'अभिव्यक्ति की आजादी' पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई शुरू, पांच जजों की पीठ करेगी फैसला
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सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को संवेदनशील मामलों में अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर रोक लगाई जा सकती है या नहीं इसको लेकर सुनवाई शुरू हो गई। कोर्ट ने इस दौरान पूछा कि क्या अभिव्यक्ति के अधिकार को इस आधार पर छीना जा सकता है कि वह किसी के सम्मान को ठेस पहुंचा रहा है।
कोर्ट ने पूछा कि ऐसे संवेदनशील मामले जिनमें जांच चल रही हो, उन पर की गई बयानबाजी यदि किसी के सम्मान से जीने के अधिकार को प्रभावित करती है, तो क्या ऐसे में अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगाई जा सकती है?
जस्टिस अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले में कहा कि तीन जजों की बेंच की ओर से भेजे गए सभी सवालों पर पर विचार किया जाएगा। बता दें कि वर्ष 2016 के बुलंदशहर सामूहिक दुष्कर्म मामले को उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मंत्री आजम खान ने राजनीतिक साजिश बताया था।
इसी बयान का संज्ञान लेकर कोर्ट ने साल 2017 में मंत्रियों, अधिकारियों और जिम्मेदारी वाले पदों पर बैठे लोगों के गैर जिम्मेदाराना बयानों का मुद्दा संविधान पीठ को भेज दिया था। मामले पर विचार कर रही पांच जजों की पीठ में जस्टिस मिश्रा के अलावा जस्टिस इंदिरा बनर्जी, विनीत शरण, एमआर शाह और एस रवींद्र भट भी शामिल हैं।
यह हैं बड़े सवाल
1. क्या अभिव्यक्ति के अधिकार पर अनुच्छेद 19(2) को छोड़ कोई पाबंदी लगाई जा सकती है?
2. क्या उच्च पदों पर बैठे लोगों पर भी पाबंदी लगाई जा सकती है?
3. क्या सरकार संवैधानिक प्रावधानों के तहत कार्रवाई कर सकती है?
4. क्या कोई अनुच्छेद 21 के तहत मिला अधिकार किसी अन्य पर थोप सकता है?
संविधान पीठ इस मुद्दे पर भी विचार करेगी कि क्या किसी व्यक्ति या मंत्री जैसे सरकारी पदाधिकारी की अभिव्यक्ति की आजादी किसी केस में निष्पक्ष जांच के अधिकार को प्रभावित करती है।