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मिशन शक्ति : जिस बैलेस्टिक मिसाइल से भारत ने मार गिराया सैटेलाइट, वह काम कैसे करती है
Wed, 27 Mar 2019 04:11 PM IST
संदीप भट्ट
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: संदीप भट्ट
Updated Wed, 27 Mar 2019 04:11 PM IST
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भारत ने धरती के लोअर अर्थ ऑर्बिट (निचली कक्षा) में मौजूद सैटेलाइट को मारकर एक महत्वपूर्ण सामरिक उपलब्धि हासिल की है। इसकी मदद से भारत अब अंतरिक्ष में किसी भी मिसाइल को नष्ट कर सकता है। इसके लिए भारत ने एक बैलिस्टिक मिसाइल का प्रयोग किया। आईए जानते हैं कि क्या होती है बैलिस्टिक मिसाइल और यह कैसे काम करती है...
तकनीकी रूप से बैलिस्टिक मिसाइल उस प्रक्षेपास्त्र को कहते हैं जिसका पथ अर्ध चंद्राकार या सब ऑर्बिटल होता है। इसका उपयोग किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इस मिसाइल को केवल पहले चरण में ही गाइड किया जाता है। उसके बाद का पथ कक्षीय यांत्रिकी (आर्बिटल मेकैनिक्स) के सिद्धांतो एवं बैलिस्टिक्स के सिद्धांतो से निर्धारित होता है।
बैलिस्टिक मिसाइल तीन स्टेज में काम करती है। जो लांच होने के तीसरे चरण में जाकर अपने टारगेट को नष्ट करती है। इस दौरान यह मिसाइल दो बार वायुमंडल और एक बार अंतरिक्ष का सफर करती है।
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बैलेस्टिक मिसाइल हवा और बाहरी अंतरिक्ष के माध्यम से अपने लक्ष्य तक जाती हैं। एक बैलिस्टिक मिसाइल जमीन से अंतरिक्ष और फिर जमीन तक यात्रा करती है। एक बैलिस्टिक मिसाइल अपने लक्ष्य को साधने के लिए पृथ्वी के चारों ओर पर्याप्त दूरी तय कर सकती है।
किसी भी अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल में कम से कम तीन चरण होते हैं। टेकऑफ के दौरान पहले चरण में रॉकेट मिसाइल को हवा में 2 से 3 मिनट तक हवा में ढकेलते हैं जिससे मिसाइल अंतरिक्ष में पहुंच जाती है। पहले चरण के रॉकेट के खत्म होने के बाद ये अपने आप मिसाइल से अलग हो जाते हैं।
दूसरे चरण में रॉकेट नंबर दो का काम शुरू होता है। इस चरण में प्रयोग किए जा रहे रॉकेट में तरल या ठोस कोई भी ईंधन होता है। जो रॉकेट को गति प्रदान करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ठोस ईंधन कम समय में तेजी से जलकर रॉकेट को ज्यादा उर्जा प्रदान करते हैं जबकि तरल ईंधन धीरे-धीरे जलकर ज्यादा समय तक उर्जा देते हैं।
ठोस और तरल ईंधन दोनों रॉकेट को समान दूरी तक पहुंचा सकते हैं लेकिन अधिकांश देश इस चरण में तरल ईंधन का प्रयोग करते हैं। क्योंकि इस ईंधन के प्रयोग करने की टेक्नोलॉजी ठोस की अपेक्षा ज्यादा उन्नत है।
इस चरण में मिसाइल अंतरिक्ष में प्रवेश करता है और एक अर्धचंद्राकार पथ पर आगे बढ़ता रहता है। इस समय मिसाइल की गति 24 हजार से 27 हजार किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। यह इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि अंतरिक्ष में हवा का कोई प्रतिरोध नहीं होता है।
तीसरे चरण में मिसाइल वातावरण में फिर से प्रवेश करती है और मिनटों के भीतर अपने लक्ष्य को हिट करती है। अगर आईसीबीएम के पास रॉकेट थ्रस्टर्स हैं, तो यह उन्हें अपने लक्ष्य की ओर बेहतर तरीके से साध सकता है। हालांकि वायुमंडल में प्रवेश के समय यह वातावरण की गर्मी का सामना कर सके इसके लिए इसमें विशेष रूप से उष्मारोधी परत से लैस किया जाता है। इसी चरण में मिसाइल अपने लक्ष्य को साधती है।
