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Supreme Court: EWS आरक्षण पर समीक्षा याचिकाओं पर नौ मई को 'सुप्रीम' सुनवाई; पढ़ें शीर्ष कोर्ट की अहम खबरें

Thu, 04 May 2023 10:17 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Thu, 04 May 2023 10:17 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने  सात नवंबर को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने के केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराया था। पढ़ें सुप्रीम कोर्ट की अहम खबरें...

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hearing on May 9 on review petitions on EWS reservation; Read important news of Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

ईडब्ल्यूएस आरक्षण मुद्दों पर केंद्र के फैसले को सही ठहराने वाले फैसले के खिलाफ दाखिल समीक्षा याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट नौ मई को सुनवाई करेगा। CJI डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। इन याचिकाओं में 103वें संवैधानिक संशोधन की वैधता को चुनौती दी गई है। यह आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) को सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में 10% आरक्षण प्रदान करता है।बता दें कि  सुप्रीम कोर्ट ने  सात नवंबर को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण बरकरार रखने के केंद्र सरकार के फैसले को सही ठहराया था।

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सबसे पहले समझें क्या है EWS, कहां फंसा था पेच? 
EWS का मतलब है आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आरक्षण। यह आरक्षण सिर्फ जनरल कैटेगरी यानी सामान्य वर्ग के लोगों के लिए है। इस आरक्षण से SC, ST, OBC को बाहर किया गया है। दरअसल, 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र की मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी आरक्षण दिया था। इसके लिए संविधान में 103वां संशोधन किया किया था। वैसे कानूनन, आरक्षण की सीमा 50 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। अभी देशभर में एससी, एसटी और ओबीसी वर्ग को जो आरक्षण मिलता है, वो 50 फीसदी सीमा के भीतर ही है। मामला यहीं फंस गया था कई लोगों को आपत्ति थी कि सामान्य वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण मिलने से यह करीब 60 फीसदी के बराबर हो जाएगा जो कि संविधान को घोर उल्लंघन है। केंद्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 40 से ज्यादा याचिकाएं दायर हुई थीं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने 27 सितंबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था। इसके अलावा फरवरी 2020 में मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में पांच छात्रों ने भी आरक्षण के खिलाफ याचिका दायर की थी।  
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50 फीसदी सीमा में किसे कितना आरक्षण, केंद्र सरकार ने दी सफाई
50 फीसदी सीमा में ओबीसी को 27 फीसदी, एससी को 15 फीसदी और एसटी को 7.5 फीसदी आरक्षण मिला है। लेकिन सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को 10 फीसदी आरक्षण मिलने से यह सीमा 59.5 फीसदी हो जाती है। लेकिन केंद्र सरकार ने इसपर सफाई देते हुए कहा था कि आरक्षण के 50% बैरियर को हमने नहीं तोड़ा है क्योंकि 1992 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने ही कहा था कि  50% से ज्यादा आरक्षण नहीं दिया जाना चाहिए ताकि बाकी 50% जगह सामान्य वर्ग के लोगों के लिए बची रहे। यह आरक्षण 50% में आने वाले सामान्य वर्ग के लोगों के लिए ही है। यह बाकी के 50% वाले ब्लॉक को डिस्टर्ब नहीं करता है।

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तलाक-ए-हसन के बारे में जानें - फोटो : amar ujala

‘तलाक-ए-हसन’ की वैधता की जांच करेंगे - सुप्रीम कोर्ट न्यायालय
इन दिनों सुप्रीम कोर्ट में तलाक-ए-हसन का मामला चर्चा में है। तलाक-ए-हसन इस्लामिक कानून के अंतर्गत तलाक की एक प्रक्रिया है। इसके पहले तीन तलाक भी सुर्खियों में रहा था, जब भारत सरकार ने कानून बनाकर तीन तलाक को प्रतिबंधित कर दिया था। वहीं अब तलाक ए हसन को भी बैन करने की मांग उठ रही है। तलाक ए हसन को अमान्य और असंवैधानिक घोषित करने की गुहार लगाई जा रही है। इस बीच गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि वह मुसलमानों के बीच ‘तलाक-ए-हसन’ जैसे न्यायेतर तलाक की वैधता को चुनौती देने वाले बड़े संवैधानिक मुद्दे की जांच करेगा।

