सोशल मीडिया पर आतंकियों के कोडवर्ड्स के आगे असहाय हो जाती हैं जांच एजेंसियां, ऐसे ढूंढती हैं सुराग
- खालिस्तानी, आईएस संगठनों से जुड़े आतंकियों ने पुलिस के सामने किया है खुलासा,
- कैसे वे सोशल मीडिया के जरिए बना रहे युवाओं को निशाना
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विस्तार
दिल्ली में पकड़े गए खालिस्तानी आतंकियों ने खुलासा किया था कि वे सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफॉर्म्स के जरिए युवाओं को अपने साथ जोड़ने का काम करते हैं। इसके पहले आईएस के खुरासान मॉड्यूल के आतंकियों ने भी इसी तरह की बात कबूली थी। सोशल मीडिया के जरिए आतंकी न सिर्फ नए लड़कों को अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं, बल्कि इसी के जरिए वे दूसरे देशों में बैठे आतंकियों से संपर्क भी साधते हैं। आपसी बातचीत की भाषा में वे ऐसे कोडवर्ड्स का इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें सोशल मीडिया पर प्रतिबंधित नहीं किया जा सकता है। यही वजह है कि आतंकियों के इस नए तरीके को भेदना सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बन गया है।
क्या है चुनौती
दिल्ली पुलिस साइबर क्राइम विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक सोशल मीडिया पर करोड़ों अकाउंट्स के बीच संदिग्ध अकाउंट्स की पहचान कर पाना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है। आतंकी आपसी बातचीत में ऐसे सामान्य शब्दों को कोडवर्ड्स के रूप में इस्तेमाल करते हैं, जिन्हें सामान्य तौर पर प्रतिबंधित (फिल्टर) नहीं किया जा सकता। क्योंकि इससे उस विषय से जुड़ी अन्य महत्वपू्र्ण गतिविधियों के सीमित होने का खतरा पैदा हो जाता है। इसी कमजोरी के चलते आतंकी सोशल मीडिया के जरिए अपने लिए नए गुर्गों की तलाश करते हैं।
यह है सबसे बड़ा खतरा
सोशल मीडिया को टारगेट करने से सबसे बड़ा खतरा ज्यादा संख्या में युवाओं के भ्रमित होने का होता है। किसी वर्ग विशेष, क्षेत्र विशेष या समुदाय विशेष के प्रति आक्रामक और भड़काऊ बयान युवाओं को आसानी से अपनी चपेट में ले लेते हैं। यही कारण है कि आतंकी संगठन अपने लक्षित समुदाय को ध्यान में रख कर सोशल मीडिया अकाउंट बनाकर पहले युवाओं को भड़काते हैं और उनकी टोह लेते हैं। अगर युवा उनकी बातों से ज्यादा प्रभावित होने लगता है, तो उसे अपने साथ जोड़ने की कोशिश करते हैं।
कैसे पहचान करते हैं सुरक्षा बल
अधिकारी के मुताबिक उनकी टीम भी सोशल मीडिया पर नजर रखती है। किसी विचार से जुड़े अकाउंट्स में किस प्रकार की बातें की जा रही हैं और उससे जुड़े सदस्य किस प्रकार की बातचीत कर रहे हैं, उससे यह पहचान करने की कोशिश की जाती है कि संगठन किस युवा को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे युवाओं के माता-पिता और उनके परिवार के अन्य सदस्यों के साथ मिलकर उन्हें कट्टरपंथी बनन से रोकने की कोशिश की जाती है। केरल और कश्मीर घाटी में इस प्रकार के प्रयास सफल साबित हुए हैं। लेकिन सुरक्षा अधिकारी भी मानते हैं कि यह प्रयास भी काफी सीमित होते हैं।
सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए साइबर सुरक्षा में ज्यादा कार्यबलों की नियुक्ति को इसका समाधान बताया जाता है। इसके अलावा साइबर टीम को ज्यादा से ज्यादा नई तकनीकी से लैस रखना भी सोशल मीडिया को आतंकी संगठनों की ताकत बनने से रोक सकता है।