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I.N.D.I Alliance: विपक्षी गठबंधन का क्या होगा? क्या नीतीश ने मनवा ली अपने मन की बात?

Wed, 03 Jan 2024 07:54 PM IST
Shashidhar Pathak शशिधर पाठक
Updated Wed, 03 Jan 2024 07:54 PM IST
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सार
पटना के सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से रिश्ते बेहतर रखते हुए खुद को अब राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कर रहे हैं। ललन सिंह को अध्यक्ष पद से विदा करके नीतीश कुमार समय रहते लोकसभा के सभी जद(यू) सांसदों का मन भांप लेना चाहते हैं...
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I.N.D.I Alliance: What will happen to the opposition alliance? Did Nitish kumar get his wish fulfilled?
I.N.D.I alliance: Nitish Kumar - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

भाजपा ने अपना लक्ष्य तय कर लिया है। उसे 2024 के लोकसभा चुनाव में 400 के पार सीटें जीतनी हैं। प्रधानमंत्री मोदी, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने इसका खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। भाजपा मुख्यालय के सूत्र बताते हैं कि जनवरी 2024 के तीसरे सप्ताह के बाद तस्वीर भी साफ होनी शुरू हो जाएगी। दूसरी तरफ आईएनडीआई गठबंधन में बड़ा घमासान मचा है। हालांकि कांग्रेस मुख्यालय के सूत्र कह रहे हैं कि यह मीडिया में ज्यादा दिखाई दे रहा है। नेताओं के बीच में ऐसा कुछ नहीं है। समय पर सब ठीक हो जाएगा।

इंडिया गठबंधन में सबसे बड़ा पेंच अभी मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस में है। कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे कई मोर्चों पर खुद को असहज पा रहे हैं। मल्लिकार्जुन खरगे अभी तक अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अपनी पूरी टीम नहीं बना पाए हैं। कल 4 जनवरी को खरगे ने सभी पार्टी महासचिवों, राज्यों के प्रभारी, प्रदेश अध्यक्षों और विधानसभा में नेता विरोधी दल के नेताओं की बैठक बुलाई है। यह बैठक 11 बजे पार्टी मुख्यालय में होनी है। इस बैठक में दो ही मुख्य मुद्दे हैं। पहला मुद्दा लोकसभा चुनाव 2024 पर चर्चा करना है। दूसरा मुद्दा 14 जनवरी 2024 से शुरू होने वाली राहुल गांधी 6200 किमी की भारत न्याय यात्रा है। यह यात्रा 14 राज्य, 85 जिलों से होकर 20 मार्च 2024 को मुंबई में संपन्न होगी। कोई 250-275 करोड़ रुपये का खर्च अनुमानित है। दोनों ही मुद्दे काफी समय से कांग्रेस अध्यक्ष को परेशान किए हैं। इसके दो बड़े कारण हैं। एक तो वह उम्रदराज हैं और लोकसभा चुनाव 2024 की चुनौती विकराल है। दूसरा चुनाव के संसाधन, भारत न्याय यात्रा के लिए संसाधन का इंतजाम भी कम पेचीदा काम नहीं है। लेकिन 14 अकबर रोड के सूत्र कहते हैं कि आजादी के आंदोलन से निकली पार्टी आसानी से इसका हल निकाल लेगी। एक पूर्व केंद्रीय मंत्री कहते हैं कि 310-315 लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना है। अभी तो हम सभी का ध्यान इसी पर केंद्रित है।

भाजपा की क्या है रणनीति?

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने पार्टी कार्यकर्ताओं को 400 सीटों के पार का लक्ष्य दिया है। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी की छवि, केंद्र सरकार के कामकाज, योजनाएं, राष्ट्रवाद और विश्व में भारत की छवि को आधार बना रही है। लगभग हर चुनाव में भाजपा का मुख्य ध्यान अपने उम्मीदवारों के चयन पर रहता है। इस बार भी भाजपा जिताऊ उम्मीदवारों को चिन्हित करने के लिए बड़े पैमाने पर होमवर्क कर रही है। माना जा रहा है कि जनवरी 2024 तक पार्टी अपने 100 प्रत्याशियों की घोषणा भी कर सकती है। पार्टी के तमाम नेता दबी जुबान से कहते हैं कि पार्टी 2024 में सफलता के लिए 30-35 फीसदी मौजूदा उम्मीदवारों के टिकट काट सकती है। इतना ही नहीं 2024 के लोकसभा चुनाव में 40-45 फीसदी नए उम्मीदवारों को चुनाव लडऩे का अवसर मिल सकता है।

क्या नीतीश कुमार ने मनवा ली अपनी बात?

