प्राचीनकाल से ही भारत में रहा है विज्ञान पर जोर, दुनिया को दिए ये अनमोल उपहार
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दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक भारतीय सभ्यता में विज्ञान और तकनीक पारंपरिक रूप से शामिल रहे हैं। साधु-संतों की भूमि होने के साथ साथ प्राचीन भारत विद्वानों और वैज्ञानिकों का भी घर था। रिसर्च से पता चलता है कि भारत दुनिया को गिनती सिखाने से लेकर दुनिया की सर्वोत्तम स्टील बना कर, सदियों पहले से विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में सक्रिय योगदान दे रहा है। प्राचीन समय में भारतीयों ने कितनी ही प्रमेय और तकनीकों की खोज की थी, जिन्होंने आधुनिक विज्ञान और तकनीक को आधार मिल सका।
कई लोग तो यह भी मानते हैं कि अभी भी प्राचीन भारतीय विज्ञान की सभी खोजें हमारे सामने नहीं आ पाई हैं और जो हम जानते हैं वह इसका महज एक छोटा सा हिस्सा है। आज हम आपको बताने जा रहे हैं विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में प्राचीन भारत के कुछ महत्वपूर्ण योगदानों के बारे में, जिन्हें जानकर आपको अपने भारतीय होने पर गर्व और बढ़ जाएगा।
जब जीरो दिया मेरे भारत ने (Idea of Zero)
भला हो बॉलीवुड का कि पूरब और पश्चिम फिल्म के 'है प्रीत जहां की रीत सदा' गीत की वहज से इस बात को सभी जानते हैं कि गणित के आधार जीरो यानी शून्य की खोज भारत में हुई थी। यह हर समय काल की सबसे महत्वपूर्ण खोज मानी जाती है। गणितज्ञ आर्यभट्ट पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने जीरो के लिए कोई संकेत, कोई सिंबल '0' दिया था। यह आर्यभट्ट के प्रयासों का ही परिणाम था कि गणितीय क्रियाविधियों जैसे जोड़ने और घटाने में शून्य का प्रयोग शुरू हो सका। शून्य की अवधारणा और स्थान-मूल्य प्रणाली में इसके एकीकरण ने केवल दस प्रतीकों का उपयोग करके संख्याओं को लिखने में सक्षम किया, चाहे वह संख्या कितनी भी बड़ी हो।
गिनती आती है: दशमलव प्रणाली ( The Decimal System)
भारत ने दस अंकों द्वारा सभी संख्याओं को व्यक्त करने की एक सरल विधि दी। इस विधि को दशमलव प्रणाली या Decimal System कहते हैं। इस प्रणाली में, प्रत्येक प्रतीक की एक स्थिति और एक निरपेक्ष मूल्य (Absolute Valvue) होता है। दशमलव संकेतन की सरलता की वह से इस प्रणाली ने व्यावहारिक आविष्कारों में अंकगणित के उपयोग को बहुत तेज और आसान बना दिया। इसने गणना करना बहुत सरल कर दिया।
1,2,3...9: अंक सूचनाएं (Numeral Notations)
भारतीयों ने करीब 500 ईसा पूर्व 1 से लेकर 9 तक हर अंक के लिए अलग-अलग प्रतीकों की एक व्यवस्था की खोज कर ली थी। इस अंक सूचना व्यवस्था को बाद में अरब लोगों ने अपनाया। उन्होंने इसे 'हिंद' अंक नाम दिया। सदियों के बाद, इस व्यवस्था की जानकारी पश्चिमी दुनिया को मिली। उन्होंने इसे अरबी अंक (Arabic Numerals) नाम दिया क्योंकि उनके पास यह व्यवस्था अरब व्यापारियों के माध्यम से पहुंची थी। तो अब जान लीजिए कि अरबी या अरेबिक अंक व्यवस्था भी असल में भारतीय ही है।
फिबोनाची नंबर (Fibbonacci Numbers)
फिबोनाची संख्याएं और उनका क्रम सबसे पहले भारतीय गणित में प्रकट होता है। इसके सबसे पहला उल्लेख पिंगला ने अभियोदन की संस्कृत परंपरा के संबंध में किया था। बाद में, इटली के गणितज्ञ फिबोनाची द्वारा पश्चिमी यूरोपीय गणित के लिए अनुक्रम प्रस्तुत करने से बहुत पहले, गणितज्ञ विरहंका, गोपाल और हेमचंद्र ने इन संख्याओं के गठन के तरीके दिए थे।
101010: बाइनरी संख्याएं (Binary Numbers)
बाइनरी संख्याएं उस भाषा की आधार है जिसमें कंप्यूटर प्रोग्राम लिखे जाते हैं। बाइनरी में दो अंक होते हैं, 1 और 0, जिनके संयोजनों को बिट और बाइट (Bits and Bytes) कहते हैं। बाइनरी व्यवस्था का पहला उल्लेख वैदिक विद्वान पिंगल की किताब चंद्रशास्त्र (Chandahsastra) में मिलता है।
परमाणु की अवधारणा (Theroy of Atom)
