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Bihar: बिहार में कितना रंग लाएगा राहुल का समाजवाद? माइक्रो मैनेजमेंट के जरिए बदलना चाहते हैं राजनीतिक जमीन
सार
कांग्रेस नेता राहुल गांधी इन दिनों बिहार चुनाव को लेकर रणनीति बनाने में जुटे हुई हैं। इसके लिए बैक-टू-बैक मीटिंग कर रहे हैं। भविष्य की 15 से अधिक मीटिंग की रुपरेखा तय हो रही है। वह माइ्क्रो मैनेजमेंट के जरिए नया प्रयोग कर रहे हैं। आईए जानते हैं उनकी बिहार को लेकर क्या है रणनीति?
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गुजरात में राहुल गांधी
- फोटो : यूट्यूब वीडियो ग्रैब- कांग्रेस
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विस्तार
कांग्रेस के सांसद और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का बिहार में समाजवाद का प्रयोग काफी चर्चा में है। कांग्रेस सांसद योजनाबद्ध तरीके से काम करके पूरे देश में विपक्ष में मजबूत करना चाहते हैं। इसके लिए बैक-टू-बैक मीटिंग कर रहे हैं। भविष्य की 15 से अधिक मीटिंग की रुपरेखा तय हो रही है। वह माइ्क्रो मैनेजमेंट के जरिए नया प्रयोग कर रहे हैं। ऐसे में बड़ा सवाल है कि क्या राहुल गांधी का बिहार में समाजवाद का प्रयोग सफल हो जाएगा?
क्या है बिहार का समाजवाद?
लोकतंत्र में बहुमत का महत्व है। बहुमत का आधार चुनाव की राजनीति में अधिक वोट है। कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि 1990 के बाद में उत्तर भारत में कांग्रेस का यह बहुमत गड़बड़ाया है। 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक को छोड़कर भाजपा हिन्दुत्व के एजेंडे पर 80 प्रतिशत की राजनीति करती है। 80 प्रतिशत में 15 प्रतिशत से थोड़ा ऊपर अगड़ा वर्ग है। 65 प्रतिशत की आबादी पिछड़ा, अति पिछड़ा, वंचित और अन्य हैं। दिलचस्प है कि भाजपा 15 प्रतिशत अगड़ों की राजनीति नहीं करती। जबकि गरीबी एक वर्ग का मामला है और यह अगड़े, पिछड़े, दलित, महा दलित पिछड़े, अल्पसंख्यक सभी में है। ऐसे में अल्पसंख्यकों को छोड़कर यदि आधे-आधे मतों का एनडीए और इंडिया गठबंधन में बंटवारा हो जाए तो अल्पसंख्यकों को मिलाकर विपक्ष का पलड़ा भारी हो जाएगा। क्योंकि भाजपा के पास हिन्दुत्व के सिवा कुछ भी नहीं है। इसलिए राहुल गांधी जिसकी जितनी भागेदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी चाहते हैं। उनके लक्ष्य में युवाओं, बेरोजगारों, वंचितों, दलितो, पिछड़ों को उनके अधिकार दिलाना है। उन्होंने इस मुद्दे को छेड़ दिया है। बिहार विधानसभा में शकील अहमद खान हैं। कांग्रेस के नेता हैं और वह भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। शकील अहमद के अलावा राहुल के सचिवालय के एक सदस्य का कहना है कि यह कोई नया समाजवाद नहीं है। यह पंडित नेहरू के समय में भी था। कांग्रेस हमेशा सभी वर्गों, धर्मों, संप्रादायों को साथ लेकर चलती है। दलित समाज के विधायक राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के कारण यह चर्चा तेज है।
देर से ही सही कांग्रेस ने पहचाना जमीन कहां है?
