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एक्सप्लेनर: ईरान पर भरोसा, इस्राइल को नसीहत और यूएस पर निशाना; क्या दक्षिण की ओर से बढ़ रही भारत की नीति?
Mon, 14 Sep 2026 06:23 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: हिमांशु सिंह चंदेल
Updated Mon, 14 Sep 2026 06:23 AM IST
सार
नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के साझा घोषणापत्र ने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। इसमें अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की निंदा की गई, ईरान के हितों का समर्थन हुआ और इस्राइल को गाजा व लेबनान पर सीधी नसीहत दी गई। क्या भारत अपनी विदेश नीति को पश्चिमी प्रभाव से दूर कर ग्लोबल साउथ के नेतृत्व की ओर मोड़ रहा है? आखिर ब्रिक्स के मंच से अमेरिका और इस्राइल को कैसे घेरे गया? आइए, सबकुछ विस्तार से और आसान भाषा में समझने की कोशिश करते हैं...
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क्या ग्लोबल साउथ की ओर बढ़ रहा भारत?
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विस्तार
देश की राजधानी में आयोजित 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के ऐतिहासिक मंच से अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक नया आयाम देखने को मिला। भारत की मेजबानी में जारी हुए नई दिल्ली घोषणापत्र में ईरान के प्रति गहरा विश्वास झलका। पश्चिमी एशिया के घटनाक्रमों पर इस्राइल को खुलकर नसीहत दी गई। अमेरिका का सीधा नाम लिए बिना उसकी एकतरफा पाबंदियों और आर्थिक नीतियों पर तीखा निशाना साधा गया है। यह साझा घोषणापत्र सामने आते ही भारत के बढ़ते दबदबे का दुनिया को एहसास हो गया। क्यों कि इससे ये बात साफ हो गई कि भारत अब पश्चिमी देशों के प्रभाव से निकलकर पूरी मजबूती के साथ ग्लोबल साउथ यानी वैश्विक दक्षिण की अगुवाई करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है।
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भारत की विदेश नीति में बड़े बदलाव का संकेत क्या?
ब्रिक्स के नई दिल्ली घोषणापत्र में अपनाई गई भाषा बेहद नपी-तुली और कूटनीतिक संतुलन से भरी हुई रही। इस दस्तावेज को तैयार करना भारत के लिए सबसे बड़ी परीक्षा थी, क्योंकि इसमें शामिल ग्यारह देशों के अपने-अपने अलग हित और तनाव थे। भारत ने इस साझा बयान में उन सभी मुद्दों को जगह दी है जो विकासशील देशों और ग्लोबल साउथ के भविष्य से जुड़े हैं। हालांकि इस घोषणापत्र के कुछ कड़े शब्दों को देखकर यह सवाल जरूर उठ रहा है कि क्या भारत का झुकाव अब पश्चिम से हट रहा, लेकिन हकीकत यह है कि भारत ने किसी एक गुट का पिछलग्गू बनने के बजाय अपनी स्वतंत्र और बहुपक्षीय नीति को ही सर्वोपरि रखा।
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ईरान के साथ रिश्तों में भरोसे की नई तस्वीर कैसे बनी?
