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Tosham Seat: बंसीलाल परिवार के विरासत की लड़ाई में आमने-सामने भाई-बहन, ऐसा है तोशाम सीट का सियासी इतिहास

Wed, 11 Sep 2024 02:38 PM IST
Jaidev Singh जयदेव सिंह
Updated Wed, 11 Sep 2024 02:38 PM IST
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सार
हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी तोशाम सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…
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Tosham Assembly Election 2024 Constituency Profile Bansi Lal Family Political History Of Tosham Seat
Haryana Polls - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

हरियाणा विधानसभा का चुनावी रण सज चुका है। भाजपा और कांग्रेस जैसे दल उम्मीदवारों के नाम अंतिम करने में जुटे हैं। उधर जजपा, बसपा, इनेलो जैसे दल गठबंधन कर चुके हैं। तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी में भी गठबंधन की कोशिशें परवान नहीं चढ़ पाईं। सियासी दलों के बीच बनते बिगड़ते समीकरणों के बीच इस चुनाव में कुछ खास सीटों पर सबकी नजरें होंगी। इन सीटों में तोशाम विधानसभा सीट भी शामिल है। ये वही सीट है जहां से हरियाणा के दिग्गज नेता पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल का परिवार चुनाव लड़ता है। बंसीलाल खुद भी यहां से विधायक रहे थे। उनके परिवार से आने वाल किरण चौधरी पिछली बार इस सीट से चुनी गई थीं। किरण अब कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ चुकी हैं। भाजपा ने उन्हें राज्यसभा भेज दिया है। 


हमारी खास पेशकश ‘सीट का समीकरण’ में आज इसी तोशाम सीट की बात करेंगे। इसके चुनावी इतिहास की बात करेंगे। बात करेंगे यहां से जीते उम्मीदवारों की, पिछले चुनाव में इस सीट पर क्या हुआ था? इस बार कैसे समीकरण बन रहे हैं? ये भी जानेंगे…



पहले जान लेते हैं तोशाम सीट के बारे में 
1966 में हरियाणा राज्य के गठन के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव 1967 में हुआ। साल 1967 में जब हरियाणा का पहला विधानसभा चुनाव हुआ तब तोशाम विधानसभा सीट से बंसीलाल को जीत मिली। कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार के रूप में उतरे बंसीलाल ने संघटा सोशलिस्ट पार्टी के एम.आर.डी. राम को 5369 मतों से शिकस्त दी। 

हरियाणा में 1967 के बाद अगला विधानसभा चुनाव अगले ही साल यानी 1968 में हुआ। इस चुनाव में भी तोशाम में कांग्रेस की तरफ से उतरे बंसीलाल को जीत मिली। कांग्रेस उम्मीदवार ने संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के जंगबीर सिंह को कड़े मुकाबले में 1249 मतों हराया था। इसी चुनाव के बाद बंसीलाल ने हरियाणा के मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।

दो दिग्गजों की भिड़ंत 
अब आता है 1972 का हरियाणा विधानसभा चुनाव जब तोशाम में दो दिग्गजों की सियासी भिड़ंत हुई। एक तरफ कांग्रेस उम्मीदवार और तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल थे तो दूसरी तरफ निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उतरे कांग्रेस के ही पूर्व नेता देवीलाल थे। नतीजे आए तो बंसीलाल 20494 मतों से विजयी हुए। चौधरी देवी लाल को हार का सामना करना पड़ा। कहा जाता है कि इस हार के बाद चौधरी देवीलाल ने राजनीति से संन्यास तक का मन बना लिया था। हालांकि, बाद में वो उप-चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। 

 

साल 1977, आपातकाल के बाद हरियाणा में विधानसभा चुनाव होते हैं। इस चुनाव में तोशाम में मुकाबला दो निर्दलीय उम्मीदवारों के बीच हुआ। यहां सुंदर सिंह ने दूसरे निर्दलीय उम्मीदवार जंगबीर सिंह को 2174 मतों से शिकस्त दी। 1977 के इस चुनाव में बंसीलाल विधानसभा की जगह भिवानी से लोकसभा का चुनाव लड़े। लोकसभा चुनाव में उन्हें लोकदल की चंद्रवती ने शिकस्त दी थी।  

 

