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'हिंदू भी तो अपने धर्म के स्कूल चलाते हैं'

Tue, 28 Jun 2016 08:05 PM IST
ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी
ज़ुबैर अहमद/ बीबीसी Updated Tue, 28 Jun 2016 08:05 PM IST
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 " If Hindu religious school run '
मुस्लिम - फोटो : BBC

कैराना के गांवों में खुशहाली साफ नजर आती है। पक्के घर, हरे-भरे खेत, आम से लदे पेड़ और पक्की सड़कें यहां की जमीन उपजाऊ है, जिनकी तुलना पंजाब की जमीनों से की जा सकती है। खुशहाली की इस तस्वीर को भंग करते हैं एक लाइन से बसे वो घर जो अचानक से खेतों में नमूदार होते हैं।

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करीब जाएँ तो मुंबई की झोपड़-पट्टियों वाली कच्ची बस्तियां लगती हैं। अकबरपुर सिंहैति गांव के बाहर बसी इसी तरह की कच्ची बस्ती है, जिसका कोई नाम-पता नहीं है, जहां कोई स्कूल नहीं, डाकखाना नहीं। ऐसा लगता है इस बस्ती को ऊपर से लाकर हरे खेतों के बीच बैठा दिया गया है।
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लगभग तीन साल पुरानी इन बस्तियों में मुजफ्फरनगर दंगों के पीड़ित रहते हैं। यहां वो लोग आकर बसे हैं, जिन्होंने दंगों के दौरान अपने गांवों से पलायन किया था। 28 वर्षीय शबाना अपने परिवार के 9 लोगों के साथ इस कच्ची बस्ती में रहती है। इनमें इसके तीन छोटे बच्चे भी शामिल हैं। गर्मी के कारण सबका बुरा हाल है। 

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अब पास के 'इस्लामिया पब्लिक स्कूल' जाते हैं

 " If Hindu religious school run '
मुस्लिम महिला - फोटो : BBC

स्थानीय स्कूलों में गर्मी की छुट्टियां हैं। शबाना का एक बेटा काफी छोटा है। उसके दो बेटे एक सरकारी स्कूल जाया करते थे। लेकिन अब पास के 'इस्लामिया पब्लिक स्कूल' जाते हैं जहां वो 'क़ुरान, उर्दू, हिंदी और गणित पढ़ते हैं'।

ये स्कूल मदरसे की तरह हैं, जहां पढ़ाई मदरसे की तर्ज पर होती है। बच्चों को सरकारी स्कूल से हटाने के बाद शबाना कहती हैं कि उनके पास दो विकल्प थे या तो बच्चों को घर पर रख कर उन्हें अनपढ़ रखा जाए या फिर इस्लामिया स्कूल भेजा जाए, जहां उनके बेटे इस्लामी  शिक्षा के इलावा हिंदी और गणित भी सीख सकते हैं।

शबाना ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से हटाने का कारण बताते हुए कहा, "सरकारी स्कूल में हमारे बच्चों को दूसरे बच्चे मारते थे। हमने सोचा इस्लामिया स्कूल में हमारे बच्चे सुरक्षित रहेंगे" शबाना के अनुसार सरकारी स्कूल में इस्लामी पढ़ाई की सुविधाएं भी नहीं थीं।

शबाना के बच्चों के अलावा बस्ती के कई दूसरे बच्चे भी इस्लामिया पब्लिक स्कूल या स्थानीय मदरसों में पढ़ते हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कई देहातों और कस्बों में मुस्लिम समुदाय बहुमत में है। शायद इसीलिए हमने लगभग हर गांव में मदरसे देखे, उन गांवों में भी जहां से मुसलमान दंगों के बाद पलायन कर चुके हैं। 

कई हिंदुओं का दावा है कि इन मदरसों के कारण मुसलमानों में कट्टरपन आया है

 " If Hindu religious school run '
मदरसा - फोटो : BBC

कई हिंदुओं का दावा है कि इन मदरसों के कारण मुसलमानों में कट्टरपन आया है। सुरेंदर सिंह बालियान कुटबा गांव के एक जाट किसान हैं। वो केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान के पिता भी हैं। वो मदरसों से चिंतित हैं। सुरेंदर कहते हैं "पिछले 15 सालों में मदरसे बढ़े हैं जिससे मुसलमानों में कट्टरता बढ़ी है। वो मुस्लिम पहचान पर अधिक बल देते हैं।

"शामली के एक जाट किसान महिंदर सिंह कहते हैं कि मुस्लिम कट्टरता को आज के युवा के हुलिए से महसूस कर सकते हैं। वो आगे कहते हैं, "पहले हम में कोई फर्क नहीं था। हम एक बाप की औलाद हैं।

मदरसों से निकलने वाले बच्चे दूर से पहचाने जा सकते हैं। ऊंचा पैजामा, लंबी कमीज, सिर पर गोल टोपी और लंबी दाढ़ी।" इसी तरह के हुलिए वाले हमें एक मदरसे में कई लोग मिले। मदरसा फतहुल उलूम बंद था, लेकिन इसके बावजूद कई बच्चे और शिक्षक वहां मौजूद थे।

एक छात्र ने अपना नाम महफ़ुजुर रहमान उसी तरह से बताया जैसे कि अरब बोलते हैं। यानी अरबी के अक्षर 'हे' पर जोर देकर, हलक से आवाज निकलते हुए उसने अपना नाम बताया। मैंने रहमान से पूछा कि आप पर कट्टरता पालने और फैलाने का आरोप है, क्या कहेंगें? जवाब में कोई अस्पष्टता नहीं थी। 

इस तरह ऊंचे पैजामे, टोपी और लंबी दाढ़ी वालों की संख्या बढ़ती ही रहेगी

 " If Hindu religious school run '
मुस्लिम - फोटो : BBC

"ये मेरा मौल्वियत पढ़ाई का पहला साल है। इसके बाद देवबंद में इस्लाम की ऊंची शिक्षा प्राप्त करूंगा। पढ़ाई पूरी होने पर इस्लाम की खिदमत करूंगा। "इतनी स्पष्टता इस उम्र के लड़के-लड़कियों में बहुत कम देखने को मिलता है।

रहमान मदरसे से पढ़कर मदरसे को ही लौटेंगे और आने वाली पीढ़ियों में अपनी ही तरह के छात्रों को जन्म देंगे। इस तरह ऊंचे पैजामे, टोपी और लंबी दाढ़ी वालों की संख्या बढ़ती ही रहेगी।

लेकिन मदरसे में शिक्षकों और छात्रों ने इस बात से इंकार किया कि अपने धर्म की सेवा करना कट्टरपंथ का सबूत है लुंगी और बनियान में एक घनी दाढ़ी वाले शिक्षक अहमद शहजाद ने कहा, "वो (हिंदू) भी तो अपने धर्म के स्कूल चलाते हैं। हम तो उन्हें कट्टरवादी नहीं कहते।

मदरसे में सीधे रास्ते पर चलना सिखाया जाता है' शबाना बोलने में तेज है, बच्चों के भविष्य को लेकर उत्साहित और महत्त्वाकांक्षी, लेकिन क्या करें? उन्हें भी अपने बच्चों को तालीम के लिए यहीं भेजना पड़ता है।

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