शकील अहमद के अलावा कांग्रेस के कई नेता हैं, जो मान रहे हैं कि अब पार्टी सही एजेंडे पर चल रही है। कांग्रेस के एक सांसद ने कहा कि 90 के दशक की गलती हम दोहरा रहे हैं। 90 के दशक में मंडल की हवा बही, कमंडल ने ताना बाना बिगाड़ा। यहां कांग्रेस से एक चूक हो गई। कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा करने वाली पार्टी है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता का मजबूती से पक्षधर बनकर पार्टी ने जाति के मुद्दे पर राजनीति करने वाले दलों के साथ खड़े होने का कदम बढ़ा दिया। इससे हम पिछड़ गए। अब राहुल गांधी ने पहल की है। धार्मिक और जातिवादी राजनीति की बजाय उन्होंने मुद्दे और सामाजिक बदलाव तथा इसकी जरूरत को सही ढंग से पहचाना है। यही कारण है कि बिहार में दलित चेहरे को पार्टी ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी है। पूर्व अध्यक्ष अखिलेश सिंह के साथ मिलकर नई रणनीति पर काम हो रहा है। 6-7 साल बाद काफी होमवर्क करके कन्हैया कुमार फिर बिहार में राजनीति की जमीन तैयार कर रहे हैं। वह पलायन रोकने और बेरोजगारी के मुद्दे पर पद यात्रा पर हैं। युवक कांग्रेस के इस अभियान को अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी का पूरा समर्थन मिल रहा है।
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राहुल गांधी ने कितने प्रयोग किए?
आपको याद होगा कि कोट के ऊपर राहुल गांधी का जनेऊ वाला फोटो वायरल हुआ था। तब वह मंदिर में दर्शन करते थे और माथे पर टीका वाली फोटो मीडिया में आती थी। यह राहुल गांधी का सॉफ्ट हिन्दुत्व का प्रयोग था। आरएसएस के विचारक के एन गोविंदाचार्य और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने तब अमर उजाला के माध्यम से राहुल गांधी को सलाह दी थी कि वह इस गलत रास्ते को न चुनें। राम बहादुर राय कहते थे कि आरएसएस और भाजपा की हिन्दुत्व के मुद्दे पर महारत है। यहां कांग्रेस के नेता केवल अपनी पार्टी का नुकसान करेंगे और समय खराब करेंगे। राहुल गांधी धर्म निरपेक्षता के मुद्दे पर खुलकर आए। अल्पसंख्यकों के बारे में अपने अंदाज में बयान दिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि से भी उन्होंने राजनीतिक लड़ाई लड़ी। संघ और भाजपा को टारगेट किया। एंग्री यंग मैन की भूमिका में लगातार बने हैं, लेकिन भारत जोड़ो न्याय यात्रा से राहुल गांधी को अपनी छवि बदलने में काफी सफलता मिली। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रयोग किया। बेरोजगारी, मंहगाई और युवाओं के मुद्दे को मजबूती से उठाया। पिछले साल से वह लगातार जातिगत जनगणना, दलितों, पिछड़ों, वंचिंतो की बात अधिक कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री इसे बिहार के चुनाव में उनका मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं।
...तो क्या बिना लालू यादव की पार्टी को साथ लिए कांग्रेस लड़ेगी चुनाव?
शकील अहमद खान कहते हैं कि ऐसी अफवाह पर क्या बोलना? यह तो खबर के लिए मीडिया खबर चला रही है। हमें पता है कि बिहार में हमारे सामने कौन है? अपनी मजबूती और परिस्थिति का भी अंदाजा है। इसलिए हरियाणा और दिल्ली जैसा प्रयोग बिहार में होने की बिल्कुल होने की संभावना नहीं है। बिहार में कांग्रेस पार्टी सहयोगी दलों(राजद और अन्य) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। हम विधानसभा चुनाव के बाद मिलकर सरकार बनाएंगे और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए तो हराएंगे। शकील कहते हैं कि दो बातों पर गौर करना चाहिए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खराब स्वास्थ्य को जनता देख रही है। जनता में भी इसकी चर्चा है कि नीतीश कुमार को भाजपा चेहरा घोषित करके विधानसभा चुनाव 2025 लड़ेगी, लेकिन चुनाव बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगी। भाजपा और जद(यू) के पास नीतीश कुमार के सिवा कोई चेहरा नहीं है। जबकि राजद के पास लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी का चेहरा है। कांग्रेस के पास चेहरा है।
क्या इस बार कड़ी टक्कर दे देंगे राहुल गांधी?
