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अमेरिका की तर्ज पर बॉर्डर की बेहतर चौकसी के लिए अब स्पेस तकनीक का इस्तेमाल होगा
Fri, 18 Jan 2019 09:17 AM IST
अमर शर्मा
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमर शर्मा
Updated Fri, 18 Jan 2019 09:17 AM IST
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उपग्रह संचार प्रणाली
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अमेरिका की तर्ज पर बॉर्डर की बेहतर चौकसी एवं प्रबंधन के लिए अब बड़े पैमाने पर स्पेस तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने गुरुवार को एमएचए की टास्क फोर्स द्वारा तैयार रिपोर्ट को अपनी मंजूरी दे दी है। इस टास्क फोर्स को सीमा प्रबंधन में सुधार के लिए अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग पर रिपोर्ट तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। रिपोर्ट को अंतिम रूप देने से पहले संयुक्त सचिव (सीमा प्रबंधन), अंतरिक्ष विभाग (इसरो) बॉर्डर की सुरक्षा में लगे अर्धसैनिक बल, रक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद सचिवालय (NSCS) सहित सभी हितधारकों से परामर्श किया गया है।
फिलहाल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिए जिन क्षेत्रों की पहचान की गई है, उनमें द्वीप का विकास, सीमा सुरक्षा, संचार और नेविगेशन, जीआईएस संचालन योजना प्रणाली व सीमा अवसंरचना विकास शामिल है। परियोजना को समयबद्ध तरीके से निष्पादित करने के लिए इसरो और रक्षा मंत्रालय का सहयोग लिया जाएगा।
रिपोर्ट में पांच साल के दौरान एक छोटी, मध्यम और दीर्घकालिक योजना भी प्रस्तावित की गई है। छोटी अवधि में बॉर्डर की सुरक्षा करने वाले बलों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च संकल्प इमेजरी उपकरणों की खरीद एवं संचार के लिए उच्च क्षमता वाले बैंडविड्थ मुहैया कराए जाएंगे।
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भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) आधारित जीपीएस, अत्याधिक ऊंचाई, दूरदराज के इलाके, मुश्किल सीमाओं और नक्सल क्षेत्रों में परिचालन दलों के लिए नेविगेशन सुविधाएं प्रदान करेगा। बीएसएफ को ग्राउंड सेगमेंट और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना के लिए मुख्य एजेंसी के रूप में नामित किया गया है।
अंतरिक्ष विभाग की सहायता से गृह मंत्रालय उक्त परियोजना को लागू करेगा। यह परियोजना द्वीप और सीमा सुरक्षा को मजबूत करेगी। साथ ही इससे सीमा एवं द्वीप क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिलेगी।
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फिलहाल अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग के लिए जिन क्षेत्रों की पहचान की गई है, उनमें द्वीप का विकास, सीमा सुरक्षा, संचार और नेविगेशन, जीआईएस संचालन योजना प्रणाली व सीमा अवसंरचना विकास शामिल है। परियोजना को समयबद्ध तरीके से निष्पादित करने के लिए इसरो और रक्षा मंत्रालय का सहयोग लिया जाएगा।
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रिपोर्ट में पांच साल के दौरान एक छोटी, मध्यम और दीर्घकालिक योजना भी प्रस्तावित की गई है। छोटी अवधि में बॉर्डर की सुरक्षा करने वाले बलों की तत्काल जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च संकल्प इमेजरी उपकरणों की खरीद एवं संचार के लिए उच्च क्षमता वाले बैंडविड्थ मुहैया कराए जाएंगे।
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उपग्रह संचार प्रणाली से मिलेगी सुविधा
दूसरी मध्यम योजना के तहत इसरो द्वारा गृह मंत्रालय के अनन्य उपयोग के लिए एक उपग्रह लॉन्च होगा। लंबी अवधि वाली परियोजना में सैटेलाइट सेगमेंट को साझा करने के लिए ग्राउंड सेगमेंट और नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास किया जाएगा। अलग-अलग जगह से मिलने वाले इमेजरी रिसोर्स को स्टोर करने के लिए एक सेंट्रल आर्काइव फैसिलिटी सेंटर विकसित करेंगे। जो सुरक्षा बल सुदूर क्षेत्रों में ड्यूटी दे रहे हैं, उनकी तैनाती भी उपग्रह संचार प्रणाली द्वारा समन्वित की जाएगी।भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) आधारित जीपीएस, अत्याधिक ऊंचाई, दूरदराज के इलाके, मुश्किल सीमाओं और नक्सल क्षेत्रों में परिचालन दलों के लिए नेविगेशन सुविधाएं प्रदान करेगा। बीएसएफ को ग्राउंड सेगमेंट और नेटवर्क इंफ्रास्ट्रक्चर की स्थापना के लिए मुख्य एजेंसी के रूप में नामित किया गया है।
अंतरिक्ष विभाग की सहायता से गृह मंत्रालय उक्त परियोजना को लागू करेगा। यह परियोजना द्वीप और सीमा सुरक्षा को मजबूत करेगी। साथ ही इससे सीमा एवं द्वीप क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे के विकास को गति मिलेगी।