क्या सच में विदेश नीति को 'रीसेट' करने की नौबत आ गई है? विदेश मामलों के जानकार उठा रहे सवाल
- सुब्रमण्यम स्वामी ने उठाए पीएम मोदी की विदेश नीति पर सवाल
- नेपाल के नक्शा बदलने के दुस्साहस को बताया भारत की असफलता
- पूर्व विदेश सचिव शशांक, प्रोफेसर एसडी मुनि ने भी कहा है चिंताजनक
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विस्तार
2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दक्षेस के सदस्य सात पड़ोसी राष्ट्राध्यक्षों को आमंत्रित किया था। प्रधानमंत्री ने अपनी विदेश नीति में 'पड़ोसी पहले' की प्राथमिकता बताई थी।
यहां तक कि उन्होंने पहले कार्यकाल में नेपाल से रिश्ते पर काफी जोर दिया था, लेकिन भाजपा के राज्यसभा सदस्य सुब्रमण्यम स्वामी ने इसी विदेश नीति पर सवाल उठाया है। उन्होंने इसे पुनर्स्थापित किए जाने की जरूरत बताई है।
पूर्व विदेश सचिव शशांक का भी कहना है कि बिना समय गंवाए विदेश नीति पर फिर से सोच-विचार किया जाना चाहिए। शशांक का कहना है कि चीन, नेपाल का एपिसोड तो आंखें खोलने जैसा है। प्रो. एसडी मुनि का भी कहना है कि नेपाल और भारत के रिश्ते सही दिशा में नहीं जा रहे हैं।
केवल अमेरिका से रिश्ते रखकर क्या होगा?
शशांक का कहते हैं कि अमेरिकी ष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से हमारे गहरे रिश्ते हैं। चीन के साथ तनाव के दौरान भी इसे खूब प्रचारित किया गया, लेकिन अब सब मिट्टी में मिल गया। ट्रंप का बयान पढि़ए, लग रहा है कि उन्हें हकीकत का अहसास हो चला है।
इसलिए हमें इस नीति से बाहर आना चाहिए कि अमेरिका खुश है तो सब ठीक चलेगा। हमें ध्यान रखना चाहिए कि हम चीन, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश, म्यांमार, श्रीलंका, पाकिस्तान समेत अन्य पडो़सियों और विश्व के देशों के साथ रहना है।
पूर्व विदेश सचिव कहते हैं कि पाकिस्तान इस सच्चाई को काफी पहले समझ गया था। उसने अमेरिका से केवल हथियार और पैसे लेने पर ही भरोसा नहीं किया। अफगानिस्तान, चीन के साथ भी रिश्ते के महत्व को बनाए रखा।
शशांक का कहना है कि विदेश नीति को रीसेट किए जाने की जरूरत उन्हें काफी समय पहले से हो रही है। अब तो पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज जैसा सॉफ्ट कार्नर भी नहीं है।
कैसे हैं पड़ोसी देशों से भारत के रिश्ते?
अनुच्छेद 370 और नागरिकता संशोधन कानून लागू होने के बाद पड़ोसी देश बांग्लादेश के विदेश मंत्री ने विरोध स्वरूप अपना भारत का दौरा टाल दिया था। नेपाल ने अपनी संसद में नया नक्शा पास करके भारत के हिस्से को अपना बताया है।
पाकिस्तान के साथ जम्मू-कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर लगातार गोलीबारी, आतंकी घुसपैठ की स्थिति बनी हुई है। दोनों देशों के बीच में 25 अगस्त 2014 से विदेश सचिव स्तरीय वार्ता प्रक्रिया स्थगित है।
शांति प्रक्रिया को भी 2015 से बड़ा झटका लगा है। चीन ने 2017 में भूटान, भारत और चीन के ट्राइजंक्शन क्षेत्र डोकलाम में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा ली। इसे लेकर चीन और भारत के सैनिकों के बीच में 73 दिन तक टकराव जैसे गतिरोध की स्थिति बनी रही।
पांच मई 2020 से चीन के करीब 10-12 हजार सैनिक लद्दाख में गलवान नाला (नदी), पैंगोंग त्सो, फिंगर 4 इलाके में जम गए हैं। कुछ क्षेत्र से पीछे हटे हैं, लेकिन फिंगर 4 से आगे और फिंगर 8 तक भारतीय सेना को गश्त से रोक रहे हैं।
इस बार गतिरोध के तौर पर चीन के सैनिक भारी सैन्य वाहन लेकर आए हैं। उत्तराखंड के बाराहोती, लद्दाख, डोकलाम, सिक्किम से लेकर पूर्वी अरुणाचल की सीमा तक सैन्य दबाव बढ़ा रखा है।
इसके सामानांतर श्रीलंका, भूटान, अफगानिस्तान, सेशेल्स, मालदीव, म्यांमार से भारत के पहले की तरह थोड़ा-बहुत आगे-पीछे यथावत हैं। मालदीव में अब भारत के पक्ष में शांति, स्थिरता है। इन सबमें हालांकि म्यांमार थोड़ा नाराज चल रहा है।
क्या कहा है सुब्रामण्यम स्वामी ने
सुब्रमण्यम स्वामी ने सरकार सवाल पूछते हुए निदेश नीति पर सवाल उठाया है। उन्होंने ट्वीट करके केंद्र सरकार से पूछा है कि ऐसा क्या है जिसने नेपाल को ऐसा करने पर मजबूर किया?
If China, Nepal and Pakistan unite to grab more territory, and within India if the anti national seculars strike at the union government with violent demonstrations then let them all be assured that we nationalist will all unite sinking our differences and defeat them
स्वामी ने सवाल किया कि भारतीय इलाकों के बारे में नेपाल कैसे सोच सकता है? उनकी भावनाओं को इस कदर चोट कैसे पहुंची कि वे (नेपाल) भारत के साथ रिश्ते तोड़ना चाहते हैं।
क्या यह हमारी विफलता नहीं है? विदेश नीति को फिर से स्थापित किए जाने की जरूरत है।
सुब्रमण्मय स्वामी के सवाल पर शशांक कहते हैं कि नेपाल से भारत का सांस्कृतिक और पुराना रिश्ता है। रोटी-बेटी का संबंध है, लेकिन पूरी विदेश नीति में सोचने वाली बात है कि उसके लिए 5 मिनट से भी कम का समय होता है।
इसलिए मैं सुब्रमण्यम स्वामी की बात से सहमत हूं। उन्होंने कहा कि भारत-नेपाल रिश्ते पर रॉ के पूर्व अफसर ने किताब लिखी है। लोगों को पढ़नी चाहिए। अंत में बस इतना ही कि नेपाल जैसे पड़ोसियों से रिश्ते बिगाड़ना कोई अच्छा संकेत नहीं होता।
कैसे होगी विदेश नीति 'रीसेट'
शशांक ने कहा कि विदेश नीति को 'रीसेट' करना इतना आसान भी नहीं है। आखिर कैसे होगी? शशांक का कहना है कि यह एक जरूरी मांग है, लेकिन इसके लिए सरकार को ही कदम उठाना होगा।
उसे थिंक टैक की मदद लेनी होगी। हमें इसके बारे में सोचना पड़ेगा। यूपीए सरकार के समय के नेपाल मामलों पर समझ रखने वाले एक पूर्व विदेश सचिव ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि जो भी हो रहा है, बहुत कुछ अप्रत्याशित है।
घटनाक्रम से साफ है कि भारत न केवल अपनी स्थापित मान्यता खो रहा है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्वसनीयता, मजबूती दोनों को झटका लग रहा है।