इसरो के ‘बाहुबली’ ने भरी सफल उड़ान, दुश्मनों पर रखेगा नजर
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इसरो का ‘बाहुबली’ कहे जा रहे जीएसएलवी मॉक-3-डी2 रॉकेट की बुधवार को सफल उड़ान के साथ ही भारत दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल हो गया, जिनके पास क्रायोजेनिक इंजन बनाने की अपनी तकनीक मौजूद है। इससे भारत के चंद्रयान-2 और मानव मिशन गगनयान की राह भी आसान हो गई है।
बुधवार को इस रॉकेट के जरिए भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने करीब 3423 किलोग्राम वजन की जीसेट-29 कम्युनिकेशन सेटेलाइट को आसमान में स्थापित किया, जिससे जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी भारतीय राज्यों के दुर्गम क्षेत्रों में भी हाई स्पीड इंटरनेट और मोबाइल कम्युनिकेशन की सुविधा देने का रास्ता साफ हो गया है। यह इसरो की तरफ से आज तक छोड़ी गई सबसे भारी सेटेलाइट है।
लिक्विड ऑक्सीजन व हाइड्रोजन के ईंधन से चलने वाले भारतीय वैज्ञानिकों के बनाए स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की जीएसएलवी मॉक-3 के साथ यह दूसरी परीक्षण उड़ान थी। पहली उड़ान में इस रॉकेट ने 3136 किलोग्राम वजन वाले जीसेट-19 को आकाश में पहुंचा था। इसरो चीफ के. सिवन ने बुधवार को घोषणा की कि इस रॉकेट की पहली ऑपरेशनल उड़ान 2019 में चंद्रयान-2 के साथ होगी।इसे अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भारत की बड़ी छलांग माना जा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसरो की टीम को शुभकामनाएं देते हुए कहा, 'हमारे वैज्ञानिकों को जीसेट-29 सेटेलाइट के साथ जीएसएलवी मॉक-3 की सफल उड़ान के लिए बहुत बधाई। इस दोहरी सफलता ने किसी भारतीय लांच व्हीकल के सबसे भारी सेटेलाइट को पृथ्वी की कक्षा तक पहुंचाने का नया रिकॉर्ड बनाया है।'
16 मिनट में पहुंचा आकाश में
इससे पहले चक्रवाती तूफान ‘गाजा’ के खतरे के बावजूद मंगलवार दोपहर 2.50 बजे उड़ान की उल्टी गिनती शुरू की गई और करीब 27 घंटे बाद शाम 5.08 बजे जीएसएलवी मॉक-3 ने जीसेट-29 को लेकर उड़ान भरी। उड़ने के महज 16 मिनट 43 सेकंड में उसने सेटेलाइट को 36 हजार किलोमीटर दूर अंतिम भूस्थैतिक कक्षा में पहुंचा दिया, जहां से का एंड क्यू बैंड हाईथ्रूपुट ट्रांसपोंडरों वाली इस सेटेलाइट को अगले कुछ दिन में वैज्ञानिक 55 डिग्री पूर्वी देशांतर पर स्थापित करेंगे, जहां वह अगले 10 साल तक सेवा देगी।
इसलिए खास है उड़ान
640 टन वजन का है जीएसएलवी मॉक-3 रॉकेट
10 टन वजन तक के उपग्रह को ले जा सकता है साथ
15 साल लगे इसरो को इस रॉकेट का इंजन बनाने में
13 मंजिला इमारत के बराबर ऊंचा है 43.49 मीटर लंबा रॉकेट
200एस बूस्टर लगा है इसमें, जो दुनिया दूसरा सबसे बड़ा बूस्टर है
03 चरणों वाला लाच व्हीकल है, जिसमें आखिरी स्टेज क्रायोजेनिक की है
04 टन से ज्यादा वजन वाले मानव मिशन यान को ले जाएगा आसानी से
दुश्मनों पर नजर रखेगी जीसेट-29
- जीसेट-29 सेटेलाइट से जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों के अनछुए हिस्से भी जुड़ेंगे मोबाइल व इंटरनेट से
- इसमें लगे हाई रेज्योलूशन कैमरे ‘जियो आई’ से थल सीमा से लेकर हिंद महासागर तक में दुश्मन पर रहेगी नजर
- तीन नई तकनीकों जियो आई कैमरा, क्यू एंड वी बैंड्स और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन को भी इसके साथ भेजा गया है।
वीडियोः
#WATCH: Indian Space Research Organisation (ISRO) launches GSLV-MK-III D2 carrying GSAT-29 satellite from Satish Dhawan Space Centre in Sriharikota. #AndhraPradesh pic.twitter.com/7572xEzTq2
— ANI (@ANI) November 14, 2018
नई स्पेस तकनीक में मिलेगी मदद
जीसैट -29 में इसरो काफी नए प्रयोग करने जा रहा है। इसरो प्रमुख के अनुसार ऑपरेशनल पेलॉड्स के अलावा यह उपग्रह तीन प्रदर्शन प्रौद्योगिकियों, क्यू ऐंड वी बैंड्स, ऑप्टिकल कम्युनिकेशन और एक हाई रेजॉल्यूशन कैमरा भी अपने साथ ले जाएगा। स्पेस मिशन में इसरो पहली बार इन तकनीकों का परीक्षण करने जा रहा है।
पूरी तरह भारत में बना रॉकेट
भारत आज तकनीकी दुनिया में कई नए पैमाने गढ़ेगा। बताया जा रहा है कि जीसैट-29 को लांच करने के लिए जीएसएलवी-एमके 2 रॉकेट का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसे भारत में ही बनाया गया है। 640 टन वजन वाला इस रॉकेट को बनाने और इस पूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने में इसरो को 15 वर्षों का समय लगा है। 13 मंजिल की बिल्डिंग जितनी ऊंचाई वाले इस रॉकेट में कई खासियत है। ये चार टन तक के उपग्रह लांच कर सकता है। अपनी पहली उड़ान में इसने रॉकेट 3136 किलोग्राम के उपग्रह को उसकी कक्षा में पहुंचाया था। इस रॉकेट में स्वदेशी तकनीक से तैयार हुआ नया क्रायोजेनिक इंजन लगा है, जिसमें लिक्विड ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का ईंधन के तौर पर इस्तेमाल होता है।
10 साल तक करेगा काम
इसरो के अनुसार, जीएसएलवी-एमके III रॉकेट की दूसरी उड़ान होगी, जो लांच होने के बाद 10 साल तक काम करेगा। यह लांच होने के बाद पृथ्वी से 36,000 किमी दूर जियो स्टेशनरी ऑर्बिट (जीएसओ) में स्थापित होगा। यह भारत के दूरदराज के क्षेत्रों में हाई स्पीड डेटा को ट्रांसफर करने में मदद करेगा। आज लांच होने वाला इसरो का इस साल का यह पांचवा रॉकेट होगा।