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क्या अंधविश्वास हमारे लिए जानलेवा बनता जा रहा है?

Wed, 28 Feb 2018 05:49 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Wed, 28 Feb 2018 05:49 PM IST
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Is superstition becoming a life threatening for us
तेलंगाना के हैदराबाद में एक शख्स ने 31 जनवरी को एक बच्चे की बलि दे दी। इस घटना ने पूरे समाज को सकते में डाल दिया है।
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एक तांत्रिक के कहने पर उस शख्स ने चंद्र ग्रहण के दिन पूजा की और बच्चे को छत से फेंक दिया। तांत्रिक ने उसे कहा था कि ऐसा करने से उसकी पत्नी की लंबे समय से चली आ रही बीमारी ठीक हो जाएगी। तेलंगाना पुलिस बच्चे के शव की तलाश कर रही है।

तंत्र-मंत्र के जाल में फंसने की ऐसी ही एक कहानी आंध्र प्रदेश में विजिनाग्राम जिले की है। यहां 28 साल की दीपिका को उनकी मां कलाई पर धागा बंधवाने के लिए एक तांत्रिक के पास लेकर जाती थीं। मां का मानना था कि ये धागा दीपिका को अपनी पसंद के लड़के से शादी करने से रोकेगा।
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दीपिका एक एमएनसी में काम करती हैं और एक लड़के को प्यार करती हैं। लेकिन मां को ये रिश्ता पसंद नहीं था और इस कारण वो तांत्रिक के पास जाने लगीं। तांत्रिक ने भी कहा कि अगर ये शादी करेंगे तो भविष्य में बुरा होगा।
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दीपिका ने बीबीसी को बताया कि वो तांत्रिक हर बार धागा बांधने के लिए 5000 रुपये लेता था। हालांकि, बाद में दीपिका ने अपनी पसंद के लड़के से ही शादी की और दोनों खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं।

पढ़े-लिखे लोग भी फंसे हैं

अंधविश्वास के प्रभाव से पढ़े-लिखे लोग भी अछूते नहीं रहते हैं। 50 साल की एमबीए ग्रेजुएट और धाराप्रवाह अंग्रेजी बोलने वालीं फरजाना भी इसकी शिकार हो गईं।

वह आजकल हैदराबाद में एक दरगाह में रह रही हैं ताकि उन्हें आने वाले हार्ट अटैक रुक जाएं। जब उनसे इसके कारण के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि उनके परिवार के सदस्य काला जादू कर रहे हैं, इसलिए वह दरगाह में रहती हैं। फरजाना को पूरा विश्वास है कि दरगाह उन्हें हार्ट अटैक से बचाएगी।

मनोवैज्ञानिक पत्ताभिरम कहते हैं, ''विडंबना है कि लोग ये मानने को तैयार रहते हैं कि घर के बाहर रंगोली बनाने से उनके घर में लक्ष्मी आएगी लेकिन यह नहीं समझते कि ऐसा घर को साफ रखने के लिए किया जाता है।''

विश्वास-अंधविश्वास

तर्कवादी कहते हैं कि यह दुख की बात है कि एक ऐसा देश, जहां विज्ञान इतना आगे बढ़ चुका है और अंतरिक्ष में सैटेलाइट तक भेजे जा रहे हैं, वहां इंसानों की बलि दी जाती है और बेमतलब के रीति-रिवाज माने जाते हैं।

विश्वास और अंधविश्वास के बीच के अंतर के बारे में पूछने पर तर्कवादी बाबू गोगीनेनी कहते हैं, ''अगर कोई रिवाज उसके पीछे के तर्क को लेकर सवाल उठाए बिना माना जाता है तो उसे अंधविश्वास कहते हैं। अगर कोई व्यक्ति रिवाज के पीछे के तर्क को परख नहीं पाता तो यह खतरनाक हो सकता है।''

