IPS officer Satish Verma: गुजरात कैडर के इस अफसर को देशद्रोह जैसी सजा क्यों? क्यों चुप है आईपीएस एसोसिएशन
IPS officer Satish Verma: कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, सरकारी पद वाले किसी व्यक्ति पर जब आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच गंभीरता एवं निष्पक्षता से होनी चाहिए...
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गुजरात कैडर के तेजतर्रार आईपीएस अफसर सतीश चंद्र वर्मा चर्चा में हैं। केंद्र सरकार ने उन्हें सेवानिवृत्ति से कुछ दिन पहले ही बर्खास्त कर दिया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने 19 सितंबर को केंद्र सरकार का फैसला लागू करने पर एक सप्ताह के लिए रोक लगा दी है। नियमानुसार, उनके बैच के ज्यादातर अफसर डीजी रैंक में हैं, लेकिन उन्हें पदोन्नति से वंचित रखा गया। वे मौजूदा समय में प्रतिनियुक्ति पर सीआरपीएफ में आईजी हैं। पूर्व आईपीएस अधिकारी इस मामले पर हैरानी जता रहे हैं। आखिर एक आईपीएस को देशद्रोह के अपराध जैसी सजा क्यों दी जा रही है। विभागीय कार्रवाई की बात तो समझ में आती है। दूसरा, इस केस में इंडियन पुलिस फाउंडेशन और आईपीएस एसोसिएशन जैसे संगठन भी मौन साधे हुए हैं।
जांच गंभीरता एवं निष्पक्षता से होनी चाहिए
कैबिनेट सचिवालय से सेक्रेटरी सिक्योरिटी के पद से रिटायर हुए पूर्व आईपीएस एवं सीआईसी रहे यशोवर्धन आजाद कहते हैं, सरकारी पद वाले किसी व्यक्ति पर जब आरोप लगते हैं, तो उसकी जांच गंभीरता एवं निष्पक्षता से होनी चाहिए। ऐसा न हो कि कोई निर्दोष अधिकारी या कर्मचारी, सजा के दायरे में आ जाए। मीडिया में जो खबरें देखने को मिल रही हैं, उसके मुताबिक आईपीएस सतीश वर्मा का ऐसा कोई गुनाह नजर नहीं आता कि जिसके चलते उन्हें रिटायरमेंट की दहलीज पर नौकरी से ही बर्खास्त करना पड़े। आल इंडिया सर्विस कंडक्ट रूल में कई तरह के प्रावधान हैं। उनके अनुसार कार्रवाई हो सकती है। सतीश चंद्र वर्मा को जिस तरह की सजा मिली है, वह बहुत चिंतनीय है। क्या उन्होंने कोई ऐसा जुर्म किया है कि उन्हें नौकरी से बर्खास्तगी की सजा मिल रही है। ये तो देशद्रोह जैसे मामलों में होता है।
भ्रष्टाचार के मामलों में कठोर रहे हैं वर्मा
आईपीएस सतीश वर्मा का मामला, गुजरात में हुए इशरत जहां एनकांउटर केस से जुड़ा है। वर्मा ने विशेष जांच दल की तरफ से जो भी रिपोर्ट सौंपी, उस वक्त मौजूद तथ्यों के आधार पर ही दी थी। उन्होंने अपने विवेक से काम लिया। केस में उनकी कोई बदनियति नहीं रही। जब सतीश वर्मा, उत्तर पूर्व में तैनात थे तो वहां भी सरकार के साथ उनकी ठन गई थी। भ्रष्टचार के मामले में उन्होंने कई तथ्यों को बाहर निकाला। उनकी आंच राजनेताओं तक जा पहुंची। अब उसी मामले में यह कह कर कि उन्होंने मीडिया को वह बयान दे दिया, जिसके लिए वे अधिकृत नहीं थे। बतौर, यशोवर्धन आजाद ये कौन सी बात हुई। उस मामले में मंत्रियों तक का नाम आया था। संभव है कि वह किसी को पसंद न आया हो। जब ये आईपीएस केंद्रीय अर्धसैनिक बल में तैनात थे, तो भी इनका एक केस केंद्रीय सूचना आयोग के पास पहुंचा था। वहां भी फेक एनकाउंटर का मामला