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केरल बाढ़: इस नीति की वजह से केंद्र सरकार ने यूएई की मदद को किया खारिज

Fri, 24 Aug 2018 12:28 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Fri, 24 Aug 2018 12:28 PM IST
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India turned down the UAE offer of financial assistance to Kerala because of 2004 policy

बुधवार को भारत ने यूएई के इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया जिसमें उसने बाढ़ प्रभावित राज्य केरल को 700 करोड़ रुपए की सहायता राशि देने की पेशकश की थी। सरकार ने यह फैसला 2016 में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (एनडीएमपी) के बावजूद लिया। इस योजना के अनुसार भारत विदेशी सहायता ले सकता है। हालांकि एनडीएमपी एक अलग नीति है जिसका पालन 2004 में आई सुनामी के बाद से नई दिल्ली करता है।

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एनडीएमपी को मई 2016 में अंतिम रूप दिया गया था। उसके अनुसार, भारत सरकार आपदा के चलते विदेशी सहायता के लिए कोई अपील जारी नहीं करती है। यदि कोई मित्र देश पीड़ितों की सहायता के लिए खुद आगे बढ़ते हुए सौहार्दपूर्ण सकेंत देते हुए मदद का प्रस्ताव देती है तो केंद्र सरकार उसे स्वीकार लेगी। इसके मुताबिक गृह मंत्रालय को विदेश मंत्रालय के साथ समन्वय करना होगा। जो मुख्य रूप विदेशी प्रस्तावों की समीक्षा और इनका प्रसारण करने के लिए जिम्मेदार है।
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जहां एक तरफ 2016 के दिशा-निर्देश ज्यादातर कागजों पर हैं वहीं सरकार ने तय किया है कि वह 2004 में तय आपदा सहायता नीति का पालन करेगी। उस समय प्रधानमंत्री रहे मनमोहन सिंह ने कहा था, 'हमें लगता है कि हम इन परिस्थितियों से खुद निपट सकते हैं और यदि जरुरत महसूस होगी तो हम मदद लेंगे।' तब से अब तक नई दिल्ली ने फैसला लिया है कि वह विदेशी सरकारों की मदद को नहीं अपनाएगी।
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प्रधानमंत्री सिंह ने विदेशी सहायता पर एनडीए-1 सरकार की व्यापक नीति को आगे बढ़ाया था। यह विचार था कि भारत अब एक बहुत बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुकी है और विदेशों से छोटी राहत राशि लेना आज के हिसाब से फिट नहीं बैठता है। इस विचार ने सबसे पहले अपनी जड़ें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पहले पूरे कार्यकाल के दौरान लिया गया था।


वाजपेयी के कार्यकाल में तीन सालों तक विदेश मंत्रालय का प्रभार संभालने वाले जसवंत सिंह ने एक विश्वव्यापी आयोजन करते हुए कहा था कि वैश्विक दुनिया में अमीर द्वारा गरीबों की सहायता करना अप्रासंगिक हो गया है। वित्त मंत्री के तौर पर अपने 6 महीने के कार्यकाल में उन्होंने एक संकेत के जरिए भारत की निर्भरता विदेशों पर कम करने की कोशिश की थी।

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