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मंजिलें और भी हैं : गरीबी में मिली मदद से जगी सहयोग की ललक

Thu, 06 Jun 2019 12:48 AM IST
Avdhesh Kumar कपिल सहगल
कपिल सहगल Published by: Avdhesh Kumar Updated Thu, 06 Jun 2019 12:48 AM IST
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Help in poverty worldly cooperation
कपिल सहगल - फोटो : अमर उजाला
मैं उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद का रहने वाला हूं। मेरा बचपन बेहद गरीबी में बीता। मेरे पिताजी सीए के पद से कार्यमुक्त थे। परिवार में 12 सदस्य थे। पिताजी अक्सर बीमार रहते थे। गरीबी का आलम यह था कि कभी-कभार हमें भूखे सो जाना पड़ता था। मैं पढ़ाई करना चाहता था, लेकिन इंटरमीडियट की पढ़ाई के लिए मेरे पास 20 रुपये तक नहीं थे। मैंने कई रिश्तेदारों से मदद मांगी। हालांकि मेरे रिश्तेदार हमसे काफी धनवान थे, लेकिन बुरे वक्त में कोई मेरे काम न आया। फिर मेरे पिताजी के एक मित्र ने मेरी मदद की, तब जाकर मैं पढ़ पाया।
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उस घटना का मेरे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ा और मैने ठान लिया कि जीवन में कुछ बन पाया, तो किसी भी जरूरतमंद को कभी मदद के लिए मना नहीं करूंगा। इंटरमीडिएट पास करने के बाद घर को आर्थिक सहयोग पहुंचाने के उद्देश्य से मैं सब्जी बेचने लगा। लेकिन उससे इतनी आमदनी नहीं होती थी कि मैं घर का खर्च संभालने के बाद दूसरों की मदद कर सकूं। एक दिन मेरे एक परिचित व्यक्ति ने मुझसे कहा, पढ़े-लिखे होकर सब्जी बेचते हो, नौकरी क्यों नहीं कर लेते? मैंने उनसे नौकरी न मिलने की बात कही। इस पर उन्होंने मेरी मदद की और मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में क्लर्क हो गया। कुछ दिन बाद मुझे इलाहाबाद उच्च न्यायालय में सेक्शन ऑफिसर की नौकरी मिल गई। तब तक मैं इस स्थिति में आ चुका था कि दूसरों की मदद कर सकूं।
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1972 से मैंने जरूरतमंद छात्रों की फीस, कॉपी-किताब जैसे खर्चे में मदद करनी शुरू कर दी। साथ ही बीमार लोगों के इलाज में भी सहयोग करने लगा। इसके बाद गरीब परिवार की लड़कियों की शादियां अपने खर्चे पर करवाने लगा। मेरे इस काम में मेरी पत्नी ने,  जो अध्यापिका थीं, हर कदम पर मेरा साथ दिया। कई बार तो ऐसा होता है कि मेरी और पत्नी की पेंशन मदद में ही खर्च हो जाती है। चूंकि किसी भी लड़की के विवाह जैसे खर्च मैं अकेले उठा पाने में असमर्थ था, इसलिए मैंने समाज के अन्य लोगों से भी मदद लेनी शुरू की। इसके बाद जनप्रतिनिधियों के अलावा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायाधीश, अधिकारी, कर्मचारी साथ ही मेरे कई मित्रों और व्यापारियों ने मुझे सहयोग देना शुरू कर दिया। 
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परिणामस्वरूप मैंने अब तक 104 गरीब परिवार की लड़कियों की शादी करवाई है। मैं अक्सर देखता था कि भूख-प्यास से तड़पते पक्षी अक्सर घरों के आसपास मंडराते थे, लेकिन कुछ न मिलने पर वापस उड़ जाते थे। मैंने उनके लिए दाना-पानी का इंतजाम किया। शुरू में छत पर पक्षी नहीं आते थे, लेकिन जब प्रतिदिन वहां दाना-पानी मिलने लगा तो, सैकड़ों पक्षी आने लगे। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि, छत पर खाद्य पदार्थ पहुंचाने में देर हो गई, लेकिन जब ऊपर गया तो पक्षियों को इंतजार करते पाया। 


मेरे घर की दूसरी मंजिल की छत उनके लिए ही है, जहां उन्हें पानी और चावल, बाजरा, भिगोया गेहूं व रोटी के टुकड़े हर वक्त मिलते हैं। यह काम मैं स्वयं करता हूं, लेकिन मेरी अनुपस्थिति में इसका जिम्मा मेरी बहुएं संभालती हैं। मेरा मानना है कि अपनी दुनिया तक सिमटते जा रहे समाज में एक दूसरे की मदद बहुत जरूरी है। दूसरों का सहयोग कर मुझे जो खुशी मिलती है, उसी की बदौलत मैं स्वस्थ हूं, मन प्रफुल्लित रहता है, रात को अच्छी नींद आती है। आराम की जिंदगी जी रहा हूं, और क्या चाहिए!
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