वीर सावरकर: अंडमान से लेकर लंदन तक आयोजित होंगे 75 विशेष कार्यक्रम, इतिहास में 'सम्मान' दिलाने की कोशिश
इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च के निदेशक स्तर के एक अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि सरकार का मानना है कि वीर सावरकर को इतिहास में उनकी उचित भूमिका नहीं दी गई। वैचारिक संकीर्णता के चलते सावरकर को इतिहास में एक 'खलनायक' की तरह दिखाया गया, जबकि वे कट्टर राष्ट्रभक्त थे और इसके लिए उन्होंने 'काले पानी' की सजा भी दी गई थी...
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वीर सावरकर के नाम पर देश में राजनीति जारी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और अन्य नेता सावरकर के बलिदान को दोबारा इतिहास में 'उचित' स्थान दिलाने की बात कर रहे हैं तो विपक्ष इसे इतिहास के साथ 'छेड़छाड़' बता रहा है। लेकिन इसी बीच इतिहास विभाग सावरकर को लेकर अंडमान निकोबार, नागपुर, दिल्ली से लेकर लंदन तक में सावरकर पर 75 विशेष कार्यक्रम आयोजित करने जा रहा है। इन कार्यक्रमों में सावरकर के एतिहासिक कार्यों को याद करते हुए इतिहास में उनकी भूमिका पर चर्चा की जाएगी।
इंडियन काउंसिल फॉर हिस्टॉरिकल रिसर्च के निदेशक स्तर के एक अधिकारी ने अमर उजाला को बताया कि सरकार का मानना है कि वीर सावरकर को इतिहास में उनकी उचित भूमिका नहीं दी गई। वैचारिक संकीर्णता के चलते सावरकर को इतिहास में एक 'खलनायक' की तरह दिखाया गया, जबकि वे कट्टर राष्ट्रभक्त थे और इसके लिए उन्होंने 'काले पानी' की सजा भी दी गई थी। उनकी भूमिका को लेकर सबसे ज्यादा विवाद हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रति उनके विचारों को लेकर हैं।
अधिकारी के अनुसार, सच्चाई यह है कि वीर सावरकर ने एक समय हिंदू और मुसलमान को भारत माता की दो आंखें करार दिया था। हालांकि बाद में कुछ अन्य घटनाओं को देखते हुए उनके विचार बदल गए थे। लेकिन इस बात को नहीं झूठलाया जाना चाहिए कि शुरुआती दौर में वे पूरी तरह हिंदू-मुस्लिम एकता की पोषक थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान सरकार सावरकर की देशभक्ति की भूमिका को जनता के सामने लाकर इतिहास का पुनरलेखन करना चाहती है।
अधिकारी ने बताया कि वर्तमान इतिहास केवल एक विशेष दृष्टिकोण से पढ़ा और पढ़ाया गया। आरोप है कि इसमें राष्ट्रवादी चेतना को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया। उन्होंने कहा कि भारत के अलग-अलग वर्गों ने लंबे समय में अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण रखने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी है। यह लड़ाई कभी मजदूरों ने लड़ी, कभी किसानों ने लड़ी, कभी सन्यासियों ने लड़ी तो कभी आदिवासियों ने लड़ी।
इस भूमिका को जिसे ज्यादा उभार कर भारत के संघर्षशील इतिहास को ज्यादा महत्व दिया जाना चाहिए था, उसे भुलाकर तुर्कों-मुगलों के आक्रमण तक इतिहास को समेट कर रख दिया गया। सरकार इस भूमिका को मुगलों के शासन काल को एक सीमित कालखंड में दिखाकर भारत के व्यापक संघर्षशील इतिहास को देश के सामने पेश करना चाहती है और इसके लिए प्रयास चल रहा है।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के नेता कुमार अंजान ने कहा कि वर्तमान सरकार अपनी सत्ता की ताकत का उपयोग करते हुए उन लोगों को भी शहीद और वीर घोषित करने की कोशिश कर रही है जो अंग्रेजों के साथ मिले हुए थे। उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता भारत से ज्यादा अंग्रेजों के प्रति हुआ करती थी। सावरकर की भूमिका को इसी प्रकार से जानबूझकर जबरदस्ती महिमामंडित करने की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इसे एक नकारात्मक सोच बताया।
दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रोफेसर के अनुसार
इतिहास विचारधारा के अनुसार अपनी मनमर्जी से 'छेड़छाड़' की चीज नहीं है। यह प्रमाणों, तर्कों और साक्ष्यों के ऊपर निर्भर करती है। किसी भी वस्तु पर दो अलग-अलग विचारधारा के लोगों की राय अलग-अलग हो सकती है, लेकिन छात्रों के संपूर्ण विकास के लिए इस तथ्य को सामने रखते हुए दोनों विचारों को पेश करना चाहिए, जिससे छात्र सभी विचारों को पढ़कर एक उचित निष्कर्ष स्थापित कर सकें। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो किसी भी एक विचारधारा के साथ अन्याय होता है।
वर्तमान में इतिहास के पुनर्लेखन की जो कोशिशें चल रही हैं, इसमें भी दुर्भाग्य से वही गलती दोहराई जा रही है जो कभी इसके पहले राष्ट्रवादी विचारधारा के साथ हुई थी। उस समय राष्ट्रवादी विचारधारा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था, तो अब वामपंथी विचारधारा को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा है। इससे एक बार फिर इतिहास की एक विशेष विचारधारा से प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया है। यह उचित नहीं है।