प्राचीन भारत के प्रख्यात वैज्ञानिकों में से एक कणाद के बारे में कहा जाता है उन्होंने जॉन डॉल्टन के जन्म से सदियों पहले ही परमाणु थ्योरी (Atomic Theory) बना ली थी। उन्होंने एक परमाणु की तरह, अणु या छोटे अविनाशी कणों के अस्तित्व का अनुमान लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि अणु में दो अवस्थाएं हो सकती हैं- पूर्ण विश्राम की अवस्था और एक गति की अवस्था। उन्होंने आगे कहा कि द्वयणुक (डायटॉमिक मॉलीक्यूल) और त्रयणुक (ट्रायटॉमिक मॉलीक्यूल) के उत्पादन के लिए एक ही पदार्थ के परमाणुओं को एक विशिष्ट और सिंक्रनाइज तरीके से संयुक्त किया जाता है।
धरती गोल है: हीलियोसेंट्रिक थ्योरी (The Heliocentric Theory)
प्राचीन भारत के गणितज्ञ अक्सर अपनी गणितीय ज्ञान का उपयोग शुद्ध खगोलीय अनुमान लगाने के लिए करते थे। इनमें सबसे महत्वपूर्ण नाम आर्यभट्ट का है, जिनकी किताब आर्यभटीय ने उस वक्त खगोलीय ज्ञान के बारे में स्रोत की तरह काम किया। उन्होंने कहा था कि धरती गोल है, अपनी धुरी पर घूमती है और सूर्य का चक्कर लगाती है। इसे ही हीलियोसेंट्रिक थ्योरी कहा जाता है। उन्होंने सौर मंडल, चंद्र ग्रहणों, दिन की अवधि और पृथ्वी और चंद्रमा के बीच की दूरी का भी अनुमान लगाया था।
दुनिया की सर्वश्रेष्ठ स्टील: वूट्ज स्टील (Wootz Steel)
वूट्ज स्टील भारत में विकसित एक अग्रणी स्टील मिश्र धातु मैट्रिक्स है। यह एक क्रूसिबल स्टील है जो इस पर बने बैंड के पैटर्न पर आधारित होती है। इसे प्राचीन समय में उक्कु, हिंदवानी और सेरिक आयरन जैसे नामों से जाना जाता था। इस स्टील का इस्तेमाल प्रसिद्ध दमस्कस तलवारों को बनाने में किया जाता था। चेरा वंश के तमिल नागरिक चारकोल की भट्टी के अंदर मिट्टी के एक बंद बर्तन में कार्बन की उपस्थिति में काले मैग्नेटाइट अयस्क को गर्म करके प्राचीन विश्व की इस शानदार स्टील का उत्पादन करते थे
जिंक को गलाना (Smelting od Zinc)
भारत पहला देश था जहां आसवन विधि (Distillation Process) से जिंक को गलाया गया। यह एक उन्नत तकनीक थी जो प्राचीन रसायन विज्ञान के लंबे अनुभव से विकसित की गई थी। प्राचीन पारसियों ने भी जिंक ऑक्साइड को एक खुली भट्टी में तोड़ने की कोशिश की थी, लेकिन नाकामयाब रहे थे। राजस्थान की तिरि घाटी में स्थित जावर दुनिया का पहला ज्ञात प्राचीन जिंक स्मेल्टिंग स्थल है।
धातु की निर्बाध ग्लोब (Seamless Metal Globe)
धातुकर्म (Metallurgy) की सबसे शानदार उपलब्धियों में से एक पहली धातु की निर्बाध ग्लोब कश्मीर में अली कश्मीनी इब्न लुकमान ने बादशाह अकबर के शासन में बनाई थी। साल 1980 में इन ग्लोब के मिलने से पहले आधुनिक धातुकर्म विशेषज्ञ मानते थे कि बिना किसी बाधा के धातु की ग्लोब बनाना तकनीकी रूप से असंभव है।
सुश्रुत संहिता: प्लास्टिक सर्जरी (Plastic Surgery)
6वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सुश्रुत द्वारा लिखी गई 'सुश्रित संहिता' को प्राचीन सर्जरी में सबसे ज्यादा स्पष्ट पुस्तक माना जाता है। इसमें विभिन्न बीमारियों, पौधों, तैयारियों और इलाजों की जानकारी दी गई है। यहां तक कि इसमें प्लास्टिक सर्जरी की जटिल क्रियाओं का वर्णन भी किया गया है। नाक की सर्जरी, जिसे राइनोप्लास्टी (Rhinoplasty) कहते हैं, प्लास्टिक सर्जरी को सुश्रुत संहिता का जाना-माना योगदान है।
जीवन और वेद का ज्ञान: आयुर्वेद (Ayurveda)
यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स से कहीं पहले चरक ने नए चरक संहिता नामक आधारशिला के समान एक पुस्तक लिखी थी। यह पुस्तक आयुर्वेद के प्राचीन विज्ञान पर आधारित थी। भारतीय चिकित्सा के जनक कहे जाने वाले चरक पहले ऐसे चिकित्सक थे जिन्होंने अपनी पुस्तक में पाचन (Digestion), चयापचय (Metabolism) और प्रतिरक्षा (Immunity) की संकल्पना प्रस्तुत की थी। निवारक दवा पर चरक की प्राचीन नियमावली दो सहस्राब्दियों तक इस विषय पर एक मानक कार्य बनी रही और अरबी और लैटिन सहित कई विदेशी भाषाओं में इसका अनुवाद किया गया।
लोहे के आवरण वाले रॉकेट (Iron Cased Rocket)
लोहे के आवरण वाले रॉकेट सबसे पहले 1780 के दशक में मैसूर के टीपू सुल्तान ने विकसित किए थे। टीपू सुल्तान ने एंग्लो-मैसूर युद्ध के दौरान इन रॉकेटों का ब्रिटेन की ईस्ट इंडिया कंपनी की बड़ी सेनाओं के खिलाफ सफलतापूर्वक किया था। इन रॉकेट की मारक क्षमका करीब दो किलोमीटर की थी और उस समय में यह दुनिया के सर्वश्रेष्ठ रॉकेट थे। इन्हीं रॉकेट की वजह से अंग्रेजों को टीपू सुल्तान के हाथों सबसे बुरी पराजय का सामना करना पड़ा था।