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इंदिरा गांधी की अप्रिय विरासत

Sun, 19 Nov 2017 09:10 AM IST
नई जमीन डेस्क, अमर उजाला
नई जमीन डेस्क, अमर उजाला Updated Sun, 19 Nov 2017 09:10 AM IST
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indira gandhi Offensive legacy by ramchandra guha on 100th birth anniversary
Indira Gandhi

छह वर्ष पूर्व मैंने 1967 से 1973 के दौरान प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रमुख सचिव रहे पी एन हक्सर के आधिकारिक पत्र व्यवहार को पढ़ने में कई महीने बिताए थे। हक्सर ने मुझे अपनी देशभक्ति और विद्वता से प्रभावित किया। वह बहुत गहराई से अपने देश से प्रेम करते थे और पूरे उत्साह के साथ उसकी प्रगति और समृद्धि की कामना करते थे। इतिहास और मानविकी का उन्होंने विस्तृत अध्ययन किया था और विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भी उनकी खासी दिलचस्पी थी। इसके साथ ही हक्सर खुद पर संदेह कर व्यथित नहीं होते थे। उनके दस्तावेज पढ़कर मैं काफी प्रभावित हुआ, बल्कि अचंभित हुआ कि आखिर कैसे वह अपनी विशेषज्ञता से संबंधित क्षेत्र से इतर क्षेत्रों में भी नीतियों के निर्धारण और नियुक्तियों वगैरह को लेकर खुद के बारे में पूरी तरह से आश्वस्त थे।

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हक्सर की बॉस, जिनकी आज जन्मशती है, उनकी तरह देशभक्त और खुद पर बहुत यकीन करती थीं। इंदिरा गांधी ने भारत के लिए जिया और उसी के लिए मरीं, और वह सोचती थीं कि किसी भी अन्य भारतीय की तुलना में वह अच्छी तरह से जानती हैं कि भारत के लिए क्या अच्छा और श्रेष्ठ हो सकता है। लिहाजा संसद में उनकी दिलचस्पी कम थी और विपक्ष के प्रति प्रच्छन्न अवमानना का भाव स्पष्ट था। आपातकाल के दौरान विपक्षियों को जेल भेजने से काफी पहले से उनका यह व्यवहार साफ दिखता था। इसी तरह उन्होंने कांग्रेस के भीतर पार्टी की आंतरिक लोकतंत्र की संस्कृति को ध्वस्त कर दिया, जिससे उनकी पार्टी और उनका पूरा मंत्रिमंडल उनकी इच्छा और सनक का गुलाम बन गए।
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लोकतंत्र की सेहत संसद के सुचारु संचालन और मजबूत तथा प्रभावी विपक्ष पर निर्भर करती है। और यह स्वायत्त और स्वतंत्र सार्वजनिक संस्थानों पर भी महत्वपूर्ण ढंग से निर्भर करती है। 1950 के दशक में नौकरशाही और नियामक संस्थानों के शीर्ष पदों का आवंटन तय करने में सत्तारूढ़ दल के राजनीतिज्ञों की कोई भूमिका नहीं होती थी। इंदिरा गांधी के आगमन के बाद यह बदल गया, जिनके सहयोगी पी नए हक्सर ने 'वफादार नौकरशाह' का विचार आगे रखा और आगे चलकर इसका विस्तार 'वफादार न्यायपालिका' तक कर दिया। कभी भारत सरकार के वरिष्ठ पदों पर वरिष्ठ नौकरशाहों का चयन उनके सुस्थापित रिकॉर्ड के आधार पर किया जाता था। अब वरिष्ठ पदों पर नियुक्ति के लिए यह भी एक कारक बन गया कि क्या प्रधानमंत्री संबंधित अधिकारी को पसंद करते हैं या फिर उनके नाम को उन्होंने मंजूरी दी है।

कश्मीरी पंडित थे हक्सर

indira gandhi Offensive legacy by ramchandra guha on 100th birth anniversary
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी
हक्सर कश्मीरी पंडित थे। जैसा कि उस वक्त प्रधानमंत्री के कुछ और सलाहकार भी थे। हालांकि नस्लीय मूल करियर की संभावनाओं के लिए अहम कारक नहीं था, बल्कि जो चीज मायने रखती थी, वह थी नेता और उसकी विचारधारा के प्रति गहरी वफादारी। वह तमिल हो या बंगाली, हिंदू हो या मुस्लिम, एक'वफादार' नौकरशाह को श्रीमती गांधी के ब्रांड के समाजवाद पर यकीन करना होता था और उनके द्वारा संसदीय प्रक्रिया को नजरंदाज किए जाने को चुपचाप स्वीकार करना होता था। और उसे तब भी पूरी वफादारी दिखानी होती थी, जब उससे सांविधानिक प्रक्रिया के उलट या उसके अपने कार्यालय की परंपरा के विपरीत काम करने के लिए कहा जाता था।

