क्या असम में दशकों पुराने बोडो उग्रवाद का अंत हो रहा है, हथियार उठाने वाले कर रहे हैं सरेंडर
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केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों की मुहिम रंग ला रही है। असम में लंबे समय से आतंकी घटनाओं में शामिल रहे नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) के एक समूह से सक्रिय सदस्यों द्वारा आत्मसमर्पण करने की पहल का केंद्र सरकार ने स्वागत किया है। पिछले सप्ताह एनडीएफबी के अध्यक्ष, महासचिव, कमांडर इन चीफ और वित्तीय सचिव सहित 26 सक्रिय सदस्यों को म्यांमार से भारत लाया गया था। इनके पास 25 हथियार, 50 से ज्यादा मैगजीन और 900 से अधिक आयुध एवं संचार उपकरण बरामद हुए थे। आत्मसमर्पण करने वालों का नेतृत्व एनडीएफबी के अध्यक्ष बी. साओराइग्वरा ने किया है। यह समूह असम के चार बोडो उग्रवादी समूहों में से एक है। बाकी के तीन समूह भी फिलहाल भारत सरकार के साथ चल रही संघर्ष विराम वार्ता में शामिल हैं। संभव है कि वे भी जल्द ही भारत सरकार की शांति प्रक्रिया में शामिल हो जाएं।
एनडीएफबी के जिस उग्रवादी समूह की कमान बी. साओराइग्वरा संभाल रहे हैं, वे भारत सरकार के वार्ताकार के साथ संपर्क में थे। दबाव के चलते ही सही, पिछले साल उन्होंने बोडो उग्रवाद का समाधान राजनीतिक प्रक्रिया के जरिए निकालने की मंशा बनाई थी। म्यांमार में रह कर अपनी गतिविधियों का संचालन कर रहे साओराइग्वरा के समूह में पूर्वोत्तर के कई दूसरे विद्रोही समूह भी शामिल थे। अपने संगठन की गतिविधियों को विस्तार देने के लिए उन्होंने एनएससीएन-के (एक नगा उग्रवादी समूह) और उल्फा/आई (असम का एक अन्य उग्रवादी समूह) के साथ मिलकर युनाइटेड नेशनल लिब्रेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया नाम से एक संयुक्त मोर्चा भी तैयार किया था। बाद में इन समूहों में से जब साओराइग्वरा ने भारत सरकार के साथ बातचीत का हाथ बढ़ाया तो दूसरे समूह भी वार्ता के लिए तैयार हो गए। दूसरे संगठनों की बातचीत अभी चल रही है, जबकि साओराइग्वरा और उनके साथी पिछले सप्ताह भारत आ गए। इस समूह ने शांति का विकल्प चुनकर देश की मुख्य धारा में शामिल होने का निर्णय ले लिया।
माना जा रहा है कि उनका यह कदम दशकों पुराने बोडो उग्रवाद के अंत की शुरुआत है। भारत सरकार ने साओराइग्वरा और उनके समर्थकों द्वारा हिंसा को त्याग कर शांति का विकल्प चुनने के साहसिक फैसले का स्वागत किया है। इस समूह के लिए शांति प्रक्रिया में शामिल होने का इससे अच्छा कोई समय नहीं हो सकता था। मौजूदा राजनीतिक माहौल का ध्यान रखते हुए भारत सरकार ने बोडो सिविल सोसायटी के संगठनों, राजनीतिक दलों और बोडो उग्रवादी समूहों को वार्ता में शामिल करने का फैसला किया था। भारत सरकार ने खुले मन से कई संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत की है, जबकि अभी कई दूसरे समूहों से बातचीत चल रही है। यहां उल्लेख कर दें कि असम में पचास सालों से एक अलग बोडोलैंड राज्य की मांग उठती रही है। बोडो उग्रवादी संगठनों ने अपनी विभिन्न आतंकी गतिविधियों के जरिए इस मांग को जारी रखा।
हालांकि उनकी यह राह हिंसा से भरी थी। समय समय पर होने वाले हिंसक विरोध प्रदर्शनों और उग्रवादी घटनाओं में जान माल का भारी नुकसान हुआ है। इस मामले का समाधान करने के लिए 1993 और 2003 में भी करार हुए थे। अब केंद्र सरकार की नीति के चलते इन समूहों ने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्य धारा में शामिल होने का निर्णय ले लिया।