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लद्दाख में जानवरों पर मेहरबानी करना है गुनाह, आखिर ऐसा क्यों?
जितेंद्र भारद्वाज, डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला
Updated Mon, 08 Oct 2018 09:35 PM IST
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आप अपने शहर या गांव में आवारा पशुओं को कोई भी खाद्य पदार्थ देकर दयाभाव दिखा सकते हैं, लेकिन अगर आप लद्दाख में हैं तो यह सब नहीं चलेगा। वहां पर्यटकों का यह दयाभाव जानवरों को मौत के मुंह में ले जा रहा है। इसी के चलते लद्दाख में जानवरों पर मेहरबानी करना एक गुनाह हो गया है।
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दरअसल बात यह है कि लद्दाख में जिस तेजी से पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से वहां जानवरों की कई दुर्लभ प्रजातियां भी खत्म होने लगी हैं। दूसरी ओर, पूरे लद्दाख क्षेत्र में किसी भी आर्मी या अर्धसैनिक बल के कैंप के बाहर स्थानीय कुत्तों की कतार देखी जा सकती है। इन कैंपों तक पहुंचने के लिए कुत्तों को कई किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है, केवल खाने के लिए।
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बता दें कि लदाख क्षेत्र, खासतौर पर लेह से वाया खार्दूंगला होते हुए पर्यटक जब नुबरा घाटी में पहुंचते हैं तो उन्हें बीच में पश्मीना भेड़, बकरी, गाय और मरमोट आदि मिल जाते हैं। इनमें मरमोट तो लुप्तप्राय: जीवों की श्रेणी में जा पहुंचा है।
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रास्ते में हिमालयन गधा व घोड़ा भी देखने को मिलता है। नुबरा घाटी से जब पेंगोंग लेक की ओर जाते हैं तो बीच में चांगथंग इलाका पड़ता है। यहां पर पहले बड़ी संख्या में मरमोट होते थे, लेकिन अब इनकी संख्या सिमट गई है।
लद्दाख में कार्यरत मुख्य पशु पालन अधिकारी डॉ. मोहम्मद इकबाल का कहना है कि यहां के जानवरों का पेट भरने के लिए प्रकृति ने इन्हें केवल जंगली घास दी है। इसी घास के सहारे मरमोट, गधा, घोड़ा, भेड़-बकरी, गाय और दूसरे कई पशु जीवित रहते हैं।
घास में प्राकृतिक तौर पर सभी तरह के जरूरी पौष्टिक तत्व होते हैं। पिछले कुछ सालों से देखने में आया है कि लद्दाख घूमने के लिए आने वाले पर्यटक इन जानवरों पर दयाभाव दिखाकर इन्हें कुछ खाने को दे देते हैं। नतीजा, इनके लिए यह कदम जानलेवा साबित होता है। विशेषकर, छोटे जानवर इसी वजह से मारे जा रहे हैं।
इसलिए लुप्त हो रहे हैं दुर्लभ जीव
मरमोट जैसे दुर्लभ जीवों के लुप्त्प्राय: होने के पीछे यह एक बड़ा कारण है। सालभर घास पर जिंदा रहने वाले इन जीवों को जब कुछ ऐसा खाने को मिलता है, जो बाद में नियमित तौर पर इन्हें नसीब नहीं होता तो ये भूखे मरने लगते हैं।
एक बार कुछ अलग खाने के बाद इनका स्वाद बदल जाता है। इसके बाद ये हर पल पर्यटकों के खाने का ही इंतजार करते हैं। डॉक्टर इकबाल के मुताबिक, मरमोट को ही देखिये, पहले इस इलाके में इनकी भरपूर तादाद थी। अब गिनती के नजर आते हैं।
