IJR: न्याय दिलाने में दक्षिण भारत के चार राज्य टॉप पांच में; देश की पुलिस में महिला अधिकारी आठ फीसदी से भी कम
रिपोर्ट में दावा है कि 1.4 बिलियन (140 करोड़) लोगों के लिए, भारत में लगभग 20,076 न्यायाधीश हैं। जिनमें लगभग 22 प्रतिशत स्वीकृत पद खाली हैं। जबकि, हाईकोर्ट्स में 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं।
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इंडिया जस्टिस रिपोर्ट 2022 ने अपने ताजे आंकड़े जारी किए हैं। रिपोर्ट में न्याय तक पहुंच प्रदान करने वाले राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की सूची में कर्नाटक पहले नंबर पर है। इसके अलावा दक्षिण भारत के 3 राज्य टॉप पांच में शामिल हैं। मंगलवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि दिल्ली और चंडीगढ़ को छोड़कर, कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश न्यायपालिका पर अपने कुल वार्षिक खर्च का एक प्रतिशत से अधिक खर्च नहीं करते। बता दें, रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उच्च न्यायालयों में 30 प्रतिशत जस्टिस की कमी है।
IJR ने कहा कि दिसंबर 2022 तक, देश में प्रत्येक 10 लाख लोगों के लिए 19 जस्टिस थे और 4.8 करोड़ मामले बैकलॉग थे। 1987 की शुरुआत में विधि आयोग ने सुझाव दिया था कि एक दशक बाद प्रत्येक 10 लाख लोगों के लिए 50 जज होने चाहिए। आईजेआर में न्यायपालिका में रिक्तियों, बजटीय आवंटन, बुनियादी ढांचे, मानव संसाधन, कानूनी सहायता, जेलों की स्थिति, पुलिस और राज्य मानवाधिकार आयोगों के कामकाज जैसे विभिन्न मापदंडों पर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को रैंक किया जाता है।
हाईकोर्ट में 30 प्रतिशत पद रिक्त
18 बड़े और मध्यम आकार के राज्यों में 1 करोड़ से अधिक की आबादी वाले चार्ट में कर्नाटक सबसे ऊपर है। इसके बाद तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात और आंध्र प्रदेश काबिज हैं। एक करोड़ से कम आबादी वाले सात छोटे राज्यों की सूची में सिक्किम अव्वल है। अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा दूसरे और तीसरे पायदान पर हैं। रिपोर्ट में दावा है कि 1.4 बिलियन (140 करोड़) लोगों के लिए, भारत में लगभग 20,076 न्यायाधीश हैं। जिनमें लगभग 22 प्रतिशत स्वीकृत पद खाली हैं। जबकि, हाईकोर्ट्स में 30 प्रतिशत पद रिक्त हैं।
पुलिस में केवल 11 प्रतिशत ही महिलाएं
पुलिस में केवल 11.75 प्रतिशत महिलाएं ही कार्यरत हैं। जबकि पिछले एक दशक में उनकी संख्या दोगुनी हुई है। लगभग 29 प्रतिशत अधिकारी पद खाली हैं। पुलिस का जनसंख्या अनुपात 152.8 प्रति लाख है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानक 222 है। जेलों में 130 प्रतिशत से अधिक कैदी हैं और दो तिहाई से अधिक कैदी (77.1 प्रतिशत) जांच या मुकदमे के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं।
IJR ने कहा कि अधिकांश राज्यों ने केंद्र द्वारा उन्हें दिए गए धन का पूरी तरह से उपयोग नहीं किया है और पुलिस, जेलों और न्यायपालिका पर उनके खर्च में वृद्धि ने राज्य के खर्च में वृद्धि के साथ तालमेल नहीं रखा। सुप्रीम कोर्ट के रिटायर जस्टिस मदन बी लोकुर ने कहा कि तीसरे आईजेआर से पता चलता है कि विविधता, प्रशिक्षण और बुनियादी ढांचे पर नए आयाम जोड़ने के मामले में राज्य पिछले दो की तुलना में काफी सुधार कर रहे हैं।
महिला पुलिस अधिकारियों की कमी
पुलिस में महिला अधिकारियों की कमी है। कानूनी सहायता बेहतर काम कर रही है, लेकिन अभी भी बहुत से लोगों को गुणवत्तापूर्ण मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करने की आवश्यकता है, हमें लोगों में विश्वास बढ़ाने की आवश्यकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कर्नाटक एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसने पुलिस अधिकारियों और कांस्टेबुलरी दोनों के लिए अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग पदों के लिए लगातार अपने कोटे को पूरा किया है। न्यायपालिका में, अधीनस्थ/जिला अदालत स्तर पर, किसी भी राज्य ने तीनों कोटा पूरा नहीं किया। केवल गुजरात और छत्तीसगढ़ ने अपने-अपने एससी कोटे को पूरा किया। अरुणाचल प्रदेश, तेलंगाना और उत्तराखंड ने अपने एसटी कोटे को पूरा किया है। केरल, सिक्किम, आंध्र प्रदेश महाराष्ट्र, तमिलनाडु, छत्तीसगढ़ और तेलंगाना ने ओबीसी कोटा पूरा किया है।
न्याय प्रणाली में प्रमुख पदों पर 10 में से एक महिला है। जबकि पुलिस बल में महिलाओं की कुल हिस्सेदारी लगभग 11.75 प्रतिशत है। अधिकारी रैंक में यह अभी भी 8 प्रतिशत से कम है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों में केवल 13 प्रतिशत और अधीनस्थ न्यायालयों के न्यायाधीशों में 35 प्रतिशत महिलाएं हैं। अधिकांश राज्यों ने महिला पैनल वकीलों की हिस्सेदारी में वृद्धि की है। राष्ट्रीय स्तर पर हिस्सेदारी 18 प्रतिशत से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गई है। रिपोर्ट का दावा है कि चार पुलिस थानों में से एक थाने में एक भी सीसीटीवी नहीं है और 10 में से लगभग तीन पुलिस थानों में महिला हेल्प डेस्क नहीं है।
हाईकोर्ट के हर चार में से एक मामला पांच साल से लंबित
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा और मध्यप्रदेश को छोड़कर, सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की विचाराधीन आबादी 60 प्रतिशत से अधिक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 28 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के उच्च न्यायालयों में हर चार में से एक मामला पांच साल से अधिक समय से लंबित है। 11 राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों की जिला अदालतों में हर चार में से एक मामला पांच साल से अधिक समय से लंबित है।
जेल में 43 रुपए प्रति व्यक्ति खर्च
राष्ट्रीय स्तर पर जेलों में प्रति व्यक्ति खर्च 43 रुपए है। राष्ट्रीय स्तर पर, प्रति कैदी वार्षिक औसत खर्च 43,062 रुपये से घटकर 38,028 रुपये हो गया है। आंध्र प्रदेश में एक कैदी पर सबसे अधिक वार्षिक खर्च 2,11,157 रुपए दर्ज किया गया है। न्यायपालिका प्रति व्यक्ति खर्च 146 रुपए है। पुलिस पर राष्ट्रीय स्तर पर प्रति व्यक्ति खर्च 1151 रुपए है।