था। आयोग को केस की फाइल तक नहीं दिखाई जा रही थी। सरकार की ओर से तारीख पे तारीख ली जा रही थी। तत्कालीन सूचना आयुक्त यशोवर्धन आजाद के रिटायर होने के बाद मामले का रंग बदल गया था। विभागीय कार्रवाई तक तो ठीक है, लेकिन बर्खास्तगी का आदेश थमा देना, कुछ ठीक नहीं है। देश को बताया जाए कि पूरा मामला क्या है। ऐसा क्या हुआ था कि आईपीएस ने कथित तौर से विदेशी संबंध खराब कर दिए थे। सरकार इसे भी आईपीएस की सेवा समाप्त करने का एक पुख्ता आधार बना रही है। अब मामला सर्वोच्च अदालत में है। चार्ज में ही पता चलेगा कि ये सब क्यों हुआ है।
फिलहाल कोयंबटूर में सीआरपीएफ में आईजी हैं वर्मा
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस ह्रषिकेश रॉय की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, रोक अवधि के दौरान वे दिल्ली हाईकोर्ट में बर्खास्तगी के आदेश को चुनौती दे सकते हैं। इसके बाद उच्च न्यायालय तय करेगा कि बर्खास्तगी के आदेश पर आगे के लिए रोक लगाई जाए या उसे बरकरार रखें। पक्षकार इस केस में अपनी दलीलें हाईकोर्ट के समक्ष रख सकते हैं। केंद्र सरकार ने 30 अगस्त को एक आदेश जारी कर कहा था कि विभागीय कार्रवाई से जुड़े आधार पर वर्मा को सेवा मुक्त करने का आदेश जारी किया गया है। इस आदेश को दिल्ली हाईकोर्ट के समक्ष रखा गया तो अदालत ने इसके पालन के लिए अपनी मंजूरी दे दी थी। वर्मा ने सरकार की अनुशासनात्मक कार्रवाई को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। आईपीएस अधिकारी सतीशचंद्र वर्मा के विरुद्ध जारी विभागीय जांच के कारण ही उन्हें पदोन्नति नहीं दी गई। फिलहाल सतीश वर्मा, कोयंबटूर में सीआरपीएफ आईजी हैं।
गुजरात में ठीक नहीं रहा एसआईटी और आईपीएस का मेल
गुजरात दंगों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई के पूर्व प्रमुख आरके राघवन की अध्यक्षता में एक एसआईटी का गठन किया था। इसमें 1972 बैच के यूपी कैडर के आईपीएस सीबी सत्पथी व गुजरात पुलिस के तीन अधिकारी गीता जौहरी, शिवानंद झा और आशीष भाटिया को शामिल किया गया। डीएसपी नोएल परमार को भी सहयोग के लिए जांच टीम में लाया गया। कुछ समय बाद उन्हें एसआईटी से कार्यमुक्त कर दिया गया। 2009 में एसआईटी के नंबर दो सदस्य आईपीएस सीबी सत्पथी ने अनिच्छा जाहिर कर दी। एसआईटी छोड़ने के बाद वे आध्यात्मिक मुहिम से जुड़ गए थे। मई 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी में दो नए सदस्य शामिल किए। इनमें सीबीआई के पूर्व अतिरिक्त निदेशक परमवीर सिंह और पूर्व डीआईजी को एसआईटी का सदस्य बना दिया। कुछ ही महीने बाद परमवीर सिंह ने एसआईटी से किनारा कर लिया। इसके बाद गीता जौहरी भी सोहराबुद्दीन मुठभेड़ मामले में सुप्रीम कोर्ट की जांच के दायरे में आ गईं। शिवानंद झा को भी कुछ आरोपों के चलते जांच से हटना पड़ा। बाद में कई आईपीएस के साथ महाराष्ट्र कैडर के 1988 बैच के आईपीएस अधिकारी के. वेंकटेशम एसआईटी के सदस्य बने थे। आईपीएस वेंक्टेशम ने एसआईटी से हटने के लिए सुप्रीम कोर्ट में आवेदन कर दिया। उनकी दलील थी कि वे पुलिस के लिए कुछ करना चाहते हैं। उन्हें जांच से बाहर कर दिया गया।