लाख टके का सवाल है, लेकिन जवाब भविष्य की गर्त में है। पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है कि कांग्रेस में चंद लोगों को छोड़कर निकम्मों की फौज है। राहुल गांधी मंच से कह चुके हैं कि पार्टी में भाजपा को फायदा पहुंचाने वालों की कमी नहीं है। जबकि कांग्रेस के सामने दूसरी और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इस घनघोर व्यवहारिक राजनीति करके अपने लक्ष्य साथ रही है। राहुल गांधी की कोशिश को विफल करने के लिए भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा और गृहमंत्री अमित शाह की ट्रिक्स है। बिहार के 2005 से लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चेहरा है। पार्टी के बिहार से आने वाली पूर्व केन्द्रीय मंत्री का कहना है कि कांग्रेस को पहले बिहार में ही झटका लगा था। इसलिए यहीं से जमीन भी बदलने की संभावना है। बस इंतजार कीजिए।
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क्या है बिहार का समाजवाद?
लोकतंत्र में बहुमत का महत्व है। बहुमत का आधार चुनाव की राजनीति में अधिक वोट है। कांग्रेस के एक बड़े नेता का कहना है कि 1990 के बाद में उत्तर भारत में कांग्रेस का यह बहुमत गड़बड़ाया है। 20 प्रतिशत अल्पसंख्यक को छोड़कर भाजपा हिन्दुत्व के एजेंडे पर 80 प्रतिशत की राजनीति करती है। 80 प्रतिशत में 15 प्रतिशत से थोड़ा ऊपर अगड़ा वर्ग है। 65 प्रतिशत की आबादी पिछड़ा, अति पिछड़ा, वंचित और अन्य हैं। दिलचस्प है कि भाजपा 15 प्रतिशत अगड़ों की राजनीति नहीं करती। जबकि गरीबी एक वर्ग का मामला है और यह अगड़े, पिछड़े, दलित, महा दलित पिछड़े, अल्पसंख्यक सभी में है। ऐसे में अल्पसंख्यकों को छोड़कर यदि आधे-आधे मतों का एनडीए और इंडिया गठबंधन में बंटवारा हो जाए तो अल्पसंख्यकों को मिलाकर विपक्ष का पलड़ा भारी हो जाएगा। क्योंकि भाजपा के पास हिन्दुत्व के सिवा कुछ भी नहीं है। इसलिए राहुल गांधी जिसकी जितनी भागेदारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी चाहते हैं। उनके लक्ष्य में युवाओं, बेरोजगारों, वंचितों, दलितो, पिछड़ों को उनके अधिकार दिलाना है। उन्होंने इस मुद्दे को छेड़ दिया है। बिहार विधानसभा में शकील अहमद खान हैं। कांग्रेस के नेता हैं और वह भी इससे इत्तेफाक रखते हैं। शकील अहमद के अलावा राहुल के सचिवालय के एक सदस्य का कहना है कि यह कोई नया समाजवाद नहीं है। यह पंडित नेहरू के समय में भी था। कांग्रेस हमेशा सभी वर्गों, धर्मों, संप्रादायों को साथ लेकर चलती है। दलित समाज के विधायक राजेश कुमार को प्रदेश अध्यक्ष बनाने के कारण यह चर्चा तेज है।
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देर से ही सही कांग्रेस ने पहचाना जमीन कहां है?
शकील अहमद के अलावा कांग्रेस के कई नेता हैं, जो मान रहे हैं कि अब पार्टी सही एजेंडे पर चल रही है। कांग्रेस के एक सांसद ने कहा कि 90 के दशक की गलती हम दोहरा रहे हैं। 90 के दशक में मंडल की हवा बही, कमंडल ने ताना बाना बिगाड़ा। यहां कांग्रेस से एक चूक हो गई। कांग्रेस एक धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भरोसा करने वाली पार्टी है। इसलिए धर्मनिरपेक्षता का मजबूती से पक्षधर बनकर पार्टी ने जाति के मुद्दे पर राजनीति करने वाले दलों के साथ खड़े होने का कदम बढ़ा दिया। इससे हम पिछड़ गए। अब राहुल गांधी ने पहल की है। धार्मिक और जातिवादी राजनीति की बजाय उन्होंने मुद्दे और सामाजिक बदलाव तथा इसकी जरूरत को सही ढंग से पहचाना है। यही कारण है कि बिहार में दलित चेहरे को पार्टी ने अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी है। पूर्व अध्यक्ष अखिलेश सिंह के साथ मिलकर नई रणनीति पर काम हो रहा है। 6-7 साल बाद काफी होमवर्क करके कन्हैया कुमार फिर बिहार में राजनीति की जमीन तैयार कर रहे हैं। वह पलायन रोकने और बेरोजगारी के मुद्दे पर पद यात्रा पर हैं। युवक कांग्रेस के इस अभियान को अखिल भारतीय कांग्रेस पार्टी का पूरा समर्थन मिल रहा है।
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राहुल गांधी ने कितने प्रयोग किए?