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तकनीकी रूप से बैलिस्टिक मिसाइल उस प्रक्षेपास्त्र को कहते हैं जिसका पथ अर्ध चंद्राकार या सब ऑर्बिटल होता है। इसका उपयोग किसी पूर्व निर्धारित लक्ष्य को नष्ट करने के लिए किया जाता है। इस मिसाइल को केवल पहले चरण में ही गाइड किया जाता है। उसके बाद का पथ कक्षीय यांत्रिकी (आर्बिटल मेकैनिक्स) के सिद्धांतो एवं बैलिस्टिक्स के सिद्धांतो से निर्धारित होता है।
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बैलिस्टिक मिसाइल तीन स्टेज में काम करती है। जो लांच होने के तीसरे चरण में जाकर अपने टारगेट को नष्ट करती है। इस दौरान यह मिसाइल दो बार वायुमंडल और एक बार अंतरिक्ष का सफर करती है।
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बैलेस्टिक मिसाइल हवा और बाहरी अंतरिक्ष के माध्यम से अपने लक्ष्य तक जाती हैं। एक बैलिस्टिक मिसाइल जमीन से अंतरिक्ष और फिर जमीन तक यात्रा करती है। एक बैलिस्टिक मिसाइल अपने लक्ष्य को साधने के लिए पृथ्वी के चारों ओर पर्याप्त दूरी तय कर सकती है।
किसी भी अंतरमहाद्वीपीय बैलेस्टिक मिसाइल में कम से कम तीन चरण होते हैं। टेकऑफ के दौरान पहले चरण में रॉकेट मिसाइल को हवा में 2 से 3 मिनट तक हवा में ढकेलते हैं जिससे मिसाइल अंतरिक्ष में पहुंच जाती है। पहले चरण के रॉकेट के खत्म होने के बाद ये अपने आप मिसाइल से अलग हो जाते हैं।
दूसरे चरण में रॉकेट नंबर दो का काम शुरू होता है। इस चरण में प्रयोग किए जा रहे रॉकेट में तरल या ठोस कोई भी ईंधन होता है। जो रॉकेट को गति प्रदान करता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ठोस ईंधन कम समय में तेजी से जलकर रॉकेट को ज्यादा उर्जा प्रदान करते हैं जबकि तरल ईंधन धीरे-धीरे जलकर ज्यादा समय तक उर्जा देते हैं।
ठोस और तरल ईंधन दोनों रॉकेट को समान दूरी तक पहुंचा सकते हैं लेकिन अधिकांश देश इस चरण में तरल ईंधन का प्रयोग करते हैं। क्योंकि इस ईंधन के प्रयोग करने की टेक्नोलॉजी ठोस की अपेक्षा ज्यादा उन्नत है।
इस चरण में मिसाइल अंतरिक्ष में प्रवेश करता है और एक अर्धचंद्राकार पथ पर आगे बढ़ता रहता है। इस समय मिसाइल की गति 24 हजार से 27 हजार किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। यह इसलिए संभव हो पाता है क्योंकि अंतरिक्ष में हवा का कोई प्रतिरोध नहीं होता है।
तीसरे चरण में मिसाइल वातावरण में फिर से प्रवेश करती है और मिनटों के भीतर अपने लक्ष्य को हिट करती है। अगर आईसीबीएम के पास रॉकेट थ्रस्टर्स हैं, तो यह उन्हें अपने लक्ष्य की ओर बेहतर तरीके से साध सकता है। हालांकि वायुमंडल में प्रवेश के समय यह वातावरण की गर्मी का सामना कर सके इसके लिए इसमें विशेष रूप से उष्मारोधी परत से लैस किया जाता है। इसी चरण में मिसाइल अपने लक्ष्य को साधती है।
बैलिस्टिक मिसाइल के प्रकार
अग्नि 4 मिसाइल
- बैटलफील्ड रेंज (BRBM): 124 मील (200 किलोमीटर) से कम
- सामरिक (TAC): 93 से 186 मील (150 - 300 किमी)
- शॉर्ट रेंज (SRBM): 621 मील (1,000 किमी) से कम
- थियेटर (TBM): 186 के बीच - 2,175 मील (300 - 3,500 किमी)
- मध्यम रेंज (MRBM): 621 के बीच - 2,175 मील (1,000 - 3,500 किमी)
- इंटरमीडिएट रेंज (IRBM) या लॉन्ग रेंज (LRBM): 2,175 के बीच - 3,418 मील (3,500 - 5,500 किमी)
- इंटरकांटिनेंटल (ICBM): 3,418 मील (5,500 किमी) से अधिक