यहां नहीं है कोई पाबंदी, मजारों पर हाजिरी देने आती हैं महिलाएं
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर बरेली देश में तमाम दरगाहें और मजार ऐसी हैं जहां महिलाओं के जाने पर कोई पाबंदी नहीं है। यहां के जिम्मेदार लोगों का भी मानना है कि महिलाओं के आने में कोई हर्ज नहीं है। अलबत्ता दरगाह की पवित्रता का ख्याल रखते हुए कुछ एहतियात बरतने की हिदायत जरूर करते हैं।
शहर की ही तमाम दरगाहों और मजारों का जिक्र करें तो यहां की कई प्रमुख दरगाहों पर बड़ी संख्या में महिलाएं हाजरी देने आती हैं। इसमें खास तौर से खानकाह नियाजिया, दरगाह हजरत शाह शराफत मियां, दरगाह हजरत शाहदाना वली, दरगाह हजरत बशीर मियां, दरगाह हजरत नासिर मियां, मजार हजरत दुल्हा मियां, हजरत झाड़-झूड़ शाह बाबा सहित दर्जनों ऐसे आस्ताने हैं जहां महिलाएं मन्नतों मुराद के लिए पहुंचती हैं।
खानकाह नियाजिया के प्रबंधक शब्बू मियां नियाजी का कहना है कि दरगाहों ने तो हमेशा जोड़ने का काम किया है। ये तो बुजुर्गों का दर है यहां सभी लोग बिना जात-ओ मिल्लत आते हैं। इसी तरह महिलाएं भी हमारे समाज का हिस्सा हैं। इन्हें हमेशा इज्जत की नजर से देखा गया है।
खानकाह में सबको बराबरी का दर्जा
समाज में महिलाओं का काम किरदारसाजी (चरित्र निर्माण) का है। मां के तौर पर उसकी गोद ही बच्चे का पहला स्कूल होती है। खानकाह में सबको बराबरी का दर्जा है। महिलाओं को भी मर्दों के बराबर का दर्जा है। उन्होंने कहा कि खाने काबा में हज के दौरान भी सभी बराबर होते हैं कोई भेद भाव नहीं है। वहां महिला पुरुष सभी एक साथ हज के अरकान अदा करते हैं।
इसी तरह मजारों पर भी जा सकती हैं। इतना जरूर ख्याल रखा जाए कि दरगाहें तफरीह की जगह नहीं हैं यह अदब और रुहानियत की जगह है। यहां बेअदबी करना गुनाह है। हां कुछ ऐसे भी बुजुर्ग हैं जो जलाली (सख्त) हैं, और महिलाओं को मना है उनके यहां जरूर महिलाओं को नहीं जाना चाहिए।
हजरत शाहदाना वली की दरगाह के मुतवल्ली अब्दुल वाजिद खां (बब्बू मियां) का कहना है कि यूं तो शरियत के एतबार से दरगाहों पर महिलाओं का आना मना है। यहां दरगाह शाहदाना वली की बात अलग है। यहां महिलाएं मरीज के तौर पर आती हैं मगर आस्ताने के अंदर जाने की इजाजत नहीं है। दरगाह नासरी के खादिम वसीम नासरी साबरी का कहना है कि नासिर मियां की दरगाह पर हमेशा से महिलाएं आती रही हैं और उन्हें कभी रोका नहीं गया है। इसमें कभी कोई हर्ज नहीं माना गया।
उलमा एक फैसला दें
खानकाह वामिकिया निशातिया के सज्जादा नशीन मौलाना सय्यद असलम मियां वामिकी का कहना है कि दरगाह और मजार पर महिलाओं की हाजरी के मामले में खानकाहों और उलमा को चाहिए कि शरियत की रोशनी में एक होकर फैसला दें। बात सिर्फ हाजी अली की दरगाह की नहीं है, दुनियां की सारी दरगाहों और मजारों का है। वैसे देखा जाए तो हर दरगाहों में महिलाओं के हाजरी देने के लिए पर्दें का इंतजाम रहता है। महिलाएं अगर शरियत के दायरे में रहकर हाजरी दें तो सही है।