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46वें मन की बात में क्या कहा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शब्दश: यहां पढ़ें

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Sun, 29 Jul 2018 12:42 PM IST
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in 46th mann ki baat Narendra Modi talk about chandra shekhar azad and lokmanya tilak
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मेरे प्यारे देशवासियो, नमस्कार। इन दिनों बहुत से स्थान पर अच्छी वर्षा की खबरें आ रही हैं। कहीं-कहीं पर अधिक वर्षा के कारण चिन्ता की भी खबर आ रही है और कुछ स्थानों पर अभी भी लोग वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। भारत की विशालता, विविधता, कभी-कभी वर्षा भी पसंद-नापसंद का रूप दिखा देती है, लेकिन हम वर्षा को क्या दोष दें, मनुष्य ही है जिसने प्रकृति से संघर्ष का रास्ता चुन लिया और उसी का नतीजा है कि कभी-कभी प्रकृति हम पर रूठ जाती है। और इसीलिये हम सबका दायित्व बनता है– हम प्रकृति प्रेमी बनें, हम प्रकृति के रक्षक बनें, हम प्रकृति के संवर्धक बनें, तो प्रकृतिदत्त जो चीजे हैं उसमें संतुलन अपने आप बना रहता है।
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पिछले दिनों वैसे ही एक प्राकृतिक आपदा की घटना ने पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित किया, मानव-मन को झकझोर दिया। आप सब लोगों ने टी.वी. पर देखा होगा, थाईलैंड में 12 किशोर फुटबॉल खिलाड़ियों की टीम और उनके कोच घूमने के लिए गुफा में गए। वहां आमतौर पर गुफा में जाने और उससे बाहर निकलने, उन सबमें कुछ घंटों का समय लगता है। लेकिन उस दिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। जब वे गुफा के भीतर काफी अन्दर तक चले गए– अचानक भारी बारिश के कारण गुफा के द्वार के पास काफी पानी जम गया। उनके बाहर निकलने का रास्ता बंद हो गया। कोई रास्ता न मिलने के कारण वे गुफा के अन्दर के एक छोटे से टीले पर रुके रहे– और वो भी एक-दो दिन नहीं– 18 दिन तक। आप कल्पना कर सकते हैं किशोर अवस्था में सामने जब मौत दिखती हो और पल-पल गुजारनी पड़ती हो तो वो पल कैसे होंगे! एक तरफ वो संकट से जूझ रहे थे, तो दूसरी तरफ पूरे विश्व में मानवता एकजुट होकर के ईश्वरदत्त मानवीय गुणों को प्रकट कर रही थी।


दुनिया भर में लोग इन बच्चों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए प्रार्थनाएं कर रहे थे। यह पता लगाने का हर-संभव प्रयास किया गया कि बच्चे हैं कहां, किस हालत में हैं। उन्हें कैसे बाहर निकाला जा सकता है। अगर बचाव कार्य समय पर नहीं हुआ तो मानसून के सीजन में उन्हें कुछ महीनों तक निकालना संभव नहीं होता। खैर जब अच्छी खबर आयी तो दुनिया भर को शान्ति हुई, संतोष हुआ, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम को एक और नजरिये से भी देखने का मेरा मन करता है कि पूरा ऑपरेशन कैसा चला। हर स्तर पर जिम्मेवारी का जो अहसास हुआ वो अद्भुत था। 

सभी ने, चाहे सरकार हो, इन बच्चों के माता-पिता हों, उनके परिवारजन हों, मीडिया हो, देश के नागरिक हों– हर किसी ने शान्ति और धैर्य का अदभुत आचरण करके दिखाया। सबके-सब लोग एक टीम बनकर अपने मिशन में जुटे हुए थे। हर किसी का संयमित व्यवहार– मैं समझता हूं एक सीखने जैसा विषय है, समझने जैसा है। ऐसा नहीं कि मां-बाप दुखी नहीं हुए होंगे, ऐसा नहीं कि मां के आंख से आंसूं नहीं निकलते होंगे, लेकिन धैर्य, संयम, पूरे समाज का शान्तचित्त व्यवहार– ये अपने आप में हम सबके लिए सीखने जैसा है। इस पूरे ऑपरेशन में थाईलैंड की नौसेना के एक जवान को अपनी जान भी गंवानी पड़ी। 

पूरा विश्व इस बात पर आश्चर्यचकित है कि इतनी कठिन परिस्थितियों के बावजूद पानी से भरी एक अंधेरी गुफा में इतनी बहादुरी और धैर्य के साथ उन्होंने अपनी उम्मीद नहीं छोड़ी। यह दिखाता है कि जब मानवता एक साथ आती है, अदभुत चीजें होती हैं। बस जरूरत होती है हम शांत और स्थिर मन से अपने लक्ष्य पर ध्यान दें, उसके लिए काम करते रहें। पिछले दिनों हमारे देश के प्रिय कवि नीरज जी हमें छोड़कर के चले गए। नीरज जी की एक विशेषता रही थी– आशा, भरोसा, दृढसंकल्प, स्वयं पर विश्वास। हम हिन्दुस्तानियों को भी नीरज जी की हर बात बहुत ताकत दे सकती है, प्रेरणा दे सकती है। 

उन्होंने लिखा था- 

‘अंधियार ढलकर ही रहेगा,
आंधियां चाहे उठाओ,
बिजलियां चाहे गिराओ,
जल गया है दीप तो अंधियार ढलकर ही रहेगा’।
नीरज जी को आदरपूर्वक श्रद्धांजलि देता हूं।
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