अपनी जमीन से हजारों किलोमीटर दूर बैठकर भारतीय परंपराओं के पोषकों ने माना कि हिंदी विश्व की सबसे श्रेष्ठ, सरल और मधुर भाषा है। परदेस में भी हमारी मातृभाषा और भारतीय संस्कृति को मानने वालों की तादात बढ़ी है। लेकिन फिर भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
अमर उजाला फाउंडेशन की ओर से चलाये जा रहे #हिंदीहैंहम अभियान के अगले चरण में शनिवार को दूसरे अंतरराष्ट्रीय वेबिनार का आयोजन किया गया। इस दौरान ‘मातृभाषा हिंदी की चुनौतियाँ, अवसर और आपके अनुभव’ नामक विषयक वेबिनार में दुनिया के अलग-अलग देशों से लोगों ने हिस्सा लिया।
मनीष दीक्षित, व्यवसायी, न्यूजीलैंड (होटल, रेस्त्रां और निर्माण आदि का व्यापार)
2 of 10
मनीष दीक्षित
- फोटो : Amar Ujala
हिंदी भाषा को लेकर लोगों में हीनभावना देखने को मिलती है। आज कल युवा हिंदी बोलने में शर्माते हैं। समय के साथ हमें अपनी भाषा के सरलीकरण पर ध्यान देना होगा, जिससे युवा सहजता और आत्मीयता से इसे अपना सके। युवाओं में हिंदी के प्रति रुझान पैदा करने के लिए हमें उनकी पसंदीदा चीजों और विषयों को सरल हिंदी में करके उन तक पहुँचाना होगा। हमें अपनी भाषा और देश पर गर्व होना चाहिए।
मयंक छाया, वरिष्ठ पत्रकार और लेखक, कैलीफोर्निया (संपादक, भारत एफ.एम.)
युवा पीढ़ी का रुझान हिंदी भाषा की तरफ दिनों दिन कम होता दिख रहा है। इसका मुख्य कारण यह है कि युवाओं ने पढ़ना बंद कर दिया है, ये दुर्भाग्य की बात है। दूसरे देशों में लोग अपनी मातृभाषा को लेकर खासा सम्मानित महसूस करते हैं। यह भाव भारतीय युवाओं में भी जागृत होनी चाहिए।
गौरव चौधरी, विद्यार्थी, ऑस्ट्रेलिया (अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक, डैनफोर्ड कॉलेज मेलबॉर्न)
अपने भावनाओं की अभिव्यक्ति और मन की बात हम अपनी मातृभाषा में ही कर सकते है। अंग्रेजी को अधिक महत्त्व देने की वजह से हिंदी भाषा के प्रति युवाओं का रुझान कम हो रहा है। बच्चे अपने घर के माहौल में ज्यादा सीखते हैं। अपनी जड़ से जुड़े होने का अनुभव हमें गौरवान्वित महसूस कराता है।
नीरज भाटिया, चार्टर्ड एकाउंटेंट, कैलीफोर्निया (अंतरराष्ट्रीय और घरेलू कर नियोजन के जानकार)
नीरज भाटिया जनवरी, 2018 एन.आर.आई. वेलफेयर सोसाइटी, थाईलैंड की ओर से ‘हिन्द रत्न सम्मान’ से सम्मानित हैं। इनका कहना है कि औपचारिक तौर पर हिंदी को बढ़ावा देने के लिए हम सभी को अपने-अपने स्तर पर प्रयास करना है। अपनी नींव को मजबूत बनाने के लिए हमें प्राथमिक शिक्षा में हिंदी की अनिवार्यता होने पर जोर देना होगा।