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भारत के 22 फीसदी गरीबी रेखा के नीचे, 39% बच्चे कुपोषित

Wed, 22 Feb 2017 07:17 PM IST
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली
टीम डिजिटल/ अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Wed, 22 Feb 2017 07:17 PM IST
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indian goverment aim to zero hunger, no poverty, reducing inequalities
वर्ष 2014 में जहां 1 फीसदी अमीर दुनियाभर की 48 फीसदी संपत्ति के मालिक थे। वहीं, इससे 80 फीसदी लोगों के हिस्से 6 फीसदी धन ही था। इस असमानता में बराबरी तब नजर आती है जब ये आंकड़ा सामने आता है कि कुल 3.5 बिलियन आबादी की तुलना में सिर्फ 80 लोगों के पास ही सबसे ज्यादा संपत्ति है।
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विकासशील देशों में 1990 से 2010 के बीच आमदनी में असमानता करीब 11 फीसदी देखी गई है। करीब 75 फीसदी आबादी सोसाइटीज में रह रही है जहां 1990 से भी ज्यादा असमानता आमदनी में देखी गई। हालांकि देशों के बीच आमदनी पर असमानता घटी है, लेकिन देश के भीतर असमानता बढ़ी है। असमानता देश की प्रगति में बाधा है। मसलन वर्ष 2000 में दक्षिण एशिया में अमीर देशों के बच्चे गरीब बच्चों के मुकाबले अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने में दो गुना ज्यादा सफल रहे थे।
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वहीं पूर्वी एशिया में अमीर बच्चों के मुकाबले गरीब बच्चे पांच वर्ष की आयु में तीन फीसदी ज्यादा मरते हैं । ये कहा जा रहा है कि गरीबी हटाने के लिए आर्थिक विकास तभी संभव है अगर वो सतत होता रहे। गोल 10 के मुताबिक अंतर्राष्ट्रीय समुदाय का ये दायित्व है कि निम्न वर्ग के 40 फीसदी लोगों की आय वर्ष 2030 तक राष्ट्रीय औसत से ज्यादा हो। असमानता में कमी लाने के लिए ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत है जिसमें देश दबी कुचली जनता को ध्यान में रखा जाए।
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वैश्‍विक सिस्टम को दुरूस्त करने के लिए वैश्‍विक फाइनेंशियल मार्केट में बदलाव करने की आश्यकता है। साथ ही विकासशील देशों को वैश्‍विक नीतियां बनाने में ज्यादा भागीदारी निभाने की जरूरत है। भारत के लिए आय असमानता का गिनी गुणांक 2010 के 36.8% से घटकर 2015 में 33.6% हो गया। भारत सरकार का जोर जन धन-आधार-मोबाइल से जुड़े कार्यक्रमों को जोर शोर से बढ़ाने का है जिससे वित्तीय सशक्तिकरण और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो।

इस दुनिया में सभी व्यक्तियों का पेट भरने के लिए प्रचुर मात्रा में खाद्य पदार्थ उपलब्ध है इसके बावजूद हर नौ में से एक व्यक्ति यहां भुखमरी का शिकार है। इनमें से दो तिहाई व्यक्ति एशिया में हैं। अगर इसपर गंभीरता से विचार नहीं किया गया तो एक आकलन के मुताबिक 2050 तक 2 अरब लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं।

दक्षिण एशिया की बात की जाए तो यहां 281 मिलियन लोग भुखमरी के शिकार हैं, इनमें से 40% आबादी भारत में रहती है। भारत की 50% महिलाएं एनीमिया(खून की कमी) की शिकार है। एक तिहाई बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। 80% से ज्यादा नवजात और कम उम्र के बच्चों को उचित खुराक नहीं मिलती है।

पूरी दुनिया में कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देता है। दुनिया की 40 प्रतिशत आबादी कृषि क्षेत्र में लगी है, लेकिन भारत में यह आंकड़ा 54.6% प्रतिशत है। भारत की आधी से ज्यादी कृषि क्षेत्र में लगी हुई है, इसके बावजूद भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान सिर्फ 15 प्रतिशत है। भारत सरकार ने कृषि क्षेत्र में स्थिति को सुधारने के लिए इसे प्राथमिकता में रखा है। सरकार सिंचाई के क्षेत्र में वृद्धि, फसलों की बीमा और बीजों के नए क्वालिटी के जरिए इस स्थिति को सुधारने का प्रयास किया है।

यह सुधार नितांत आवश्यक है क्योंकि अगर वैश्विक स्तर पर खाद्य पदार्थों के दामों में लगभग दोगुना का बढ़ोत्तरी हो जाती है तो भारत की जीडीपी में 49 बिलियन अमेरिकी डॉलर की कमी आएगी।

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दुनिया भर में आज लगभग 800 मिलियन लोग अत्ंयत गरीबी में जीबन जीने को मजबूर हैं। जहां 1 फीसदी अमारों के पास दुनियाभर की 48 फीसदी संपत्ति है वहीं लगभग हर पांचवा व्यक्ति 100 रुपए से कम में जीवन जीने को मजबूर है। हमारे समय का यह सबसे भयावह सच है।

भारत की 22 फीसदी आबादी गरीबी रेखा के नीचे आती है। यहां हर पांचवां आदमी गरीबी में जीवन जीने को मजबूर है। इस गरीबी का सबसे बुरा असर बच्चों पर पड़ा है। भारत के 39 प्रतिशत बच्चे कुपोषण के शिकार हैं।

2030 तक भारत के धारणीय विकास के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सामाजिक सुरक्षा, मूलभूत सेवाओं तक लोगों की पहुंच, बिना किसी प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचाए उनके रहने का इंतजाम करना होगा। देश के विकास में गरीहों को भी समाहित करना होगा। जो भी लाभ मिले उसे अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना होगा
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