केंद्र और राज्य के रिश्तों को किस तरफ ले जा रहा है कोरोना, संघीय ढांचा केंद्रीयकरण की ओर!
- केंद्र नें सारे अधिकार खुद रख लिए और जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी
- लॉकडाउन आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत लागू किया गया
- इस एक्ट के तहत संदर्भ में राज्यों पर केंद्र सरकार को बहुत अधिक शक्तियां मिलती हैं
विस्तार
क्या संघीय ढांचे पर केंद्रीयकृत व्यवस्था भारी पड़ रही है। स्वराज इंडिया के अध्यक्ष योगेंद्र यादव कहते हैं कि कोरोना की लड़ाई में केंद्र ने अपनी शक्तियां दिखाई हैं। सारे अधिकार खुद रख लिए और जिम्मेदारी राज्यों पर डाल दी।
कोरोना काल में मामला कानून व्यवस्था का हो या स्वास्थ्य का, इनसे जुड़े सारे आदेश केंद्र की ओर से जारी हो रहे हैं। गवर्नर या राज्यपाल जैसे संवैधानिक ओहदे पर बैठे लोग टीवी पर आकर केंद्र सरकार के फैसलों को जायज ठहराने का प्रयास करते हैं। सहकारी संघवाद केवल भाषणबाजी में ही दिखाई पड़ रहा है।
कोविद-19 के खिलाफ लड़ाई के लिए 24 मार्च को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित किया था। उन्होंने 21 दिनों के राष्ट्रीय लॉकडाउन की घोषणा कर दी। यह लॉकडाउन आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 के तहत लागू किया गया, जो प्रशासनिक कार्यों के संदर्भ में राज्यों पर केंद्र सरकार को बहुत अधिक शक्ति प्रदान करता है।
केंद्र सरकार के इस फैसले पर सवाल उठे। विपक्ष की ओर से कहा गया कि लॉकडाउन 1.0 को क्रियान्वित करने से पहले राज्यों के मुख्यमंत्रियों को विश्वास में लिया जाना चाहिए था। योगेंद्र यादव के अनुसार, इस बाबत कई मुख्यमंत्रियों की शिकायत रही कि हमसे तो पूछा ही नहीं गया।
सरकार की इस एकतरफा प्रतिक्रिया ने हमारे संघीय ढांचे को नुकसान पहुंचाने का काम किया है। कोरोना की लड़ाई के लिए आपदा प्रबंधन अधिनियम 2005 ही क्यों सामने लाया गया। महामारी से जुड़े कई दूसरे एक्ट भी हमारे पास थे, उनके तहत भी हम अच्छा काम कर सकते थे।
केंद्र ने उनका इस्तेमाल नहीं किया, क्योंकि उन्हें राज्यों के ऊपर अपनी राय थोपने का अवसर नहीं मिलता। दरअसल, केंद्र सरकार ‘सहकारी संघवाद’ के ढांचे के विपरित चलने का प्रयास कर रही है।
राज्यपाल अपनी भूमिका अच्छे से नहीं निभा रहे हैं
कुछ साल पहले तक लोग यह देखते आए हैं कि राज्यपाल कभी इस तरह से टीवी पर नहीं आते थे। 15 अगस्त या 26 जनवरी पर झंडा फहराते हुए उन्हें देखा जा सकता था। उसके अतिरिक्त वे सार्वजनिक स्थल पर बहुत कम नजर आते थे।
कुलाधिपति होने के कारण वे विश्वविद्यालयों में जाते रहे हैं। बतौर यादव, अब देखिS केरल और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल तो टीवी पर आकर ऐसे विषयों पर बोल रहे हैं जो किसी न किसी रूप में राजनीति से जुड़े रहते हैं।
कोरोना की लड़ाई में जिस तरह से राज्यों की आवाज और भूमिका को दबाने का प्रयास किया गया, उससे सहकारी संघवाद को करारी चोट लगी है। केंद्र सरकार ने कोरोना की आड़ में एक इशारा कर दिया है कि संघवाद अब ज्यादा नहीं चलेगा।
भारतीय संविधान सरकार को एक संघीय प्रणाली के तहत काम करने की शक्तियां और अधिकार प्रदान करता है। इसमें केंद्र और राज्यों के विधायी विषयों के दायरे और सीमाएं स्पष्ट रूप से परिभाषित की गई हैं।
तब्लीगी समाज को लेकर केंद्र सरकार के पक्ष में आए थे दो राज्यपाल
कोरोना के खिलाफ लड़ाई के दौरान केरल और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल तब्लीगी समाज को लेकर केंद्र सरकार के पक्ष में आ गए थे। इन दोनों राज्यपालों ने तब्लीगी समाज पर न केवल खुलकर सार्वजनिक बयानबाजी की, बल्कि टीवी पर भी ये खुलकर बोलते नजर आए।
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल जगदीप धनकड़ ने ममता बनर्जी को पत्र लिख कहा, दुर्भाग्यवश पश्चिम बंगाल 'पुलिस राज्य' बनता जा रहा है। यहां के लोगों को पता है कि सरकार और सिंडिकेट कौन चलाता है।
इससे पहले राज्यपाल ने दिल्ली में तब्लीगी जमात के एक कार्यक्रम का संदर्भ देते हुए ममता पर अल्पसंख्यक समुदाय के 'खुलेआम तुष्टीकरण' का आरोप लगाया था। दूसरी ओर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल में अपने अधिकारियों की एक टीम भेजकर वहां कोरोना के मामले पर एक रिपोर्ट तैयार करा दी।
इसे लेकर भी ममता बनर्जी काफी परेशान रही हैं। उन्होंने कहा, ये राज्य सरकार में सीधे तौर पर केंद्र का हस्तक्षेप है। केरल के राज्यपाल मोहम्मद आरिफ खान ने भी टीवी पर आकर तब्लीगी समाज को आड़े हाथ लिया था।