- ईरान हमेशा से भारत को अपना एक अत्यंत महत्वपूर्ण, भरोसेमंद और ऐतिहासिक साझेदार मानता रहा है। राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के भारत आगमन से पहले ईरानी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बघाई ने साफ कहा था कि दोनों देशों के बीच रिश्ते सदियों पुराने और सभ्यतागत हैं। ईरान भारत के साथ अपने संबंधों को बहुत ऊंचा दर्जा देता है। व्यापार, आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय कनेक्टिविटी और चाबहार बंदरगाह को लेकर ईरान का सकारात्मक रुख इसी गहरे भरोसे का परिणाम है। नई दिल्ली में भी दोनों देशों के इस विश्वास की मजबूत झलक देखने को मिली।
- ब्रिक्स बिजनेस फोरम के दौरान भारत मंडपम से एक बेहद ताकतवर और चर्चित तस्वीर सामने आई। इस तस्वीर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान का हाथ थामकर आयोजन स्थल की ओर ले जाते हुए दिखाई दिए। उनके साथ रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी चल रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी और पेजेशकियान के चेहरों पर सहजता और गर्मजोशी साफ देखी जा सकती थी। यह केवल दो नेताओं के साथ टहलने की सामान्य तस्वीर नहीं थी, बल्कि इसने पूरी दुनिया को यह स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिया कि पश्चिम एशिया के भारी तनाव के बावजूद भारत और ईरान के रिश्ते बेहद आत्मीय और मजबूत हैं।
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भारत ने ईरान को कैसे अलग-थलग होने से बचाया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ द्विपक्षीय बातचीत में स्पष्ट कर दिया कि भारत-ईरान दोस्ती दीर्घकालिक है और इसे दोनों देशों के साझा लाभ की रणनीति के साथ आगे बढ़ाया जाएगा। पश्चिम एशिया में चल रहे भीषण युद्ध और प्रतिबंधों के दौर में भी भारत ने ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद को टूटने नहीं दिया। भारत ने निरंतर यह बात दोहराई कि क्षेत्र में स्थायी शांति केवल बातचीत और कूटनीति के रास्ते से ही संभव है। इससे यह साफ हो गया कि भारत ईरान को अलग-थलग करने के किसी भी अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे झुकने वाला नहीं है, बल्कि उसके साथ निरंतर संपर्क और साझेदारी कायम रखेगा।
ब्रिक्स के घोषणापत्र में इस्राइल को लेकर क्या कहा गया?
संयुक्त घोषणापत्र में इस्राइल का कई जगह नाम आया। गाजा में जारी हिंसा को लेकर चिंता जताई गई और फलस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया गया। घोषणापत्र में 1967 की सीमाओं के आधार पर एक संप्रभु फलस्तीनी राष्ट्र के गठन का समर्थन किया गया, जिसकी राजधानी पूर्वी यरूशलम हो। गाजा में मानवीय सहायता पहुंचाने को लेकर इस्राइल की कानूनी जिम्मेदारी का भी उल्लेख किया गया। यानी ब्रिक्स के दस्तावेज में इस्राइल के संबंध में भाषा सीधे और स्पष्ट रूप से सामने आई।लेबनान को लेकर इस्राइल से क्या कहा गया?
ब्रिक्स घोषणापत्र में लेबनान को लेकर भी इस्राइल का सीधे नाम लिया गया। दस्तावेज में लेबनान में युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से उसकी शर्तों का पालन करने को कहा गया। साथ ही इस्राइल से लेबनानी सरकार के साथ हुए समझौते का सम्मान करने और लेबनान के उन सभी क्षेत्रों से अपनी सेना हटाने का आह्वान किया गया, जहां वह मौजूद है। इस तरह ब्रिक्स के घोषणापत्र में इस्राइल को लेकर केवल सामान्य अपील नहीं की गई, बल्कि कुछ मुद्दों पर सीधे मांग भी रखी गई।
बिना नाम लिए अमेरिका पर कैसे साधा निशाना?
ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया, लेकिन एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों की कड़ी आलोचना की गई। घोषणापत्र में कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ लगाए गए एकतरफा दबाव वाले कदमों और आर्थिक प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक प्रभाव होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे प्रतिबंधों का सबसे ज्यादा असर गरीबों पर पड़ता है। अमेरिका का नाम नहीं होने के बावजूद इस भाषा का संदर्भ महत्वपूर्ण है, क्योंकि रूस और ईरान दोनों लंबे समय से अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। इसलिए घोषणापत्र की भाषा अमेरिका की नीतियों पर परोक्ष निशाने के तौर पर देखी जा सकती है।क्या अमेरिकी शुल्क नीति की भी आलोचना हुई?
ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन के नियमों के अनुरूप नहीं होने वाले एकतरफा शुल्क और गैर-शुल्क उपायों पर भी गंभीर चिंता जताई। घोषणापत्र में किसी देश का नाम नहीं लिया गया, लेकिन ऐसी भाषा को अमेरिका की शुल्क नीति के संदर्भ में देखा जा सकता है। ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद ब्रिक्स देशों पर अमेरिकी शुल्क और आर्थिक दबाव का मुद्दा भी चर्चा में रहा है। भारत ने भी अमेरिका की ओर से रूसी तेल की खरीद को लेकर लगाए गए अतिरिक्त शुल्क को अनुचित, अन्यायपूर्ण और अनुचित बताया था तथा अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाने की बात कही थी।
ब्रिक्स फोरम से अमेरिका पर क्या कुछ कहा गया?
पहले जानते हैं पुतिन ने क्या कहा?- जी-7 पर कसा तंज... ब्रिक्स मंच से बोलते हुए पुतिन ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में दुनिया की जीडीरी का 40 प्रतिशत से ज्यादा हिस्से में ब्रिक्स देशों का योगदान है। जबकि, इसमें तथाकथित जी-7 का योगदान केवल 29 प्रतिशत है। मुझे नहीं पता इन्हें ग्रुप ऑफ सेवन क्यों कहते हैं।
- ट्रंप को बताया पुराना नेता... पुतिन ने आगे कहा कि दुनिया हमेशा बदली रही है और पिछले पांच वर्षों के ठोस सबूत इसकी पुष्टि भी करते हैं। उन्होंने आगे कहा अभी दुनिया स्ट्रक्चरल और गहरे बदलाव से गुजर रहा है। कहे जाने वाले पुराने नेता जो कभी आर्थिक विकास में सबसे आगे हुआ करते थे, उनकी जगह अब विकास के नए इंजन ले रहे हैं।
- रूस पर 30 हजार से ज्यादा प्रतिबंध... रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने कहा कि रूस पर 30000 से ज्यादा प्रतिबंध लगाए गए हैं। उनके मुताबिक यह संख्या दुनिया के बाकी सभी देशों पर लगाए गए कुल प्रतिबंधों से दोगुने से भी ज्यादा है। हमारे पश्चिमी कॉम्पटीटर अपनी पुरानी बढ़त को वापस पाने की हर मुमकिन कोशिश कर रहे हैं।
- प्रतिबंधों के बावजूद रूस की अर्थव्यवस्था का दावा... पुतिन ने कहा कि मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद रूस ने अपनी राष्ट्रीय संप्रभुता मजबूत की है और भरोसेमंद तथा स्थिर साझेदारों के साथ संबंध बढ़ाए हैं। उन्होंने दावा किया कि पिछले तीन वर्षों में रूस की आर्थिक वृद्धि दुनिया की औसत वृद्धि से ज्यादा रही है।
- अमेरिका पर परोक्ष निशाना... पुतिन ने परिवहन गलियारों को रोकने, पाइपलाइन नष्ट करने, समुद्री जहाजों को जब्त करने और अवैध प्रतिबंध लगाने का जिक्र किया। उन्होंने उन देशों के खिलाफ सेकेंडरी सैंक्शन की धमकी पर भी सवाल उठाया, जो किसी दूसरे देश के हित के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं।
- एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना... पेजेश्कियान ने पश्चिमी देशों की ओर से लगाए जा रहे एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की। यह बात अमेरिका पर सीधे तौर पर लागू होती है, क्योंकि अमेरिका ने ईरान पर नए आर्थिक प्रतिबंध लगाए हैं। इनका वैश्विक खाद्य सुरक्षा और लोगों के कल्याण पर सीधा असर पड़ रहा है।
- मौजूदा वित्तीय व्यवस्था पर निर्भरता की आलोचना... पेजेश्कियान ने कहा कि मौजूदा वित्तीय और व्यापारिक व्यवस्थाओं पर अत्यधिक निर्भरता ने उभरती अर्थव्यवस्थाओं को राजनीतिक झटकों के प्रति कमजोर बना दिया है। यह अमेरिकी नेतृत्व वाली मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था पर परोक्ष सवाल के तौर पर सामने आता है।
- राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार की वकालत... उन्होंने ब्रिक्स देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की वकालत की। इसका उद्देश्य सीमित वैश्विक वित्तीय व्यवस्थाओं पर निर्भरता कम करना है। उन्होंने नए विकास बैंक को मजबूत करने की बात कही, ताकि ब्रिक्स देशों की आर्थिक मजबूती बढ़े और वे मौजूदा वित्तीय व्यवस्थाओं पर कम निर्भर रहें।
- ईरान के खिलाफ अमेरिकी सैन्य कार्रवाई का उल्लेख... पेजेश्कियान ने अमेरिका और इस्राइल की ओर से ईरान के खिलाफ की गई सैन्य कार्रवाई का उल्लेख किया और इसके प्रभावों को सामने रखा। उन्होंने कहा कि ईरान के आर्थिक, ऊर्जा और विकास से जुड़े बुनियादी ढांचे पर हमलों के राष्ट्रीय सीमाओं से बाहर भी गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
- नागरिकों की मौत और बुनियादी ढांचे के नुकसान का मुद्दा... पेजेश्कियान ने कहा कि ईरान के लोगों ने इन कार्रवाइयों की भारी कीमत चुकाई, बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए और दशकों में तैयार किया गया बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हुआ।
भारत ने ईरान और यूएई के बीच क्या भूमिका निभाई?
दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियान और यूएई के क्राउन प्रिंस खालिद बिन मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान के बीच भी मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच पश्चिम एशिया के संघर्ष को लेकर मतभेद रहे हैं। ऐसे में एक ही मंच पर दोनों नेताओं की मुलाकात का होना महत्वपूर्ण था। भारत के लिए यह इसलिए भी अहम है क्योंकि उसने ब्रिक्स को ऐसा मंच बनाए रखने की कोशिश की, जहां अलग-अलग पक्ष अपने मतभेदों के बावजूद एक साथ बातचीत कर सकें। यह भारत की उस कूटनीति से मेल खाता है जिसमें बातचीत के रास्ते खुले रखने पर जोर दिया जाता है।क्या भारत का रुख सिर्फ ईरान के पक्ष में है?
ऐसा कहना सही नहीं होगा कि भारत ने केवल ईरान का पक्ष चुना है। भारत ने एक तरफ ईरान के साथ अपने रिश्तों को मजबूत करने के संकेत दिए हैं, वहीं दूसरी तरफ इस्राइल के साथ भी उसके रणनीतिक संबंध बने हुए हैं। भारत लगातार पश्चिम एशिया के विवादों को बातचीत और कूटनीति के जरिए सुलझाने की बात करता रहा है। फलस्तीन के लिए दो-राष्ट्र समाधान का समर्थन करने के साथ भारत इस्राइल के साथ भी अपने संबंध बनाए हुए है। यानी भारत किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े होने के बजाय अलग-अलग पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
यूक्रेन और रूस के मामले में भी यही नीति दिखती है?
- भारत का यही रुख रूस-यूक्रेन संघर्ष में भी दिखाई देता है। भारत रूस के साथ अपने पुराने संबंधों को बनाए हुए है और रूस के साथ व्यापार तथा संवाद जारी रखता है। दूसरी तरफ, भारत यूक्रेन के साथ भी संपर्क बनाए हुए है।
- प्रधानमंत्री मोदी की सरकार ने रूस और यूक्रेन के बीच संघर्ष का समाधान बातचीत और कूटनीति से निकालने की बात कही है। यही नीति पश्चिम एशिया के मामले में भी दिखाई देती है। भारत संघर्ष में किसी एक पक्ष का हिस्सा बनने के बजाय सभी संबंधित पक्षों से बातचीत का रास्ता खुला रखना चाहता है।
फिर क्या भारत अमेरिका से दूर हो रहा है?
