Exclusive: आठ राज्यों में 'अल्पसंख्यक' हुए हिंदू, सरकार ने झाड़ा पल्ला
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देश के 8 राज्यों में हिंदू 'अल्पसंख्यक' हो गए हैं, लेकिन 2019 के चुनावों को देखते हुए केंद्र सरकार उन्हें 'अल्पसंख्यक' घोषित करने में कतरा रही है। सरकार ने यह तय करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों पर डाल दी है। वहीं, इन 8 राज्यों में 5 राज्य ऐसे हैं, जहां पर भाजपा या भाजपा गठबंधन की सरकारें हैं। इनमें जम्मू-कश्मीर, पंजाब, मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर और केन्द्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप शामिल हैं।
अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री नकवी
आठ राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने में अल्पसंख्यक मामलों का मंत्रालय काफी सावधानी बरत कर चल रहा है। केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में बताया कि कुछ संगठनों और संस्थानों से हिंदुओं को 'अल्पसंख्यक' दर्जा देने का अनुरोध मिला है।
नकवी के अनुसार केंद्र सरकार राष्ट्रीय स्तर पर किसी समुदाय को अल्पसंख्यक के तौर पर अधिसूचित करती है। जबकि किसी राज्य में किसी समुदाय को अल्पसंख्यक के रूप में घोषित करने का मुद्दा राज्य सरकार के क्षेत्राधिकार में आता है।
क्या कहता है अल्पसंख्यक आयोग
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन गैरुल हसन रिजवी का आठ राज्यों के अल्पसंख्य हिन्दुओं को लेकर कहना है कि इसके लिए इन राज्यों को प्रस्ताव भेजना होगा। रिजवी ने इसकी तुलना कर्नाटक के लिंगायतों से की है। उन्होंने कहा कि जिस तरह से कर्नाटक राज्य सरकार ने लिंगायतों को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देने की सिफारिश की थी, वही सही रास्ता है। इस तरह का प्रस्ताव आने पर ही केंद्र सरकार इसे स्वीकार अथवा निरस्त कर सकती है।
रिजवी ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में 8 नवंबर को इस संदर्भ में एक याचिका दायर की थी। उपाध्याय के रिप्रेजेंटेशन के बाद जनवरी 2018 में इस प्रकरण में तीन सदस्यों की एक उप-समिति गठित की गई है। जॉर्ज कुरियन की अध्यक्षता में इस समिति में महाराष्ट्र से सुलेखा कुमबारे और पंजाब से मंजीत सिंह राई को शामिल किया गया है। इस समिति की रिपोर्ट आने के बाद आयोग इसमें आगे की कार्रवाई करेगा।
सुप्रीम कोर्ट से लगाई गुहार
8 राज्यों में हिंदुओं को 'अल्पसंख्यक' का दर्जा देने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में 8 नवंबर को एक याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई करते हुए उन्हें राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग जाने की सलाह दी। उपाध्याय ने अदालत के आदेशानुसार 13 नवंबर को राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग में प्रेजेंटेशन दिया। हालांकि अभी तक यह मामला आयोग में भी विचार और तीन सदस्यीय सिमति की रिपोर्ट इंतजार के स्तर पर ही है।
साल के आखिर तक सौंपेगे रिपोर्ट
आयोग के सूत्रों के मुताबिक 8 राज्यों में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने को लेकर समिति एक अंतरिम रिपोर्ट तैयार कर चुकी है, लेकिन आधिकारिक रूप से इसे सरकार के सामने पेश नहीं किया जा रहा है। इस पर, आयोग के चेयरमैन रिजवी का कहना है कि रिपोर्ट पर काम चल रहा है और इस साल के आखिर तक ही सरकार को सौंपी जाएगी। लेकिन अंदरखाने से सूत्र बताते हैं कि यह देरी कुछ विशेष कारणों से हो रही है।
समझा जा रहा है कि 2019 के आम चुनाव से पहले सरकार इस मुद्दे पर अपने हाथ नहीं जलाना चाहती। वैसे भी इन आठ राज्यों में से पांच राज्यों में भाजपा के सहयोग की सरकार है। भाजपा मुख्यालय सूत्रों का कहना है कि इन राज्यों से अल्पसंख्यक हिेंदुओं को उनका हक दिलाने के लिए जरूरी प्रस्ताव (अल्पसंख्यक दर्जा)भेजने में राज्य के मुख्यमंत्री आनाकानी कर सकते हैं।
अदालत ने कहा, राज्यस्तर पर मिले दर्जा
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की लड़ाई लड़ने वाले वकील अश्विनी उपाध्याय का कहना है कि अदालत की 11 सदस्यों की बैंच ने 2002 में पंजाब के मामले में दिशा-निर्देश तय किया था। अदालत ने अल्पसंख्यक मामले की सुनवाई करते हुए टीएमए पाई केस में माइनॉरिटी पर ही सवाल उठाया था। अदालत ने व्याख्या करते हुए अपने फैसले में कहा था कि देश में राज्यों का विभाजन भाषाई आधार पर हुआ है, न कि धर्म के आधार पर। इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बजाय राज्य स्तर पर ही अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाए।
8 राज्यों में कितनी है हिंदुओं की आबादी
उपाध्याय ने अपनी याचिका में कहा था कि 8 राज्यों, जम्मू-कश्मीर में 28.44 प्रतिशत, पंजाब में 38 प्रतिशत, मिजोरम में 2.75 प्रतिशत, नागालैंड में 8.75 प्रतिशत, मेघालय में 11.53 प्रतिशत, अरुणाचल प्रदेश में 29.04 प्रतिशत, मणिपुर में 41.39 प्रतिशत और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में 2.77 प्रतिशत के साथ हिंदुओं की आबादी 50 फीसदी से भी कम है।
अब तक 6 धर्मों को मिला है अल्पसंख्यक का दर्जा
गौरतलब है कि 17 मई, 1993 अल्पसंख्यक अधिनियम के लिए राष्ट्रीय आयोग अस्तित्व में आया, जिसके बाद राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का गठन हुआ। जिसके बाद 23 अगस्त 1993 को सरकार ने मुस्लिम, ईसाई, सिख, बोद्ध, जैनियों और पारसियों को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया।