर अंसारी डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: अनवर अंसारी Updated Fri, 31 Jan 2020 07:41 PM IST
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Jamia Firing juvenile law can help accused
जामिया में गोली चलाने वाला शख्स - फोटो : अमर उजाला

जामिया में हुए गोलीकांड के बाद विपक्षी दलों के कई नेताओं और दूसरे लोगों ने एक स्वर में आरोपी युवक के खिलाफ कठोर कार्रवाई की मांग की है। पुलिस की पूछताछ में सामने आया कि आरोपी नाबालिग है। दिल्ली पुलिस ने गोली चलाने वाले नाबालिग को जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष पेश किया, जहां से उसे 14 दिनों की प्रोटेक्टिव हिरासत में रखने का आदेश दिया गया।

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निर्भया कांड के बाद जुवेनाइल जस्टिस कानून में यह सख्त प्रावधान जोड़ा गया था कि गंभीर अपराध करने वाला नाबालिग जो कि 16 से 18 साल के बीच की आयु का है तो उसके खिलाफ बालिग की तरह मामला चलाया जा सकता है।
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जामिया वाले केस में जो नाबालिग है, उस पर उक्त कानून काम करेगा, ऐसी संभावना कम है। यहां पर एक कानूनी पेंच फंस गया है। कानून कहता है कि ऐसे मामले में नाबालिग का गंभीर अपराध की श्रेणी वाले केस में शामिल होना आवश्यक है। 
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गंभीर अपराध तभी माना जाएगा जब नाबालिग के खिलाफ दर्ज केस में कम से कम सात साल की सजा दी जा सकती हो। जामिया मामले के आरोपी नाबालिग के खिलाफ जिन धाराओं में केस दर्ज हुआ है, उसमें 7 साल की कैद का प्रावधान नहीं है।

दिल्ली पुलिस ने जामिया में गोली चलाने वाले नाबालिग के खिलाफ हत्या का प्रयास करने और आर्म्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया है। कानून के जानकार बताते हैं कि इन दोनों ही धाराओं में सात वर्ष की कैद नहीं बन रही। अगर हत्या के प्रयास वाली धारा को देखते हैं तो उसमें अधिक से अधिक दस वर्ष की सजा दी जा सकती है, लेकिन कम से कम सात साल की कैद मिलेगी, यह कहीं नहीं लिखा है।

इसी तरह आर्म्स एक्ट में भी पांच साल की सजा का प्रावधान है। हालांकि दिल्ली पुलिस ने अपनी ओर से नाबालिग के खिलाफ बालिग वाले कानून के दायरे में कार्रवाई करने का प्रयास किया, लेकिन कानूनी पेंच फंसने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।

दिल्ली पुलिस अब आरोपी की सही उम्र का पता लगा रही है। नाबालिग की सही आयु का पता लगाने के लिए आरएमएल अस्पताल को लिखा है। इस तरह के मामलों में मेडिकल बोर्ड गठित किया जाता है। 


जूवेनाइल जस्टिस बोर्ड से इजाजत मिलने के बाद नाबालिग का बोन ओसिफिकेशन टेस्ट भी कराया जा सकता है। फिलहाल उसे नाबालिग मानकर पुलिस मामले को आगे बढ़ाएगी। यानी उसका मामला अब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के समक्ष चलेगा।

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