न्याय व्यवस्था को कठिन बना रहे मुद्दे हमारे लिए कोलेजियम से ज्यादा जरूरी : सुप्रीम कोर्ट
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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की सिफारिश करने वाली कोलेजियम की कार्यशैली चिंता का विषय नहीं है। अधीनस्थ अदालतों में बड़ी संख्या में न्यायिक अधिकारियों के पदों की रिक्तियां और बुनियादी सुविधाओं की कमी जैसे मुद्दे सुप्रीम कोर्ट के लिए चिंता के विषय हैं।
मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति अनिरूद्ध बोस की पीठ ने देश में बच्चों से दुष्कर्म मामलों की बढ़ती संख्या से संबंधित मामले पर विचार के दौरान अपनी नाराजगी व्यक्त की। पीठ ने कहा कि दिल्ली से दूर के स्थानों पर न्यायिक अधिकारियों को बहुत ही मुश्किल परिस्थितियों में काम करना पड़ता है।
पीठ ने सवाल किया, ‘त्रिपुरा, ओडिशा और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में वास्तविकता क्या है? मध्य प्रदेश जैसे राज्य अभी भी आरोपी और पीड़ित के बीच अदालत में एक पर्दा डालकर काम करने में यकीन करते हैं।’ पीठ ने कहा कि दिल्ली में साकेत की जिला अदालत जैसे अदालत कक्षों की तुलना देश के दूसरे हिस्सों की अदालत के कक्षों से नहीं की जा सकती।
'कई जगहों पर चार फुट के कमरे में बैठते हैं मजिस्ट्रेट'
पीठ ने कहा, ‘साकेत की अदालत में आपके पास गवाह के लिए कक्ष हो सकता है लेकिन हम उन राज्यों की बात कर रहे हैं जहां ये सुविधाएं नहीं हैं। हमारे यहां ऐसे स्थान भी हैं जहां मजिस्ट्रेट चार फुट के कमरे में बैठते हैं। हमने यह देखा है और अदालतों की यही हकीकत है।’
शीर्ष अदालत ने कहा कि देश में न्यायिक अधिकारियों के पांच हजार से अधिक पद रिक्त हैं और विधायिका एक के बाद दूसरा नया कानून बना रही है। न्यायाधीशों पर मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है। तमाम कानूनों में प्रावधान किया जाता है कि इससे संबंधित मामलों में छह महीने या एक साल के भीतर निर्णय हो।
'हम मार्ग से भटक गए हैं'
पीठ ने कहा, ‘कोई भी न्यायिक सुविधाओं और संरचनाओं पर ध्यान नहीं दे रहा है। ये ऐसे मुद्दे हैं जो न्यायपालिका के लिए अधिक चिंताजनक हैं न कि शीर्ष अदालत की कोलेजियम।’ पीठ ने कहा, ‘हम मार्ग से भटक गए हैं।’
शीर्ष अदालत ने कोलेजियम के बारे में हाल के सालों में कहे जा रहे एक वाक्य का जिक्र करते हुये कहा कि सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में कोलेजियम प्रणाली के माध्यम से न्यायाधीशों की नियुक्ति की खूब आलोचना की जाती है और कहा जाता है कि शीर्ष अदालत के पांच और तीन वरिष्ठतम न्यायाधीश उच्चतर न्यायपालिका के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नामों की सिफारिश करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दिल्ली की जिला अदालतों में सबसे बेहतरीन सुविधाएं हैं, लेकिन पूर्वोतर और ओडिशा जैसे स्थानों पर इस तरह की सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। पॉक्सो के तहत मुकदमों की सुनवाई कानून का पालन करने के लिए एक पर्दा डालकर की जा रही है। कानून के तहत सुनवाई के दौरान पीड़ित या आरोपी का बयान दर्ज करते समय दोनों एक दूसरे को नजर नहीं आने चाहिए।
'सुनिश्चित करेंगे केंद्र सरकार मुहैया कराए सुविधाएं'
पीठ ने कहा, राज्य अपने आप ये सब नहीं कर सकते और हम सुनिश्चित करेंगे कि केंद्र सरकार ये सारी सुविधाएं उपलब्ध कराए। इससे पहले, मामले की सुनवाई शुरू होते ही न्यायमित्र की भूमिका निभा रहे वरिष्ठ अधिवक्ता वी गिरि ने बच्चों से दुष्कर्म की घटनाओं की जांच और ऐसे मामलों की पॉक्सो के तहत अदालतों में सुनवाई में विलंब के बारे में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।