पर्यटक इनके साथ सेल्फ़ी लेने के चक्कर में इन्हें कुछ मीठा या नमकीन खाने को दे देते हैं। मई से लेकर सितंबर तक ऐसा ही चलता है। इसका परिणाम यह होता है कि ये जीव घास खाना छोड़ देते हैं। अक्तूबर के बाद यहां कोई नहीं आता। बाहर का खाना मिलता नहीं और घास खाने से ये कतराने लगते हैं। ऐसी हालत में ये जीव भूखे मरने लगते हैं।
यहां के मौसम के हिसाब से इन जीवों के खाने में मोटापे वाला कोई तत्व नहीं होना चाहिये। बिस्कुट, ब्रेड, रोटी, मिठाई व फल इनके शरीर का संतुलन बिगाड़ देते हैं। एक बार इनका स्वाद बदला नहीं कि ये दोबारा से घास की तरफ नहीं देखते। नतीजा, भूख के कारण धीरे-धीरे इनका शरीर शिथिल पड़ने लगता है।कुछ दिन बाद ये खत्म हो जाते हैं।
यही वजह है कि अब रास्ते में जगह-जगह पर बोर्ड लगाकर पर्यटकों से आग्रह किया गया है कि वे इन जानवरों पर दया न दिखायें। वन्य प्राणी विभाग और पशु पालन विभाग की चेतावनी को नजरअंदाज करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।
एक बार कुछ अलग खाने के बाद इनका स्वाद बदल जाता है। इसके बाद ये हर पल पर्यटकों के खाने का ही इंतजार करते हैं। डॉक्टर इकबाल के मुताबिक, मरमोट को ही देखिये, पहले इस इलाके में इनकी भरपूर तादाद थी। अब गिनती के नजर आते हैं।
पर्यटक इनके साथ सेल्फ़ी लेने के चक्कर में इन्हें कुछ मीठा या नमकीन खाने को दे देते हैं। मई से लेकर सितंबर तक ऐसा ही चलता है। इसका परिणाम यह होता है कि ये जीव घास खाना छोड़ देते हैं। अक्तूबर के बाद यहां कोई नहीं आता। बाहर का खाना मिलता नहीं और घास खाने से ये कतराने लगते हैं। ऐसी हालत में ये जीव भूखे मरने लगते हैं।
यहां के मौसम के हिसाब से इन जीवों के खाने में मोटापे वाला कोई तत्व नहीं होना चाहिये। बिस्कुट, ब्रेड, रोटी, मिठाई व फल इनके शरीर का संतुलन बिगाड़ देते हैं। एक बार इनका स्वाद बदला नहीं कि ये दोबारा से घास की तरफ नहीं देखते। नतीजा, भूख के कारण धीरे-धीरे इनका शरीर शिथिल पड़ने लगता है।कुछ दिन बाद ये खत्म हो जाते हैं।
यही वजह है कि अब रास्ते में जगह-जगह पर बोर्ड लगाकर पर्यटकों से आग्रह किया गया है कि वे इन जानवरों पर दया न दिखायें। वन्य प्राणी विभाग और पशु पालन विभाग की चेतावनी को नजरअंदाज करने वालों के खिलाफ कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है।
लेकिन कुत्ते तो रोजाना आर्मी कैंप पर पहुंचते हैं......
लद्दाख में कुत्तों का जीवन सबसे मुश्किल होता है। इन्हें खाने के लिए रोज़ाना कई किलोमीटर का सफ़र तय करना पड़ता है। खारदूंगला, चांगला और चांगथंग के आसपास जितने भी आर्मी या अर्धसैनिक बलों के कैम्प हैं, उनके बाहर कुत्तों की लाइन लगती है।
वजह, उन्हें यहां पर कुछ न कुछ खाने को मिल जाता है। बचा खाना या ख़राब हुई खाद्य सामग्री इन्हें मिल जाती है। बर्फ़ पड़ रही हो या आंधी तूफ़ान हो, ये हर हाल में कैम्प तक पहुंच जाते हैं।
वजह, उन्हें यहां पर कुछ न कुछ खाने को मिल जाता है। बचा खाना या ख़राब हुई खाद्य सामग्री इन्हें मिल जाती है। बर्फ़ पड़ रही हो या आंधी तूफ़ान हो, ये हर हाल में कैम्प तक पहुंच जाते हैं।