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India-China Clash: चीन को अरुणाचल प्रदेश का तवांग चाहिए या इरादे कुछ और हैं?

Thu, 15 Dec 2022 02:27 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Thu, 15 Dec 2022 02:27 PM IST
सार

India-China Clash: रक्षा और विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार के मुताबिक कोरोना काल, यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाई और अमेरिका में जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक चुनौतियां काफी बढ़ी हैं। इसने चीन को काफी आशंकित किया है...

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India-China Clash: Does China want Tawang in Arunachal Pradesh or have other intentions?
India-China Clash - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

अरुणाचल प्रदेश के तवांग के बगैर चीन का तिब्बत को लेकर ख्वाब अधूरा है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह तवांग को लेकर चीन की महात्वाकांक्षा को कुछ इसी तरह जोड़ते हैं। विदेश और रक्षा मंत्रालय के अधिकारियों का भी मानना है कि तवांग को लेकर चीन की नापाक नजरों से वह कुछ दशक से सतर्कता बरत कर चल रहे हैं। हालांकि डोकलाम, उत्तराखंड के बाराहोती, लद्दाख के बाद तवांग में चीन की हरकत इसके साथ कुछ और भी कहानी कह रही है। इसमें न केवल चीन की मंशा छिपी है, बल्कि भारत के साथ उसे (बीजिंग) खतरा भी साफ दिखाई दे रहा है। कुछ भारतीय सामरिक विशेषज्ञों और रणनीतिकारों का मानना है कि 2023 में चीन से आने वाले किसी और खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता।

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रक्षा और विदेश मामलों के जानकार वरिष्ठ पत्रकार रंजीत कुमार के मुताबिक कोरोना काल, यूक्रेन में रूस की सैन्य कार्रवाई और अमेरिका में जो बाइडन के राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक चुनौतियां काफी बढ़ी हैं। इसने चीन को काफी आशंकित किया है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी कहना है कि एशिया में चीन के बाद भारत सबसे प्रभावशाली देश है। चीन कभी नहीं चाहेगा कि भारत समेत अन्य एशियाई देश अमेरिका के करीब जाएं। चीन की सीमा के पास अमेरिकी सैनिक युद्धाभ्यास या किसी और बहाने से आएं। चीन अमेरिकी एजेंसी सीआईए से घबराता है और अमेरिका की प्लानिंग ने रूस की सैन्य ताकत को काफी कमजोर कर दिया है। अमेरिकी रणनीतिकारों ने चीन को काबू में करने से पहले उसे सैन्य सहायता देने में सक्षम रूस को कमजोर कर दिया है। इसलिए चीन की मंशा और प्रयास दोनों नापाक ही नजर आते हैं।  

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जी-20 की बैठक अरुणाचल में होने की घोषणा से चीन परेशान

इस साल जी-20 के आयोजन की जिम्मेदारी भारत के पास आई है। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं भारत ने जी-20 की बैठक अरुणाचल में करने की योजना बनाई है। चीन इससे खासा परेशान है। पूर्व एयर वाइस मार्शल एनबी सिंह कहते हैं कि तवांग शुरू से ही चीन के लिए महत्वपूर्ण रहा है। दलाई लामा भी इसी रास्ते से भारत आए थे। तवांग से तिब्बत कनेक्ट होता है। दलाई लामा के उत्तराधिकारी के लिहाज से भी तवांग महत्वपूर्ण है। दूसरे 2023 में जी-20 की बैठक भी होगी। एनबी सिंह कहते हैं कि मौजूदा समय में रूस के यूक्रेन में उलझने के बाद भारत के पास अमेरिका और रूस से संतुलन बनाने की मजबूरी है। लेकिन चीन के रणनीतिकार एशिया में भारत के उभार को अपने हित में नहीं मान सकते। यही वजह है कि इस समय चीन और पाकिस्तान दोनों मोर्चों पर भारत की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं। रंजीत कुमार भी कहते हैं कि बाराहोती से लेकर लद्दाख, डोकलाम, तवांग तक चीन की मंशा पूरी वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत की सुरक्षा चुनौती और खर्च बढ़ाने की है। ताकि भारत अपनी परेशानियों में उलझा रहे।

चीन की इस हरकत का आखिर किस तरह जवाब दे भारत?

यह सवाल बहुत पेचीदा है। पूर्व लेफ्टिेनेंट जनरल बलवीर सिंह संधू, पूर्व विदेश सेवा के अधिकारी एसके शर्मा समेत कई वर्तमान रणनीतिकारों और सामरिक विशेषज्ञों का कहना है कि चीन के मामले में भारत की नीति को खराब नहीं कहा जा सकता। पूर्व विदेश सचिव शशांक कहते हैं कि हमें इस मामले में धीरे-धीरे ही चलना चाहिए। वैसे भी तवांग के मामले में चीन इस हिस्से को सीमा विवाद से अलग रखकर और अपना मानकर व्यवहार करता आया है। चीन के राजनयिक हमेशा कहते हैं कि अभी तवांग को छोड़कर अन्य पर बात की जाए। वैसे भी विदेश मंत्री एस जयशंकर और उनके राजनयिक साथी, पूर्व विदेश सचिव विजय गोखले, हर्ष वर्धन श्रृंगला समेत सभी चीन के साथ मुद्दों को लेकर लगातार संवेदनशील रहे हैं। ऐसे में समझा जा रहा है कि भारत की नीति चीन के रक्षात्मक तरीके से आक्रामक बने रहने, सैन्य तैयारियों पर जोर देते रहने और न उलझने की ही रहेगी।

2023-24 में कुछ बड़ा होने का अंदेशा है

सामरिक मामले के एक विशेषज्ञ का कहना है कि काल्पनिक सवाल पर वह ऑफ द रिकार्ड बोलना चाहेंगे। वह कहते हैं कि 2023-24 में जिस तरह चीन अंदरूनी और बाह्य मामलों में चुनौतियों का सामना कर रहा है, उसे देखते हुए 2023-24 में वह भारत के सामने सीमा क्षेत्र में बड़ी चुनौती खड़ी कर सकता है। इसका एकमात्र कारण अमेरिका का बढ़ रहा एशिया प्रेम हो सकता है। रंजीत कुमार को भी इसकी आशंका सता रही है। पूर्व विदेश सचिव शशांक का कहना है कि भारत को सतर्क, सावधान और किसी भी स्थिति से निपटने के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए।

गलवां की हिंसक झड़प ने खोले सैनिकों के हाथ

साउथ ब्लाक और सेना मुख्यालय के सूत्र एक दिलचस्प वाकया बता रहे हैं। उनका कहना है कि गलवां घाटी में 30 महीने पहले हुई हिंसक झड़प ने भारतीय सैनिकों की तैयारी और मनोबल दोनों को काफी बढ़ा दिया है। लद्दाख में तैनाती से लौटे सूत्र के मुताबिक उच्च स्तर से भी संभलकर आगे बढऩे के निर्देश आते थे। लेकिन गलवां घाटी में स्थिति अचानक हिंसक झड़प की आ गई थी। सूत्र का कहना है कि साथियों को बचाने में भारतीय सैनिकों ने जौहर दिखा दिया था। इस घटना के बाद सैनिकों का मनोबल काफी बढ़ गया है। वह इसके लिए डोकलाम का उदाहरण देते हैं। कहते हैं 70 दिनों के डोकलाम के तनाव में भारतीय सैनिक पूरी तरह से रक्षात्मक प्रतिरोध करते रहे। लेकिन तवांग में उन्होंने चीनी घुसपैठ का उसी भाषा में जवाब दे दिया।

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