Himachal Election: जेपी नड्डा की सबसे बड़ी अग्निपरीक्षा है हिमाचल चुनाव, जीत से बढ़ जाएगा पार्टी में दबदबा
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विस्तार
चुनाव आयोग ने हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव की तारीखों का एलान कर दिया है। इस पहाड़ी राज्य में 12 नवंबर को एक ही चरण में सभी 68 सीटों के लिए मतदान होगा और आठ दिसंबर को परिणाम घोषित होंगे। इस बीच गुजरात विधानसभा चुनावों के लिए भी मतदान हो सकता है और उसका परिणाम भी हिमाचल प्रदेश के चुनाव परिणाम के साथ ही घोषित किया जा सकता है। चूंकि अभी से अगले आम चुनावों की चर्चा भी शुरू हो चुकी है, इन चुनाव परिणामों की व्याख्या उसके संदर्भ में भी की जा सकती है। भाजपा को जीत मिली, तो वह इसे ‘मोदी लहर’ के बरकरार रखने के रूप में प्रचारित करेगी, वहीं यदि भाजपा का प्रदर्शन कमजोर रहा तो विपक्ष इसे ‘मोदी तिलस्म’ के बिखरने के रूप में प्रचारित करेगा। यही कारण है कि सभी दलों ने इसके लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
जनवरी में खत्म हो रहा है नड्डा का कार्यकाल
लेकिन चूंकि इन राज्यों का चुनाव भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के वर्तमान कार्यकाल का अंतिम चुनाव होगा (नड्डा का कार्यकाल अगले वर्ष की जनवरी माह में समाप्त हो रहा है), यह उनके लिए विशेष अग्निपरीक्षा साबित होंगे। हिमाचल प्रदेश को नड्डा का गृहप्रदेश माना जाता है। इससे इस राज्य में जीत दिलाने की उनकी जिम्मेदारी और भी ज्यादा बढ़ गई है। यदि इन चुनावों में भाजपा को बंपर जीत मिलती है, तो इससे पार्टी में उनका दबदबा बढ़ सकता है और उन्हें पार्टी अध्यक्ष के रूप में दोबारा कार्यकाल भी मिल सकता है, जबकि प्रदर्शन कमजोर रहने से उनकी साख प्रभावित हो सकती है।
जेपी नड्डा को संगठन का व्यक्ति माना जाता है। वे शिक्षा जीवन से ही एबीवीपी से जुड़े रहे और बाद में भाजपा की युवा इकाई में काम किया। अध्यक्ष बनने से पहले उन्हें यूपी के सबसे कठिन मोर्चे पर लगाया गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव में यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का गठबंधन हुआ था। जातिगत समीकरणों के आधार पर चुनावी पंडित इसे ‘अजेय’ मान रहे थे। ऐसा लग रहा था कि 2014 में मोदी को रिकॉर्ड 73 सीटें देने वाले उत्तर प्रदेश में भाजपा का खाता खुलना भी मुश्किल हो जाएगा और उसके लिए इस नुकसान की भरपाई करना संभव नहीं होगा। ऐसे कठिन समय में नड्डा को इस प्रदेश की जिम्मेदारी दी गई और उन्होंने सभी को आश्चर्य में डालते हुए भाजपा को 64 सीटों पर सफलता दिलाई। इसके बाद ही उन्हें पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी सौंपी गई।
हिमाचल प्रदेश में क्या होगा
हिमाचल प्रदेश का इतिहास हर बार सत्ता बदलने का रहा है। जनता एक बार भाजपा को तो दूसरी बार कांग्रेस को सत्ता सौंपती रही है। इस लिहाज से इस बार यहां कांग्रेस की दावेदारी मजबूत है। पिछले तीन उपचुनावों में कांग्रेस को मिली जीत भी जनता का मन बदलने के संकेत के रूप में देखी जा रही है। इस पहाड़ी प्रदेश के हर दूसरे-तीसरे घर से एक जवान सेना की नौकरी में जाता है। सेना में अग्निवीर योजना लागू होने से यहां के लोग उसे अपने भविष्य से खिलवाड़ के तौर पर देख रहे हैं। सेब उत्पादक किसानों के लिए कई वादों के बाद भी बड़े प्रसंस्करण संस्थानों के न खुलने से उनमें भाजपा के लिए नाराजगी है। ये समीकरण भाजपा के खिलाफ जाते हैं।
लेकिन भाजपा के लिए यह बात तसल्ली देने वाली हो सकती है कि कांग्रेस यहां बिखरी हुई है। वीरभद्र सिंह की मौत और आनंद शर्मा की पार्टी से नाराजगी के कारण उसके पास बड़े नेताओं का अभाव है। हाल ही में हिमाचल प्रदेश के कार्यकारी अध्यक्ष ने भी कांग्रेस का हाथ छोडकर कमल का दामन थाम लिया जो जनता के बीच उसकी छवि खराब करते हैं। पार्टी छोड़ने के बाद उन्होंने पार्टी में परिवारवाद का आरोप लगाया है।
कांग्रेस की तैयारी कमजोर
राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ में व्यस्तता के बीच कांग्रेस पार्टी के प्रचार का पूरा दारोमदार प्रतिभा सिंह पर टिका हुआ है। लेकिन बताया जा रहा हैं कि वे एक मंजे हुए राजनेता की तरह पार्टी को आगे नहीं बढ़ा पा रही हैं और पार्टी के चंद लोगों के बीच सिमट कर रह गई हैं। इससे पार्टी की चुनावी तैयारियों पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। खुद को अकेला पाकर उन्होंने पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व पर प्रदेश की उपेक्षा का आरोप लगाया है। हालांकि, प्रियंका गांधी अब वहां सक्रिय होती दिख रही हैं, लेकिन वे पार्टी को कितना लाभ पहुंचा सकेंगी, फिलहाल कहा नहीं जा सकता।
कांग्रेस के कमजोर रहने से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी भाजपा को लाभ मिल सकता है। उसके पास पीएम नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा, सीएम जयराम ठाकुर और युवाओं में लोकप्रिय केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर जैसे नेता और एक मजबूत पार्टी संगठन है। ऐसे में यूपी-उत्तराखंड में लगातार सरकार बनाने का रिकॉर्ड बना चुकी भाजपा हिमाचल प्रदेश में भी इतिहास बदल दे तो बहुत आश्चर्य नहीं होगा।