हिंदी को लेकर विवाद का सिलसिला जारी, अब कुमारस्वामी ने उठाए सवाल
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योग और नैचरोपेथी को लेकर आयुष विभाग द्वारा आयोजित बैठक के बारे में विवाद जारी है। दक्षिण भारत के कुछ राजनेताओं ने आयुष मंत्रालय पर आरोप लगाया है कि हिंदी भाषा नहीं बोलने वालों के साथ पक्षपात किया जा रहा है। इस विवाद में अब कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और जनता दल सेक्युलर के नेता एचडी कुमारस्वामी भी कूद गए हैं। उन्होंने पूछा है कि कितने कन्नड़ियों को हिंदी न बोलने की वजह से बलिदान देना होगा?
उन्होंने एक ट्वीट में कहा, 'आयुष विभाग द्वारा आयोजित एक वर्चुअल ट्रेनिंग सत्र में सचिव राजेश कोटेचा ने कहा कि जिन्हें हिंदी नहीं आती वे जा सकते हैं। मैं अच्छी तरह से अंग्रेजी नहीं बोल सकता। क्या यह अंग्रेजी या हिंदी नहीं बोलने के अनुरोध को थोपना नहीं है? कितने कन्नड़ियों को हिंदी न बोलने की वजह से बलिदान देना होगा?'
In training hosted by AYUSH Dept, Secy Rajesh Kotecha, said,“Those who can't speak Hindi can quit." I don't speak English well. Is it a request to not speak English,or Hindi should be imposed?How many incl Kannadigas to sacrifice for not speaking Hindi?: HD Kumaraswamy in a tweet pic.twitter.com/koCppmA0B5
विज्ञापन विज्ञापन— ANI (@ANI) August 24, 2020
हालांकि, आयुष सचिव कोटेचा ने इन सभी आरोपों को खारिज करते हुए बेबुनियाद बताया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई विवाद हुआ ही नहीं है। आयुष मंत्रालय की ओर से किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं किया गया। उन्होंने बताया कि दरअसल बैठक में कुछ लोग बेवजह का हंगामा खड़ा कर रहे थे, जिन्हें म्यूट कर दिया। बाद में इस मुद्दे को भाषाई विवाद का रंग दे दिया गया।
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डीएमके ने की कार्रवाई की मांग, आयुष मंत्री को लिखा पत्र
विवाद के बढ़ने पर डीएमके प्रमुख एमके स्टालिन ने आरोप लगाया है कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार जबरन हिंदी भाषा थोपना चाहती है और इस घटना से उनका एजेंडा सामने आ गया है। जबकि पार्टी सांसद कनिमोझी ने इस संबंध में आयुष मंत्री श्रीपद नाइक को पत्र लिखकर मामले की जांच की मांग की है।
कनिमोझी ने ट्वीट किया, 'आयुष मंत्रालय के सचिव का मंत्रालय के ट्रेनिंग सत्र में हिंदी न बोलने वाले प्रतिभागियों को जाने के लिए कहना दिखाता है कि हिंदी को थोपा जा रहा है। यह बेहद निंदनीय है। सरकार को सचिव को निलंबित करना चाहिए। कब तक गैर हिंदी भाषी लोगों के खिलाफ ऐसा व्यवहार बर्दाश्त किया जाएगा?'