ब्रिक्स घोषणापत्र में अमेरिकी नीतियों की परोक्ष आलोचना और ईरान के प्रति गर्मजोशी को देखकर ऐसा सवाल उठना स्वाभाविक है। लेकिन इसे भारत के अमेरिका से पूरी तरह दूर होने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी। भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक साझेदारी है और भारत पश्चिमी देशों के साथ भी अपने संबंध बनाए हुए है। मौजूदा हालात में भारत की नीति को किसी एक खेमे में जाने के बजाय अपने हितों के अनुसार अलग-अलग देशों के साथ संबंध रखने की नीति के रूप में देखा जा सकता है।ट्रंप के दौर में भारत की कूटनीति पर क्या असर पड़ा?
ट्रंप के दोबारा अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद भारत-अमेरिका संबंधों के सामने कुछ नए सवाल भी आए हैं। अमेरिकी शुल्क, भारत की रूसी तेल खरीद को लेकर उठाए गए मुद्दे और दूसरे मतभेदों ने दोनों देशों के संबंधों को प्रभावित किया है। इसके बावजूद भारत ने अमेरिका से संवाद बनाए रखा है। दूसरी तरफ रूस, ईरान और दूसरे देशों के साथ भी संपर्क जारी है। इससे यह संकेत मिलता है कि भारत किसी एक शक्ति के दबाव में अपनी पूरी विदेश नीति बदलने के बजाय अलग-अलग साझेदारियों को अपने हित के अनुसार संभालने की कोशिश कर रहा है।
ग्लोबल साउथ पर मोदी का जोर क्यों महत्वपूर्ण है?
- ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ को लेकर बहुत स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने कहा कि ग्लोबल साउथ को केवल दुनिया के बनाए नियमों का पालन करने वाला समूह नहीं रहना चाहिए, बल्कि उसे नियम बनाने में भी भूमिका निभानी चाहिए।
- प्रधानमंत्री ने कहा कि आज ग्लोबल साउथ वैश्विक संकटों के केंद्र में है, लेकिन निर्णय लेने की प्रक्रिया में पीछे है। उन्होंने ऐसी व्यवस्था की जरूरत बताई जिसमें हर देश की आवाज हो और हर सदस्य की हिस्सेदारी हो।
क्या भारत ग्लोबल साउथ की अगुवाई करना चाहता है?
प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत ग्लोबल साउथ के देशों के युवा राजनयिकों और नीति निर्माताओं को बातचीत की क्षमता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और कानूनी जानकारी देने के लिए नेतृत्व करने को तैयार है। यह सिर्फ ब्रिक्स की बैठक तक सीमित संदेश नहीं था। भारत खुद को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज के रूप में सामने रखने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स जैसे मंच के जरिए भारत चाहता है कि इन देशों की भूमिका वैश्विक फैसलों में बढ़े और उनकी बात को अधिक महत्व मिले।संयुक्त राष्ट्र सुधार को लेकर भारत ने क्या कहा?
प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक शासन व्यवस्था में सुधार के लिए अगले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन तक एक सुधार रोडमैप तैयार करने का प्रस्ताव रखा। इसमें प्रतिनिधित्व, जवाबदेही और नियम बनाने को तीन प्रमुख आधार बनाने की बात कही गई। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार को अब और टालने के खिलाफ बात रखी। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में मतदान के अधिकार, नेतृत्व के पद और नीतिगत प्राथमिकताओं को मौजूदा आर्थिक वास्तविकताओं के अनुरूप बनाने की भी बात कही। यह भारत के उस लंबे रुख से जुड़ा है जिसमें वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की अधिक भागीदारी की मांग की जाती रही है।
घोषणापत्र तैयार करना भारत के लिए क्यों बड़ी चुनौती था?
ब्रिक्स में अब अलग-अलग हित रखने वाले 11 सदस्य हैं। पश्चिम एशिया के युद्ध को लेकर ईरान और यूएई के रुख में भी अंतर रहा है। ऐसे में सभी देशों को स्वीकार्य भाषा वाला संयुक्त घोषणापत्र तैयार करना आसान नहीं था। भारत के लिए चुनौती यह थी कि रूस और ईरान जैसी ताकतें अमेरिका की नीतियों पर ज्यादा कड़े शब्द चाह सकती थीं, जबकि भारत और दूसरे सदस्य पश्चिमी देशों के साथ अपने संबंधों को भी बनाए रखना चाहते हैं। इसके बावजूद संयुक्त घोषणापत्र पर सहमति बनी। यही भारत की अध्यक्षता की एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में सामने आई।क्या भारत की विदेश नीति सच में दक्षिण की ओर बढ़ रही है?
इन घटनाओं से यह जरूर दिखता है कि भारत ग्लोबल साउथ को लेकर अपनी भूमिका को ज्यादा मजबूती से सामने रख रहा है। ईरान के साथ गर्मजोशी, रूस के साथ लगातार संवाद, ब्रिक्स में अमेरिकी नीतियों की परोक्ष आलोचना और ग्लोबल साउथ को नियम बनाने की भूमिका देने की बात इसी दिशा की ओर संकेत करती है। लेकिन इसे पश्चिम से पूरी तरह दूरी बनाने की नीति कहना सही नहीं होगा। भारत अभी भी अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रणनीतिक संबंध बनाए हुए है। इसलिए ज्यादा सही तस्वीर यह है कि भारत दक्षिण की ओर अपनी कूटनीतिक सक्रियता बढ़ाते हुए पश्चिम के साथ भी अपने रिश्ते बचाए रखना चाहता है।
ग्लोबल साउथ की अगुवाई के लिए भारत कितना तैयार?
- 'रूल-टेकर' से 'रूल-शेपर' का नया विजन... भारत ने विकासशील देशों को केवल अंतरराष्ट्रीय नियम स्वीकार करने के बजाय नियम तय करने वाली भूमिका में लाने का रोडमैप रखा है। इसके तहत विकासशील देशों के नीति-निर्माताओं और राजनयिकों को बातचीत, कानूनी विशेषज्ञता और व्यावहारिक प्रशिक्षण देने की पहल की गई है।
- विस्तारित ब्रिक्स में कूटनीतिक संतुलन... ब्रिक्स समूह के 11 पूर्ण सदस्य देशों (जो वैश्विक आबादी का 49.5%, वैश्विक जीडीपी का 40% और वैश्विक व्यापार का 26% प्रतिनिधित्व करते हैं) के बीच परस्पर विरोधी रुख के बावजूद भारत ने सर्वसम्मत साझा घोषणापत्र तैयार करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है।
- पश्चिम एशिया के धुर विरोधियों को एक मंच पर लाना... पश्चिम एशिया के भारी तनाव और संघर्षों के बीच भारत ने ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के हितों में संतुलन साधते हुए नई दिल्ली के मंच पर संवाद को संभव बनाया।
- स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा... डॉलर और सीमित विदेशी मुद्राओं पर निर्भरता घटाने के लिए ब्रिक्स व ग्लोबल साउथ के देशों के बीच राष्ट्रीय मुद्राओं में व्यापार, करेंसी रिस्क मैनेजमेंट और न्यू डेवलपमेंट बैंक के जरिए स्थानीय मुद्रा फंडिंग का समर्थन किया है।
- जिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक लीडरशिप... भारत ने डिजिटल भुगतान, ओपन डिजिटल नेटवर्क, एआई और उपग्रह तकनीक को ग्लोबल साउथ के देशों में लागू करने के लिए तकनीकी सहयोग का मॉडल पेश किया है।
- गुटनिरपेक्षता से बहु-संरेखण... भारत ने पश्चिमी देशों के साथ रणनीतिक साझेदारी बनाए रखते हुए भी गैर-पश्चिमी मंचों पर विकासशील देशों के संप्रभु अधिकारों, एकतरफा प्रतिबंधों के विरोध और फलस्तीन-लेबनान जैसे संवेदनशील मुद्दों पर स्पष्ट रुख अपनाया है।