उन्हें लगता है कि हल्दी, मुर्गी, पत्थरों, संख्याओं और रंग जैसी चीजों को शक्तिशाली समझना अवैज्ञानिक है और इन्हें वैज्ञानिक कहे जाने के कारण कई जानें जाती हैं।

जन विज्ञान वेदिका के सचिव एल. कांता राव कहते हैं कि भारतीय शास्त्रों में बलि का महत्व बताया गया और इसलिए लोगों के बीच यह विश्वास फैल गया कि बलि देना एक सामान्य बात है।

Is superstition becoming a life threatening for us
तंत्र-मंत्र का कारोबार

बीबीसी ने ''वशीकरणम'' नाम से वेबसाइट चलाने और प्यार व जिंदगी से जुड़ी किसी भी समस्या को हल करने का दावा करने वाले एक ज्योतिषी से बात की। ज्योतिषी ने बताया कि वो नवोदय कॉलोनी में रहते हैं और अपनी समस्या बताने के लिए कहा।

ज्योतिषी ने कहा कि पहले मैं उनके खाते में पैसे जमा कराऊं और फिर ई-मेल के जरिये अपनी शिकायत लिखकर अपॉइंटमेंट ले लूं। जब उन्हें बताया गया कि हम बीबीसी से बोल रहे हैं तो उन्होंने शहर से बाहर होने की बात कहकर फोन काट दिया।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो द्वारा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना दोनों के लिए जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक साल 2000 से 2012 के दौरान 350 लोगों को इस शक में मार दिया गया कि वो दूसरों पर काला जादू कर रहे हैं। पिछले तीन सालों के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ तेलंगाना में ही कुल 39 मामले दर्ज किए गए हैं।

कांता राव का कहना है, ''जब प्रशासन में मौजूद लोग ही धर्म के नाम पर अवैज्ञानिक रीतियों में शामिल हैं तो समाज में बहुत कम बदलाव की उम्मीद की जा सकती है।''

बाबू गोगीनेनी दुख जाहिर करते हुए कहते हैं, ''जानकारी और शिक्षा के बावजूद यह दुख की बात है कि लोग देश को पीछे की तरफ ले जा रहे हैं।''

दार्शनिक, वैज्ञानिक और लेखिका मीरा नंदा ने अपनी किताब 'द गॉड मार्केट' में लिखा है कि राज्य धर्म को ''राज्य-मंदिर-मिलन-परिसर'' के आइडिया के साथ मिला रहे हैं। उनकी राय है कि हिंदू संस्कृति की परंपराओं और चिह्नों को प्रशासन में शामिल करना धर्मनिरपेक्षता को नुकसान पहुंचाएगा।

क्या है समाधान?

बाबू गोगीनेनी कहते हैं कि डॉ. दाभोलकर, गोविंद पानसरे और एमएम कलबुर्गी के खिलाफ लोगों की धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में मामले दर्ज किए गए जबकि वो अंधविश्वासों के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे थे। डॉ. दाभोलकर अंधविश्वास खत्म करने के लिए एक विधेयक के लिए लड़े।

वह बताते हैं कि ऐसे विधेयक अंधविश्वास को पूरी तरह खत्म तो नहीं कर सकते लेकिन इन्हें लोगों को अंधविश्वास के नाम पर शोषण करने वालों से बचाने में सक्षम होना चाहिए। साथ ही इन्हें अंधविश्वासों के खिलाफ उपभोक्ता संरक्षण के रूप में कार्य करना चाहिए।

एल. कांताराव ने कहा, ''बच्चों को वैज्ञानिक नजरिये से सोचना सीखना चाहिए ताकि भविष्य में विश्वास अंधविश्वास में न बदल जाए।''

पत्ताभिरम कहते हैं, ''सकारात्मक मजबूती और ठोस तर्कों के जरिये लोगों को अंधविश्वासों के प्रभाव से बाहर आने के लिए समझाया जा सकता है।''
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