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अक्टूबर में प्रधानमंत्री मोदी के रूस दौरे के दौरान ही भारत-चीन में सहमति बनने की उम्मीद

Wed, 09 Sep 2020 04:18 PM IST
Harendra Chaudhary शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Wed, 09 Sep 2020 04:18 PM IST
सार

  • रक्षा मंत्री के बाद विदेश सचिव जयशंकर की बैठक के बाद साफ होगी तस्वीर
  • चीन चाहता है जितना उसकी सेना पीछे हटेगी, उतना ही भारत की सेना भी पीछे हटे
  • दोनों देशों की सेना है आमने-सामने, भारत पर युद्ध भड़काने का आरोप

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India-China hope to reach agreement only during Prime Minister Modi visit to Russia in October
चीनी विदेश मंत्री के साथ भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर - फोटो : File Photo

विस्तार

विदेश मंत्री एस जयशंकर मास्को में हैं। उनकी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से इतर चीन के विदेश मंत्री वांग यी से द्विपक्षीय वार्ता प्रस्तावित है, लेकिन कूटनीतिक गलियारे के सूत्रों को लग रहा है कि बिना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति शी जिनपिंग के वार्ता की मेज पर आए लद्दाख का मामला सुलझने की संभावना कम है। प्रधानमंत्री का अक्टूबर के महीने में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के शिखर नेताओं की बैठक में जाने का कार्यक्रम प्रस्तावित है।

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उम्मीद है कि प्रधानमंत्री की रूस यात्रा के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग से चर्चा होगी, मसले का कोई सकारात्मक समाधान निकलेगा। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी लद्दाख में चीन की घुसपैठ के बाद बढ़ी पेचीदगियों को लेकर राजनीतिक नेतृत्व के हस्तक्षेप पर जोर दिया है। विदेश मंत्री ने भी माना कि स्थितियां बहुत पेचीदा हो चली हैं। समझा जा रहा है कि भारत और चीन के शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व ने इसके समाधान के लिए प्रयास करना आरंभ कर दिया है।
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प्रधानमंत्री कार्यालय प्रतिदिन चीन के मुद्दे पर बने स्टडी ग्रुप की हर बैठक का अपडेट ले रहा है। बताते चलें कि 2017 में डोकलाम का विवाद भी दोनों शिखर नेताओं के बीच चर्चा के बाद ही सुलझ सका था। 2017 में भारत ने चीन से सीमा विवाद के अलावा दोनों देशों अन्य हितों की समग्रता का हवाला देकर आपसी शांति, सौहार्द, सहयोग तथा सामान्य से रिश्ते को विशेष दिशा में ले जाने का प्रयास किया था। विदेश मंत्री एस जयशंकर, विदेश सचिव हर्षवर्धन श्रृंगला, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव लगातार चीन को यही संदेश दे रहे हैं।

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विदेश मंत्री की बैठक के बाद साफ होगी तस्वीर

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बाद विदेश मंत्री एस जयशंकर मास्को में हैं। मास्को में चीन के विदेश मंत्री वांग यी से चर्चा प्रस्तावित है और इसमें पूर्वी लद्दाख में चीन की घुसपैठ का मुद्दा तय है। सूत्र बताते हैं कि विदेश मंत्री की बैठक के नतीजे के बाद ही कोई तस्वीर साफ होगी। फिलहाल विदेश मंत्री पूरे एजेंडे के साथ मास्को गए हैं। उनकी 10 सितंबर को वांग यी से होने वाली मुलाकात पर दुनिया के देशों की नजर है।

चीन को भारत दे रहा है साफ संदेश

भारतीय कूटनीति के रणनीतिकारों ने कुछ कदम उठाकर चीन को साफ संदेश देना शुरू कर दिया है। लद्दाख में घुसपैठ को लेकर दो चीजें बिल्कुल साफ कर दी हैं। पहली तो यह कि भारत और चीन के बीच लद्दाख में तनाव का दोनों देशों के द्विपक्षीय, आर्थिक, व्यापारिक समेत हर रिश्ते पर असर पड़ना तय है। इसका असर चीन तथा उसकी कंपनियों के सहयोग से भारत में चल रही बड़ी-बड़ी परियोजनाओं पर भी पड़ना तय है। दूसरा, सीमा पर शांति, सौहार्द की स्थापना के लिए चीन की फौज को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जाना होगा।

चीन को व्यापारिक, कारोबारी और आर्थिक क्षेत्र में संदेश देने के लिए ही भारत ने सबसे पहले चीन की कंपनियों के मोबाइल एप आदि पर प्रतिबंध लगाया है। आयात-निर्यात की भी तेजी से समीक्षा कर रहा है। कई राज्यों में चल रही परियोजनाओं को लेकर भी एक आकलन किया जा रहा है। एक राजनयिक का कहना है कि चीन अभी भी मुगालते में है। उसे लग रहा है कि भारत की उस पर निर्भरता बहुत अधिक बढ़ गई है। सूत्र का कहना है कि यह चीन का बड़ा भ्रम है।

चीन चाहता है भारत मान ले ये शर्त

पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि चीन की विस्तारवादी रणनीति बहुत विचित्र है। वह पहले पड़ोसी देश की सीमा में घुस जाते हैं, इसके बाद तरह-तरह के दबाव बनाने के तरीके अपनाते हैं। इसके बाद थोड़ा सा पीछे हट जाते हैं। यही प्रयोग वह भारत के साथ दोहरा रहे हैं। विदेश मामलों के एक अन्य जानकार कहना है कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है।

वह चाहता है कि जिस स्थान को वह एलएसी के रूप में चिन्हित करे, भारत उसकी वह शर्त मान ले। सैन्य कमांडरों से चर्चा के दौरान चीन ने प्रस्ताव दिया था कि जितना उसकी सेना पीछे हटेगी, उतना ही भारत की सेना भी पीछे हटे और इस पूरे क्षेत्र को बफर जोन में बदल दिया जाए। भारत ने चीन के इस प्रस्ताव को नामंजूर कर दिया था। जून, 2020 में चीन के दिल्ली में राजदूत सून वेडॉन्ग ने भी घुसपैठ के बाद समाधान के लिए बीच के रास्ते को चुनने का सुझाव दिया था। इसका अर्थ है कि भारत अपना आधा दावा छोड़ दे और आधे पर समझौते के लिए तैयार हो जाए।

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