आपको याद होगा कि कोट के ऊपर राहुल गांधी का जनेऊ वाला फोटो वायरल हुआ था। तब वह मंदिर में दर्शन करते थे और माथे पर टीका वाली फोटो मीडिया में आती थी। यह राहुल गांधी का सॉफ्ट हिन्दुत्व का प्रयोग था। आरएसएस के विचारक के एन गोविंदाचार्य और वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय ने तब अमर उजाला के माध्यम से राहुल गांधी को सलाह दी थी कि वह इस गलत रास्ते को न चुनें। राम बहादुर राय कहते थे कि आरएसएस और भाजपा की हिन्दुत्व के मुद्दे पर महारत है। यहां कांग्रेस के नेता केवल अपनी पार्टी का नुकसान करेंगे और समय खराब करेंगे। राहुल गांधी धर्म निरपेक्षता के मुद्दे पर खुलकर आए। अल्पसंख्यकों के बारे में अपने अंदाज में बयान दिए। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की छवि से भी उन्होंने राजनीतिक लड़ाई लड़ी। संघ और भाजपा को टारगेट किया। एंग्री यंग मैन की भूमिका में लगातार बने हैं, लेकिन भारत जोड़ो न्याय यात्रा से राहुल गांधी को अपनी छवि बदलने में काफी सफलता मिली। उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रयोग किया। बेरोजगारी, मंहगाई और युवाओं के मुद्दे को मजबूती से उठाया। पिछले साल से वह लगातार जातिगत जनगणना, दलितों, पिछड़ों, वंचिंतो की बात अधिक कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व केन्द्रीय मंत्री इसे बिहार के चुनाव में उनका मास्टर स्ट्रोक मान रहे हैं।
...तो क्या बिना लालू यादव की पार्टी को साथ लिए कांग्रेस लड़ेगी चुनाव?
शकील अहमद खान कहते हैं कि ऐसी अफवाह पर क्या बोलना? यह तो खबर के लिए मीडिया खबर चला रही है। हमें पता है कि बिहार में हमारे सामने कौन है? अपनी मजबूती और परिस्थिति का भी अंदाजा है। इसलिए हरियाणा और दिल्ली जैसा प्रयोग बिहार में होने की बिल्कुल होने की संभावना नहीं है। बिहार में कांग्रेस पार्टी सहयोगी दलों(राजद और अन्य) के साथ मिलकर चुनाव लड़ेगी। हम विधानसभा चुनाव के बाद मिलकर सरकार बनाएंगे और भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए तो हराएंगे। शकील कहते हैं कि दो बातों पर गौर करना चाहिए। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खराब स्वास्थ्य को जनता देख रही है। जनता में भी इसकी चर्चा है कि नीतीश कुमार को भाजपा चेहरा घोषित करके विधानसभा चुनाव 2025 लड़ेगी, लेकिन चुनाव बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाएगी। भाजपा और जद(यू) के पास नीतीश कुमार के सिवा कोई चेहरा नहीं है। जबकि राजद के पास लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी का चेहरा है। कांग्रेस के पास चेहरा है।
क्या इस बार कड़ी टक्कर दे देंगे राहुल गांधी?
लाख टके का सवाल है, लेकिन जवाब भविष्य की गर्त में है। पार्टी के एक बड़े नेता का कहना है कि कांग्रेस में चंद लोगों को छोड़कर निकम्मों की फौज है। राहुल गांधी मंच से कह चुके हैं कि पार्टी में भाजपा को फायदा पहुंचाने वालों की कमी नहीं है। जबकि कांग्रेस के सामने दूसरी और देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी इस घनघोर व्यवहारिक राजनीति करके अपने लक्ष्य साथ रही है। राहुल गांधी की कोशिश को विफल करने के लिए भाजपा के पास प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का चेहरा और गृहमंत्री अमित शाह की ट्रिक्स है। बिहार के 2005 से लगातार मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का चेहरा है। पार्टी के बिहार से आने वाली पूर्व केन्द्रीय मंत्री का कहना है कि कांग्रेस को पहले बिहार में ही झटका लगा था। इसलिए यहीं से जमीन भी बदलने की संभावना है। बस इंतजार कीजिए।