मेरा कतई आशय यह नहीं है कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने से पहले हमारे यहां बहुत शानदार और सक्षम नौकरशाह होते थे। नेहरू और शास्त्री के समय यदि सक्षम, केंद्रित और कठोर परिश्रम करने वाले अधिकारी थे, तो उनके साथ ही सुस्त, अक्षम और भ्रष्ट अधिकारी भी हुआ करते थे। लेकिन अच्छे,खराब या तटस्थ, चाहे जैसे भी हों, शीर्ष अधिकारियों और जजों की नियुक्तियां प्रधानमंत्री से निरपेक्ष रहकर की जाती थी और वे इसी तरह काम भी करते थे। संस्था की स्वायत्तता को अक्षुण्ण रखा गया था। इंदिरा गांधी के आगमन के बाद यह बदल गया। अब राजनीति और व्यक्तित्व ने कार्यपालिका और न्यायपालिका के काम को बाधित करना शुरू कर दिया।

सार्वजनिक संस्थानों की स्वायत्तता एक बार जीर्ण-शीर्ण होने के बाद दोबारा दुरुस्त नहीं की जा सकी। इंदिरा गांधी की मौत के बाद इस क्षरण ने दूसरा रूप ले लिया। यह और अधिक विकेंद्रीकृत हो गया। बाद के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की तरह ताकतवर नहीं थे, लिहाजा मंत्रियों ने दखल देने के साथ ही वरिष्ठ पदों पर नियुक्तियां करनी शुरू कर दीं। इसमें जाति और नस्ल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बेशक, मंत्री के प्रति वफादारी तो मायने रखती ही थी, लेकिन यदि आप उसकी जाति, धर्म, भाषा के हों या उसके राज्य से आते हों तो उससे बड़ी मदद मिलती।

यदि यह लंबा निबंध होता तो मैं इंदिरा गांधी के करियर का विस्तृत विश्लेषण करता। मैं उनके सकारात्मक योगदान के बारे में लिखता, जैसा कि बांग्लादेश युद्ध की विजय, शास्त्री और सी सुब्रमण्यिम के खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम को आगे बढ़ाना, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की स्थापना, हमारी महान शिल्प कलाओं को प्रोत्साहन और भारत महोत्सवों के सफलतापूर्वक प्रयोजन पर लिखता। इसके बाद मैं उनके कुछ और नकारात्मक योगदान के बारे में लिखता, मसलन लाइसेंस परमिट कोटा राज और स्वतंत्रता संग्राम की एक महान पार्टी को अपनी पारिवारिक फर्म में परिवर्तित कर देने के बारे में।
एक छोटे कॉलम को तीक्ष्ण तरीके से केंद्रित होना चाहिए और मैंने जो विषय चुना, वह वर्तमान के लिहाज से अत्यंत उचित है।

इंदिरा गांधी के विपरीत नरेंद्र मोदी गरीबी में पैदा हुए और वंचित रहे। वह बिल्कुल अलग वैचारिक परंपरा से आते हैं। लेकिन उनकी राजनीतिक शैली उल्लेखनीय रूप से मिलती-जुलती है। संसदीय बहस को वह तरजीह नहीं देते और वह विपक्ष से घृणा कर सकते हैं (जरा उनके द्वारा कांग्रेस को दीमक बताए जाने पर गौर कीजिए)। इंदिरा गांधी की तरह वह व्यक्तिगत और वैचारिक वफादारी को महत्व देते हैं। (यह तथ्य इत्तफाक नहीं हो सकता कि भारत सरकार के अनेक शीर्ष पदों पर गुजरात कॉडर के अधिकारी काबिज हैं।) नरेंद्र मोदी की सरकार को अभी चार वर्ष पूरे नहीं हुए हैं, लेकिन सार्वजनिक संस्थानों पर नियंत्रण, संचालन और उनके विध्वंस के मामले में इसने इंदिरा गांधी की सरकार जैसे काम कर लिए हैं। इसने नौकरशाही को अपने अधीन कर लिया है, रिजर्व बैंक और चुनाव आयोग की स्वायत्तता को कमजोर किया है और अब उसकी नजर न्यायपालिका और सशस्त्र बलों पर है। कांग्रेस मुक्त भारत की अपनी चर्चा के बीच सार्वजनिक संस्थानों पर नियंत्रण की आकांक्षा रखने वाली भाजपा लंबे समय तक पद पर रहीं कांग्रेस की प्रधानमंत्री से ही प्रेरित लगती है। इस संदर्भ में कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी इंदिरा गांधी के वास्तविक राजनीतिक वारिस हैं।

(यह लेख इतिहासकार और लेखक रामचंद्र गुहा ने लिखा है)
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