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Hindi News ›   India News ›   Indus Valley civilization now reaches back to 7,200 BC from 3000 BC

और पीछे चला गया इतिहास, सिंधु घाटी सभ्यता अब 3000 ईसा पूर्व से 7200 ईसा पूर्व जा पहुंची

Fri, 21 Sep 2018 05:38 PM IST
जीतेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जीतेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 21 Sep 2018 05:38 PM IST
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Indus Valley civilization now reaches back to 7,200 BC from 3000 BC
harappa-civilisation
दुनिया बदल रही है, इतिहास बदल रहा है। नित्य नई खोजों ने भारत की सबसे प्राचीन नगरीय सभ्यता यानी सिंधु घाटी सभ्यता, जिसे हड़प्पा-मोहनजोदड़ो भी कहा जाता है, अब इसके प्रारंभ की तिथियां बदल रही हैं। इनका इतिहास काफी पीछे चला गया है। अभी तक सिंधु घाटी सभ्यता का उद्भव 3000 ईसा पूर्व के आसपास माना जाता है, लेकिन अब खुदाई में जो सबूत मिल रहे हैं, इससे सिंधु घाटी सभ्यता 7200 ईसा पूर्व में जा पहुंची है। जल्द ही एनसीईआरटी, सीबीएसई व दूसरे शिक्षण संगठन इन नई तिथियों को अपनी किताबों में जगह देंगे।
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राष्ट्रीय संग्रहालय के महानिदेशक एवं राष्ट्रीय संग्रहालय संस्थान के कुलपति डॉ. बुद्धरश्मि मणि जो कि अपनी देख-रेख में खुदाई का काम करा रहे हैं- का कहना है, पहले छह सौ ईसा पूर्व से भारत की सिंधु घाटी सभ्यता का प्रारंभ होना माना गया था। बाद में जब खुदाई कार्य आगे बढ़ा तो यह तिथि पीछे सरकते-सरकते तीन हजार ईसा पूर्व में पहुंच गई।
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देश आजाद होने तक ऐसी करीब 40 जगहों का पता चल चुका था, जो किसी न किसी तरह भारत की नगरीय सभ्यता से जुड़ी रही थी। बंटवारे के वक्त इनमें से अधिकांश स्थल पाकिस्तान में चले गए। भारत में इस तरह के स्थलों में से केवल गुजरात और राजस्थान ही बचे थे। कालीबंगा, लोथल, राखीगढ़ी, धोलावीरा व हड़प्पा के बाद भिरडाणा का नाम सिंघु घाटी सभ्यता के स्थलों में प्रमुख तौर पर लिया जाता है।
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सेटेलाइट की मदद से सरस्वती नदी मिल गई
   
डॉ. मणि के अनुसार, सेटेलाइट की मदद से जब इन सभ्यताओं को खोजना शुरू किया तो इतिहास बहुत पीछे जाता हुआ दिखाई दिया। भारत-पाकिस्तान में करीब 2900 नए स्थल मिल गए। इनमें से 23 सौ भारत में और छह सौ पाकिस्तान में हैं।

सेटेलाइट के जरिए सरस्वती नदी जो कि लुप्त हो चुकी थी, उसका पता चल गया है। जो नए स्थल मिले हैं, उनमें से ज्यादातर सरस्वती नदी के किनारे पर हैं। खोज में सामने आया है कि अतीत में भौगोलिक बदलावों के चलते सरस्वती नदी का मार्ग अवरुद्ध हो गया था।

इस वजह से नदी की बहाव की दिशा बदल गई और इसके बाद ही सतलुज और यमुना का उद्भव हुआ। फ्रांस के पुरातत्व विद वेदा जेरिज ने पाकिस्तान के ब्लूचिस्तान इलाके में मेहरगढ़ नामक स्थान पर जब खुदाई की तो उन्हें सात हजार ईसा पूर्व तक के अवशेष मिल गए।

Indus Valley civilization now reaches back to 7,200 BC from 3000 BC
harappa-civilisation

भारत में 72 सौ ईसा पूर्व नगरीय सभ्यता होने का पुख्ता प्रमाण मिला है

हरियाणा के फतेहाबाद के भिरडाणा में डॉ. मणि ने जब खुदाई कार्य शुरू किया तो उन्हें 72 सौ ईसा पूर्व सभ्यता विकसित होने का प्रमाण मिल गया है। यहां से निकली मिट्टी के नमूने यानी चारकोल कार्बन-14 की जांच हुई तो एक दम सिंधु घाटी सभ्यता का इतिहास 72 सौ ईसा पूर्व में पहुंच गया। भिरडाणा से 25 किलोमीटर दूर जब खुदाई की गई तो एक अन्य स्थल भी मिल गया। यह कुणाल में स्थित है।

यहां पर दो सीजन की खुदाई हो चुकी है। अब अक्टूबर में यहां पर खुदाई की तीसरा सीजन शुरू होगा। यहां की मिट्टी में पाए गए चारकोल-कार्बन 14 को अमेरिका की फ्लोरिडा लैब में भेजा गया है। जांच रिपोर्ट में छह हजार ईसा पूर्व सभ्यता होने के प्रमाण मिले हैं। कुछ जगहों पर 25 सौ से चार हजार ईसा पूर्व की सभ्यता के प्रमाण भी मिल रहे हैं।

डार्क एज...किताबों से अब यह चैप्टर हट जाएगा, सस्पेंस खत्म

अभी तक हमारे देश में डार्क एज को लेकर सस्पेंस बरकरार था। सामान्यत: इतिहास में 15 सौ ईसा पूर्व से लेकर 600 ईसा पूर्व के बीच के काल को डार्क एज माना गया है। कहा जाता है कि इस काल में हड़प्पा सभ्यता खत्म हो गई थी। इसे बुद्ध के आने से पहले का समय भी माना जा सकता है। इन एक हजार साल का कहीं किसी को कुछ नहीं मालूम था। जो चीजें छह सौ ईसा पूर्व से लेकर तीन सौ ईसा पूर्व के बीच मिली थी, अब वैसी वस्तुएं 15 सौ ईसा पूर्व, 1000 ईसा पूर्व, 900 और 800 सौ ईसा पूर्व में भी मिल रही हैं।

इटालियन मिशन ने कपिलवस्तु (नेपाल) में भी ऐसे ही कुछ अवशेष ढूंढ निकाले हैं। संग्रहालय के महानिदेशक बताते हैं कि न यूपी, न बिहार और न ही राजस्थान में डार्क एज बाबत कुछ मिल पा रहा था। अब हरियाणा में चल रही खुदाई के दौरान जो मिट्टी या अवशेष मिले हैं, उससे साबित हो गया है कि डार्क एज में भी सिंधु घाटी सभ्यता का अस्तित्व मौजूद था।

खास बात है कि डार्क एज की सभ्यता पता बताने वाली मिट्टी के चारकोल के सेंपल तीन लैब अमेरिका, दिल्ली और लखनऊ में भेजे गए थे। तीनों ही लैब से एक जैसी रिपोर्ट प्राप्त हुई है। आने वाले समय में स्टूडेंट को इतिहास की किताबों में डार्क एज के सस्पेंस का सामना नहीं करना पड़ेगा।

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