गौरतलब है कि तलाक-ए-हसन को चुनौती देने वाली आठ याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। इन याचिकाओं की सुनवाई प्रधान न्यायाशीध डी.वाई. चंद्रचूड़, न्यायमर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला की पीठ कर रही है। पीठ ने इस दौरान यह भी कहा कि वह व्यक्तिगत वैवाहिक विवादों में नहीं उलझेगी।

इन याचिकाओं में गाजियाबाद की निवासी बेनजीर हिना की याचिका भी शामिल है।उन्होंने एकतरफा गैर न्यायिक तलाक-ए-हसन की पीड़िता होने का दावा किया है। उन्होंने तलाक के लिए लैंगिक एवं धार्मिक रूप से तटस्थ और सभी नागरिकों के लिए एक समान आधार के बनाने के दिशानिर्देश तैयार करने का केंद्र को निर्देश देने का भी अनुरोध किया है।

पीठ ने कहा कि चूंकि अदालत एक संवैधानिक चुनौती पर विचार कर रही है। ऐसे में यह साफ किया जाता है कि याचिकाकर्ता (हिना) और नौवां प्रतिवादी (उसका पति), जो पहले से ही अपने वैवाहिक मुद्दों के समाधान के लिए विभिन्न मंचों से संपर्क कर चुके हैं। ऐसे में कोई भी मामला जो संवैधानिक मुद्दे से संबंधित नहीं होगा उसे रिकॉर्ड पर नहीं लिया जाएगा।

क्या है तलाक-ए-हसन
सुप्रीम कोर्ट में तलाक-ए-हसन का मामला पहुंचा है। तलाक की इस प्रक्रिया में तीन महीने लगते हैं। पुरुष तीन महीने में हर महीने एक एक बार करके तीन बार तलाक बोलकर शादी तोड़ सकता है। पहली बार तलाक बोलने पर भी पति पत्नी एक साथ रहते हैं। अगर इन तीन महीनों में दोनों में सुलह हो गई तो पति तलाक लेना कैंसिल कर सकता है और वरना तीसरे महीने में आखिरी बार तलाक बोलकर रिश्ता खत्म कर सकता है। इस तरह के तलाक के बाद पति पत्नी दोबारा निकाह कर सकते हैं लेकिन पत्नी को हलाला से गुजरना पड़ता है यानी अपने पति से शादी से पहले किसी दूसरे मर्द से शादी करके उससे तलाक लेना पड़ता है।

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया

यूपी में समय से पहले रिहाई के मामलों पर विचार के तौर-तरीकों को किया जाए दुरुस्त
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा, उत्तर प्रदेश में पात्र दोषियों की समय से पहले रिहाई के मामलों के समय पर विचार सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित तौर-तरीकों को दुरुस्त किया जाना चाहिए। जेल महानिदेशक, राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (नालसा) के सचिव और अन्य संबंधित अधिकारियों की एक बैठक अगले हफ्ते बुलाई जाए।

सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा, बैठक में चर्चा के आधार पर एक अपडेटेड नोट अदालत के समक्ष रखा जाएगा ताकि मामले में एक व्यापक आदेश पारित किया जा सके। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने 6 फरवरी को उत्तर प्रदेश में विधिक सेवा प्राधिकरण के अधिकारियों को निर्देश दिया था कि वे जिला और राज्य की जेलों से समय पूर्व रिहाई के पात्र दोषियों की जानकारी जुटाएं। राज्य सरकार से संबंधित प्रावधानों का सख्ती से पालन करने को भी कहा था। 

इस मामले में अगली सुनवाई 15 मई को होगी। सुनवाई के दौरान नालसा के वकील गौरव अग्रवाल ने पीठ को बताया कि शीर्ष अदालत के आदेश के अनुसार नालसा के सदस्य सचिव और राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी) के उप निदेशक ने विभिन्न बैठकें की हैं। नालसा के सदस्य सचिव ने ई-जेल पोर्टल में कई बदलावों का सुझाव दिया था, जिसे किया गया।

