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साक्षात्कार: स्वस्थ इंडिया के लिए खाद्य पदार्थों की सही पैकेजिंग जरूरी

Mon, 06 May 2019 05:04 AM IST
गौरव द्विवेदी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: गौरव द्विवेदी Updated Mon, 06 May 2019 05:04 AM IST
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Interview with Rita Tewatia: Healthy India requires correct packaging of foods
रीता तेवतिया, एफएसएसएआई (फाइल फोटो)

देश में कभी हैजा, टीबी, मेलेरिया और अन्य संक्रामक बीमारियों से मौतें होती थीं, लेकिन अब 60 फीसदी मौतें खराब और असंतुलित खाद्य पदार्थों की वजह से हो रही हैं। इन मौतों की संख्या में कमी लाने और स्वस्थ इंडिया के लिए खाद्य पदार्थों की सही पैकेजिंग जरूरी है। अंतिम उपभोक्ता तक संतुलित एवं गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थ पहुंचाने को लेकर शिशिर चौरसिया ने भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) की अध्यक्ष रीता तेवतिया से बीतचीत की। पेश है अंश : 

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देश के अंतिम उपभोक्ता तक संतुलित और स्वच्छ खाद्य पदार्थों की आपूर्ति के लिए कई अभियान चलाए जा रहे हैं, जिसका लाभ भी दिख रहा है। 

प्रश्न- विकसित देश हेल्दी और सस्टेनेबल डाइट की ओर बढ़ रहे हैं। देश में क्या स्थिति है?
उत्तर- एफएसएसएआई ने ‘इट राइट इंडिया’ अभियान शुरू किया है। इसके तहत लोगों को जागरूक किया जा रहा है कि वे अपने भोजन में हरी सब्जियों को ज्यादा शामिल करें और अनाज कम। हेल्दी और सस्टेनेबल डाइट को लेकर जानकारी होने के बावजूद लोग कई बातों पर अमल नहीं करते हैं। इसके लिए छोटे-छोटे बुकलेट छपवाए गए हैं, जिसमें सारी जानकारियां हैं। एफएसएसएआई की वेबसाइट पर भी बुकलेट पड़े हैं। एक और अभियान शुरू किया गया है, जिसका नाम है ‘आज से थोड़ा कम’। इसमें चीनी, नमक और तेल का कम इस्तेमाल करने के लिए लोगों को जागरूक किया जा रहा है। कई कंपनियां भी इस अभियान से जुड़ रही हैं। इसके अलावा ‘नेट्रोफेन’ नामक एक कार्यक्रम शुरू किया गया है। इसमें डॉक्टरों के साथ न्यूट्रिशियन, डायटिशिन, प्रोफेशनल एसोसिएशन और शेफ को जोड़ा है। यदि किसी का फैमिली डॉक्टर कहे कि आप अमुक चीज कम खाएं तो इसका असर पड़ता है।
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प्रश्न- एफएसएसएआई वर्तमान में कितना प्रासंगिक है?
उत्तर- आपको याद होगा कि 2002 में सरसों तेल में मिलावट के कारण ड्रॉप्सी की घटना ने पूरे देश को हिला दिया था। इसके अलावा कुछ और भी घटनाएं भी हुई थीं। उस वक्त खाद्य पदार्थों के नियमन के लिए कोई समर्पित संस्था नहीं थी। कई मंत्रालयों में यह काम बंटा था। कुछ काम भारतीय मानक संगठन कर रहा था तो कुछ एगमार्क और कुछ पीएफए। हालांकि, खाद्य पदार्थों के लिए नियमन के लिए यह प्रयास काफी नहीं था। इसके बाद एफएसएसएआई बना। देश में वर्तमान में 60 फीसदी मौत खाद्य पदार्थों से संबंधित बीमारियों के कारण होती है। ऐसे में एफएसएसएआई की प्रासंगिकता बढ़ जाती है।
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प्रश्न- एक नियामक के रूप में एफएसएसएआई कैसे स्वस्छ और संतुलित खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सुनिश्चित करता है?
उत्तर- स्वच्छ और संतुलित भोजन तक समाज के उच्च वर्ग की पहुंच पहले से ही थी, लेकिन निचले तबके के लोगों तक अब भी इसकी पहुंच नहीं है। इनके खून की जांच करने पर पता चलेगा कि इनमें कई महत्वपूर्ण विटामिन और खनिज पदार्थों की कमी है। समाज के इस तबके तक स्वच्छ और संतुलित खाद्य पदार्थ पहुंचाने के लिए एफएसएसएआई ने ‘इट फोर्टिफाइड’ अभियान चलाया। इसमें नमक, आटा, चावल, खाद्य तेल और दूध का चयन किया गया। नमक में आयोडिन, आटा और चावल में फोलिक एसिड, खाद्य तेल एवं दूध में विटामिन ए और विटामिन डी का मिश्रण शुरू किया। आप देखेंगे कि इन वस्तुओं के पैक पर ‘एफ प्लस’ का निशान दिखाई देगा, जिसका मतलब है कि इन्हें फोर्टिफाइड किया गया है। अब तो खाद्य पदार्थ बनाने वाली कई नामचीन कंपनियां एफएसएसएआई के साथ हैं।

प्रश्न- स्ट्रीट फूड की गुणवत्ता पर सवाल उठते रहते हैं। इस दिशा में एफएसएसएआई क्या कर रहा है?
उत्तर- स्ट्रीट फूड की गुणवत्ता पर सीधे सवाल उठाना ठीक नहीं है। कोई भी स्ट्रीट वेंडर ऐसा कुछ भी नहीं करेगा, जिससे उसका कारोबार प्रभावित हो। हां... वहां साफ-सफाई और कुछ अन्य बुनियादी दिक्कतें हैं। स्ट्रीट फूड बनाने में इस्तेमाल होने वाला पानी और खाद्य पदार्थों के सही तापमान पर स्टोरेज बड़ी समस्या है। इन समस्याओं के समाधान के लिए विभिन्न नगरपालिकाओं और निगर निगमों के साथ मिलकर कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। दोनों इनके लिए सुविधा विकसित कर रहे हैं। ग्रीन स्ट्रीट फूड हब बनवा रहे हैं। स्ट्रीट वेंडरों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम भी चलाए जाते हैं।


प्रश्न- पैकेजिंग को लेकर पिछले साल नए नियम बने थे। यह कितना लाभदायक रहा?
उत्तर- खाद्य पदार्थों की सही पैकेजिंग बहुत जरूरी है। ऐसा नहीं होने पर खाद्य पदार्थों के दूषित होने का खतरा रहता है, जिसके खाने से गंभीर बीमारियां फैल सकती हैं।  इसी को ध्यान में रखकर पिछले साल पैकेजिंग को लेकर नए नियम बनाए गए थे। इसका फायदा यह हुआ कि अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते खाद्य पदार्थ की गुणवत्ता बनी रहती है। हालांकि, इसकी कुछ सीमाएं भी हैं। नए नियमों के पालन को लेकर इस क्षेत्र की बड़ी कंपनियां तो मान जाती है, लेकिन छोटे कारोबारी इससे बचने के तरीके ढूंढते हैं। उन्हें मनाने की कोशिश चल रही है।

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