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इसरो की स्वदेशी तकनीक बचाएगी सियाचिन में सैनिकों की जान

Mon, 04 Apr 2016 01:47 AM IST
एजेंसी/ तिरुवनंतपुरम
एजेंसी/ तिरुवनंतपुरम Updated Mon, 04 Apr 2016 01:47 AM IST
सार

  • विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र ने विकसित की सबसे हल्का उष्मारोधी ‘सिलिका एरोजेल’
  • भारतीय आयुध निर्माणी से सैनिकों की वर्दी तैयार करने पर हो रही चर्चा

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 ISRO's indigenous technology will save the lives of soldiers in Siachen

विस्तार

सियाचिन ग्लेशियर की ऊंचाई पर तैनात सैनिकों का दुश्मन पाकिस्तान से आने वाली गोली नहीं बल्कि जटिल मौसम है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अंतरिक्ष में प्रयोग के लिए एक ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है जिसका उपयोग यदि सियाचीन के सैनिकों के लिए शीघ्र और प्रभावी ढंग से किया जाए तो मरने वाले सैनिकों की संख्या काफी घट सकती है।

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इसरो ने विश्व का सबसे हल्का उष्मारोधी (इंसुलेटिंग) पदार्थ ‘सिलिका एरोजेल’ और उच्च क्षमता वाला खोज और बचाव बेकन तकनीक विकसित की है। यह बेहद हल्का पदार्थ प्रभावी उष्मारोधक का काम करेगा। वहीं ‘खोज और बचाव’ के लिए हाथ में लेकर चलने वाले उपकरण से निकलने वाली रेडियो तरंगों के जरिये लापता या बर्फ में दबे सैनिकों की स्थिति का पता सैटेलाइट के माध्यम से पता लगाया जा सकता है। दल से जुड़ी वैज्ञानिक नगा प्रिया ने कहा कि उनका लैब भारतीय आयुध निर्माणी से इस पदार्थ के जरिये सियाचिन में तैनात सैनिकों के वर्दी, जुराबें, दस्ताने तैयार करने पर चर्चा कर रहा है। तकनीक में सुधार नहीं होने से भारतीय सैनिक काफी भारी कपड़े पहनते हैं। भारतीय प्रयोगशालाओं से नवीनतम तकनीक तक यदि हमारे जवानों की पहुंच हो जाए तो कई जानें बचाई जा सकती हैं। यह उदासीनता दोनों तरफ से है, वैज्ञानिकों की ओर से उद्योगों को तकनीक हस्तांतरित करने में मुश्किल होती है। जबकि उद्योगों की शिकायत है कि उन्हें अधपके उत्पाद दे दिए जाते हैं, ऐसे में उनके असफल होने की दर अधिक है।
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एक हजार सैनिक गंवा चुके हैं जान
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, सियाचिन ग्लेशियर पर पिछले तीन साल के दौरान कम से 41 सैनिकों की मौत हो चुकी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 1984 में सियाचिन पर कब्जा जमाने के बाद से अब तक एक हजार सैनिक अपनी जान गंवा चुके हैं। इनमें सिर्फ 220 सैनिक ही दुश्मन की गोली से शहीद हुए है। 6,000-7,000 मीटर ऊंचाई पर जटिल मौसम सबसे बड़ा हत्यारा है।
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‘देसी तकनीक’ से मेक इन इंडिया को मिले ताकत
विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र (वीएसएससी), तिरुवनंतपुरम के निदेशक और मशहूर रॉकेट वैज्ञानिक के सिवन कहते हैं कि इन पदार्थों और तकनीकों में थोड़ा सा परिवर्तन कर इनका सामाजिक रूप से प्रयोग किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि ‘देसी तकनीक’ का प्रयोग कर मेक इन इंडिया को मजबूत किया जा सकता है और जानें बचाई जा सकती हैं। सिवन ने कहा कि उपयुक्त औद्योगिक साझेदारों की सक्रिय रूप से पहचान की जा रही है। इन्हें तकनीक का हस्तांतरण किया जाएगा जिससे की तथाकथित ‘रॉकेट साइंस’ लंबे समय तक रॉकेट साइंस न रहे।


...तो नहीं जाती हनुमंथप्पा की जान
इसरो की विकसित की गई इस प्रकार की तकनीकें यदि प्रयोग में लाई जातीं तो संभव है कि पिछले दिन सियाचिन में लांस नायक हनुमंथप्पा और अन्य नौ सैनिकों की जान बच जाती। यदि इन सैनिकों के कपड़े सिलिका एरोजेल के बने होते तो संभव है कि बर्फ में जमने से उनकी मौत नहीं होती। यदि इन सैनिकों के पास हाथ में लेकर चलने वाले ‘रक्षा और बचाव’ उपकरण होते तो उनकी स्थिति का भारतीय उपग्रहों के जरिये आसानी से पता लगाया जा सकता था और साथ ही बचाव अभियान में तेजी आती।

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