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elgar parishad - फोटो : For Refernce Only

एल्गार परिषद मामले में हुई शीर्ष कोर्ट में सुनवाई
 एल्गार परिषद मामले में गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान एल्गार परिषद-माओवादी संबंध मामले में गिरफ्तार सामाजिक कार्यकर्ता ज्योति जगताप की याचिका पर  जस्टिस अनिरुद्ध बोस और सुधांशु धूलिया की खंडपीठ ने ने महाराष्ट्र सरकार और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से जवाब मांगा। अदालत ने इस मामले को जुलाई के दूसरे सप्ताह में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है। 

गौरतलब है कि जगताप ने बॉम्बे हाईकोर्ट के 17 अक्टूबर, 2022 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। इसमें हाई कोर्ट ने यह कहते हुए उन्हें जमानत देने से इनकार कर दिया था कि उसके खिलाफ एनआईए का मामला प्रथम दृष्टया सच था। एनआईए ने कहा था कि वह प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) की एक बड़ी साजिश का हिस्सा थीं। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

तूत्तुकुडी से कनिमोई के निर्वाचन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज 
द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) की नेता कनिमोई को सुप्रीम कोर्ट से गुरुवार को बड़ी राहत मिली है। शीर्ष कोर्ट ने तमिलनाडु के तुत्तूकुडी लोकसभा क्षेत्र से 2019 में उनके निर्वाचन को बरकरार रखा है। सुप्रीम कोर्ट ने उनके निर्वाचन को चुनौती देने वाली एक याचिका में उनके खिलाफ लगाये गये आरोपों को अस्पष्ट बताते हुए खारिज कर दिया।

बता दें कि ए. सनातन कुमार नाम के एक मतदाता ने इस आधार पर कनिमोई के निर्वाचन को चुनौती दी थी कि उन्होंने परिवार की संपत्तियों का खुलासा करने वाले अपने चुनावी हलफनामे में अपने पति के पैन नंबर (स्थाई खाता संख्या) का विवरण नहीं दिया था।

कनिमोई ने 2019 के लोकसभा चुनाव में तूत्तुकुडी निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की उम्मीदवार तमिलिसाई सुंदरराजन के खिलाफ जीत दर्ज की थी। सुंदरराजन अब तेलंगाना की राज्यपाल हैं।

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भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय - फोटो : SOCIAL MEDIA

भाजपा नेता विजयवर्गीय और अन्य के खिलाफ FIR दर्ज करने का CJM का आदेश खारिज
महिला कार्यकर्ता से बलात्कार और आपराधिक धमकी समेत अन्य अपराधों के आरोपों के मामले में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय और दो अन्य को सुप्रीम कोर्ट से राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में पश्चिम बंगाल की मजिस्ट्रेटी अदालत के प्राथमिकी दर्ज करने संबंधी आदेश को खारिज कर दिया। 

जस्टिस एमआर शाह और संजीव खन्ना की पीठ ने आदेश दिया कि अलीपुर में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अपने 'न्यायिक विवेक' का इस्तेमाल करेंगे। वे प्राथमिकी दर्ज करने से पहले राज्य पुलिस को शिकायत पर जांच करने का निर्देश दे सकते हैं। शीर्ष अदालत ने अपने 63 पन्नों के फैसले में विजयवर्गीय और जिस्नू बसु और प्रदीप जोशी के खिलाफ महिला पार्टी कार्यकर्ता द्वारा लगाए गए आरोपों पर टिप्पणी करने से परहेज करते हुए कहा कि यह दोनों पक्षों द्वारा लगाए गए आरोपों को प्रभावित कर सकता है। 

पीठ ने मामले में फिर से निर्णय के लिए मजिस्ट्रेट अदालत में भेजते हुए कहा कि स्थानीय अदालत सीआरपीसी प्रावधानों का पालन करके शिकायत का संज्ञान ले सकती है। वह (सीजेएम) निर्धारित कानून के संदर्भ में पुलिस द्वारा प्रारंभिक जांच का निर्देश भी दे सकता है।