पटना के सूत्र बताते हैं कि नीतीश कुमार ने राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव से रिश्ते बेहतर रखते हुए खुद को अब राष्ट्रीय स्तर पर सक्रिय कर रहे हैं। ललन सिंह को अध्यक्ष पद से विदा करके नीतीश कुमार समय रहते लोकसभा के सभी जद(यू) सांसदों का मन भांप लेना चाहते हैं। इस कदम ताल में पहले नीतीश कुमार की भाजपा में खुद से सॉफ्ट कार्नर रखने वाले नेता की टेलीफोन वार्ता को अहम माना जा रहा है। हालांकि नीतीश के करीबी कहते हैं कि उनका इरादा अभी कोई पलटूराम बनने का नहीं लग रहा है।

नीतीश के इस राजनीतिक दांव के बारे में बताते हैं कि लालू प्रसाद ने भी कांग्रेस को ताकीद कर दिया है। कांग्रेस के रणनीतिकार लोकसभा चुनाव 2024 से पहले अभी नीतीश की नाराजगी जैसा कोई बड़ा झटका नहीं मोल लेना चाहते। दूसरे कांग्रेस के नेता भी मानते हैं कि नीतीश कुमार अहम हैं। उनके राजनीतिक अनुभव और चेहरा दोनों की जरूरत है। मल्लिकार्जुन खरगे, राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार में आपसी संवाद चल रहा है। नीतीश कुमार को अहम जिम्मेदारी मिल सकती है।

भाजपा की गहरी नजर नीतीश के हर दांव पर...

भाजपा के रणनीतिकार जानते हैं कि नीतीश कुमार के विपक्ष के साथ बने रहने से कितना बड़ा नुकसान हो सकता है? इस समय भाजपा और खासकर बिहार के नेताओं ने नीतीश कुमार पर राजनीतिक हमले की रफ्तार घटा दी है। जद(यू) में ही एक खेमा है। यह कहना है कि यदि भाजपा लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने, 40 में से लोकसभा की आधी सीटें जद(यू) को देने और भावी मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर नीतीश कुमार को घेषित करके आगे आए, तो नीतीश को पिघलते देर नहीं लगेगी। सूत्र का कहना है कि नीतीश कुमार को जद(यू) को बिहार विधानसभा का तीसरे नंबर की पार्टी बनना पसंद नहीं है। वह जल्द से जल्द इस कलंक को धो लेना चाहते हैं। यह भाजपा के लिए पेचीदा मामला है।

दूसरी तरफ झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर भी प्रवर्तन निदेशालय का दबाव बढ़ रहा है। कांग्रेस के नेता सुबोध कांत सहाय कहते हैं कि इन सभी का मकसद क्या है, आपको नहीं पता? क्या केवल विपक्ष के नेता पर कार्रवाई के लिए ही प्रवर्तन निदेशालय है? सुबोध कांत के मुताबिक इसका मकसद केंद्र की सरकार द्वारा विपक्ष की सरकारों को अपदस्थ करना है। यही आम आदमी पार्टी के प्रवक्ता सौरभ भारद्वाज भी कहते हैं। सौरभ का कहना है कि भाजपा नहीं चाहती कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोकसभा चुनाव 2024 के चुनाव प्रचार में हिस्सा न ले पाएं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र, प.बंगाल में कैसे हो सीट शेयरिंग?

कांग्रेस के पूर्व सांसद और सपा के नेता बिजेंद्र सिंह कहते हैं कि उत्तराखंड, हरियाणा, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल में कोई इंडिया गठबंधन की जरूरत नहीं है। दक्षिण भारत के राज्यों और पूर्वोत्तर में भी कांग्रेस का पुराना तालमेल चल रहा है। इसकी असल की जरूरत तो उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, दिल्ली, महाराष्ट्र, प.बंगाल, जम्मू-कश्मीर समेत अन्य राज्यों में है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कांग्रेस 20 सीट पर उत्तर प्रदेश, 5-6 सीट पर प. बंगाल, 6-7 सीट पर पंजाब, 3-4 सीट पर दिल्ली, 5-6 सीट पर बिहार में चुनाव लडऩा चाहती है। इसी तरह से महाराष्ट्र विधानसभा में कांग्रेस विपक्ष का सबसे बड़ा दल है। उसे अपनी हिस्सेदारी के हिसाब से सीटें चाहिए। विपक्ष के नेता कहते हैं कि असल का पेंच सीटों के बंटवारे को लेकर ही है। बताते हैं कि प. बंगाल में तृणमूल कांग्रेस सहयोगी और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस को 2-3 सीटें ही छोडऩे के लिए तैयार हैं। महाराष्ट्र में एनसीपी (शरद पवार), शिवसेना (उद्धव ठाकरे) अपने दल में टूट के बाद भी सीटों में हिस्सेदारी के दावे को 2019 के अनुपात में बनाए रखना चाहते हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी कांग्रेस के हिस्से में 20 से ज्यादा सीटें देने को तैयार नहीं है। इसी तरह से आम आदमी पार्टी दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस के लिए अनुपात में अधिक सीटें देने के लिए तैयार नहीं हैं। इसी तरह की स्थिति बिहार में भी है। इस पर सहमति बनने के बाद विपक्षी गठबंधन बड़ी चुनौती देने की स्थिति में आ जाएंगे। पर इसका कैसे रास्ता निकलेगा, अभी साफ नहीं है।

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