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'भारत के आंतरिक मामलों में दखल न दें': दिल्ली प्रदर्शन पर एमईए की दो टूक, यूएन की विश्वसनीयता पर भी उठाए सवाल
Sun, 11 Oct 2026 11:23 AM IST
अमन मौर्या
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: अमन मौर्या
Updated Sun, 11 Oct 2026 11:23 AM IST
सार
दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन पर मानवाधिकार उच्चायुक्त की टिप्पणी पर विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। एमईए ने स्पष्ट किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां कानून और संविधान सर्वोच्च हैं।
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रणधीर जायसवाल, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता
- फोटो : ANI
विस्तार
दिल्ली में हुए विरोध-प्रदर्शन को लेकर मानवाधिकार के बयान के बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने प्रतिक्रिया दी है। एमईए ने कहा कि हमने नई दिल्ली में कल हुई घटनाओं के बारे में मानवाधिकारों के लिए उच्चायुक्त कार्यालय की कुछ टिप्पणियां देखी हैं। एमईए ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां हमारे संविधान में शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होने के अधिकार की गारंटी दी गई है और मजबूत संस्थाओं, स्वतंत्र न्यायपालिका और आजाद मीडिया द्वारा इसकी सुरक्षा की जाती है। हर लोकतंत्र की तरह, भारतीय नागरिक भी सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की शर्तों के साथ इस अधिकार का इस्तेमाल करते हैं। हमारे कानून लागू करने वाले अधिकारी कानून के अनुसार सख्ती से काम करते हैं और हमारी अदालतें किसी भी शिकायत के समाधान के लिए सभी के लिए उपलब्ध हैं। इसलिए, मानवाधिकारों के लिए उच्चायुक्त कार्यालय की चिंताएं बेबुनियाद हैं और ये भारत के आंतरिक मामलों में अस्वीकार्य दखलंदाजी हैं।
एमईए ने कहा कि हम यह भी देखते हैं कि सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखने के मामले में उच्चायुक्त कार्यालय का रवैया बहुत ही चुनिंदा रहा है। हमारे पड़ोस में विरोध-प्रदर्शनों पर हिंसक प्रतिक्रियाओं पर कोई टिप्पणी नहीं की गई और न ही उनके अपने आस-पास कानून लागू करने वाली एजेंसियों की कार्रवाई पर कुछ कहा गया। ऐसे दोहरे मापदंड केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करते हैं और बहुपक्षवाद में भरोसे को घटाते हैं।
(खबर अपडेट हो रही है)
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एमईए ने कहा कि हम यह भी देखते हैं कि सार्वजनिक तौर पर अपनी बात रखने के मामले में उच्चायुक्त कार्यालय का रवैया बहुत ही चुनिंदा रहा है। हमारे पड़ोस में विरोध-प्रदर्शनों पर हिंसक प्रतिक्रियाओं पर कोई टिप्पणी नहीं की गई और न ही उनके अपने आस-पास कानून लागू करने वाली एजेंसियों की कार्रवाई पर कुछ कहा गया। ऐसे दोहरे मापदंड केवल उनकी विश्वसनीयता को कम करते हैं और बहुपक्षवाद में भरोसे को घटाते हैं।
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