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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया

 शीर्ष कोर्ट ने तमिलनाडु से एक जून तक निर्णय लेने को कहा
सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से शीर्ष अदालत के 10 अप्रैल के उस निर्देश के अनुपालन के तहत एक जून तक उचित फैसला करने को कहा है, जिसमें उसने वेदांता समूह को स्थानीय स्तर की निगरानी समिति की देखरेख में तूतीकोरिन में अपनी स्टरलाइट कॉपर इकाई के रखरखाव की अनुमति दी थी।

शीर्ष अदालत ने 10 अप्रैल के अपने आदेश में संयंत्र में बचे हुए जिप्सम को बाहर निकालने और कंपनी के अनुरोध पर आवश्यक श्रमशक्ति उपलब्ध कराने की भी अनुमति दी थी। अदालत ने कहा था कि जिलाधिकारी ने संयंत्र परिसर में नागरिक और संरचनात्मक सुरक्षा संबंधी आकलन की समीक्षा करने, पुर्जों और उपकरणों को हटाने एवं उनकी ढुलाई और अन्य कच्चे माल के आकलन जैसी गतिविधियों की सिफारिश नहीं की थी।

पीठ ने कहा कि हम निर्देश देते हैं कि तमिलनाडु राज्य 10 अप्रैल, 2023 के आदेश के पैरा चार और पांच में निहित टिप्पणियों के पालन के लिए आवश्यक सभी निर्णय एक जून, 2023 को या उससे पहले करे। फिलहाल, शीर्ष कोर्ट ने मामले को सुनवाई और अंतिम निपटारे के लिए 22 अगस्त और 23 अगस्त के लिए सूचीबद्ध किया है। 

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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media

न्यायालय ने नगालैंड में माओ जनजाति के लोगों की आवाजाही से संबंधित याचिका का निस्तारण किया 
शीर्ष कोर्ट ने गुरुवार को दक्षिणी नगालैंड में राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या-2 के साथ माओ जनजाति के लोगों की आवाजाही की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए उचित कदम उठाने के लिए केंद्र, नागालैंड और मणिपुर राज्यों को निर्देश देने की मांग वाली याचिका निस्तारित कर दी।

 गुरुवार को सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पीठ को बताया कि गृह मंत्रालय ने राज्य सरकार के साथ बातचीत की थी। अब उनकी आवाजाही बाधित नहीं है। समस्या का समाधान कर लिया गया। 

इस पीठ में न्यायमूर्ति पी.एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला भी शामिल थे। मेहता ने पीठ को गृह मंत्रालय के निदेशक (पूर्वोत्तर प्रभाग) से प्राप्त निर्देशों के बारे में जानकारी दी। 

ईवीएम की कीमत पर सवाल उठाने वाली याचिका खारिज
सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार को ईवीएम की कीमत अधिक होने पर सवाल उठाने वाली याचिका को भी खारिज कर दिया। सीजेआई डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने इस तरह की याचिका पर विचार करने का कोई मतलब नहीं है। पीठ ने याचिकाकर्ता के वकील से कहा, कीमत अधिक है। चुनावों की लागत बहुत अधिक है लेकिन यह वह कीमत है जो आप लोकतंत्र के लिए चुकाते हैं। यह कहते हुए पीठ ने याचिका खारिज कर दी। 

‘द केरल स्टोरी’ पर रोक से इनकार, आज होगी रिलीज
सुप्रीम कोर्ट ने फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ की रिलीज पर रोक लगाने की मांग पर कोई आदेश पारित करने से इन्कार कर दिया। फिल्म पांच मई को रिलीज होने वाली है। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस जेबी पारदीवाला की पीठ ने बृहस्पतिवार को कहा कि निर्माता एक फिल्म बनाने में बहुत पैसा व समय लगाता है, अभिनेता भी श्रम करते हैं। बाजार तय करेगा कि यह सही है या नहीं। शीर्ष कोर्ट ने तीन दिनों में तीसरी बार इससे जुड़ी याचिका को खारिज किया है।

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