1982 में हुए चुनाव में भी तोशाम से कांग्रेस के उम्मीदवार सुरेंद्र सिंह को जीत मिली। सुरेंद्र सिंह ने लोक दल के टिकट पर उतरे ओम प्रकाश को 25,628 वोट से हराया। सुरेंद्र सिंह बंसीलाल के बेटे थे। बंसीलाल जब केंद्र की राजनीति में सक्रिय हुए तो उन्होंने अपनी विरासत बेटे सुरेंद्र को सौंप दी।  हालांकि, विधानसभा का कार्यकाल पूरा-पूरा होते बंसीलाल की हरियाणा प्रदेश की राजनीति में फिर से एंट्री हुई। जून 1986 में उन्होंने एक बार फिर राज्य के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली। उनके बेटे सुरेंद्र ने पिता के लिए सीट खाली की और उप-चुनाव में तोशाम से जीतकर बंसीलाल फिर से विधायक बने। पिता के लिए सीट खाली करने वाले सुरेंद्र राज्यसभा भेज दिए गए। चुनाव से एक साल पहले मुख्यमंत्री बदलने का दांव भी कांग्रेस के काम नहीं आया और 1987 के चुनाव में हार का सामना करना पड़ा। हार भी ऐसी की सत्ताधारी पार्टी महज पांच सीटों पर सिमट गई। 



1987 के इस विधानसभा चुनाव में तोशाम से भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा। तत्कालीन मुख्यमंत्री बंसीलाल अपनी सीट नहीं बचा सके। महज कुछ महीने पहले जीते बंसीलाल को लोक दल के प्रत्याशी धर्मबीर सिंह ने 2186 वोटों से हरा दिया। हालांकि मतगणना के दौरान हुई हिंसा की वजह से इस परिणाम को कोर्ट में चुनौती दी गई। बाद में यह चुनाव उच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया। इसके साथ शुरू हुआ धर्मबीर सिंह और बंसीलाल परिवार के बीच चुनावी अदावत का सिलसिला। विधानसभा से लेकर लोकसभा तक के चुनाव में धर्मबीर सिंह और बंसीलाल का परिवार आमने-सामने होते रहे। 1989 के लोकसभा चुनाव में एक बार फिर धर्मबीर और बंसीलाल के बीच मुकाबला हुआ। धर्मबीर जनता दल के टिकट पर पूर्व मुख्यमंत्री व कांग्रेस प्रत्याशी चौ. बंसीलाल के सामने थे। यहां धर्मबीर को एक लाख 57 हजार 330 वोटों से हार झेलनी पड़ी।

 

1991 का विधानसभा चुनाव आते-आते बंसीलाल और धर्मबीर दोनों के लिए बहुत कुछ बदल चुका था। बंसीलाल अपनी पार्टी बना चुके थे। पार्टी का नाम था हरियाणा विकास पार्टी। दूसरी तरफ सुरेंद्र सिंह जनता दल छोड़कर कांग्रेस में आ चुके थे। 1991 के विधानसभा चुनाव में तोशाम सीट पर हरियाणा विकास पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर उतरे बंसीलाल ने कांग्रेस उम्मीदवार धर्मबीर को 12765 मतों से हरा दिया। 1996 के विधानसभा चुनाव में तोशाम में एक बार फिर बंसीलाल को सफलता मिली। इस बार भी उन्होंने कांग्रेस के धर्मबीर को 12802 मतों से हरा दिया। 
 

1996 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2000 में हुए। एक बार फिर कांग्रेस के टिकट पर धर्मबीर मैदान में थे। उनके सामने हरियाणा विकास पार्टी की ओर से सुरेंद्र सिंह उतरे। सुरेंद्र यानी बंसीलाल के छोटे बेटे को इस चुनाव में शिकस्त मिली। ये वही सुरेंद्र हैं जिन्होंने 1986 में पिता के लिए तोशाम सीट खाली की थी। 2000 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के धर्मबीर ने हरियाणा विकास पार्टी के सुरेंदर सिंह को 20797 वोटों से शिकस्त दी।

किरण चौधरी
किरण चौधरी - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
बंसीलाल के परिवार की बहू किरण की तोशाम में एंट्री
2005 का विधानसभा चुनाव आते-आते तोशाम और बंसीलाल परिवार की राजनीति में फिर से बड़े बदलाव आ चुके थे। बंसीलाल की पार्टी हरियाणा विकास पार्टी का कांग्रेस में विलय हो चुका था। एक बार फिर तोशाम से बंसीलाल के बेटे सुरेंद्र सिंह को कांग्रेस ने टिकट दिया। वहीं, धर्मबीर को कांग्रेस ने बाढड़ा से टिकट दिया। धर्मबीर ने बाढड़ा से इनेलो उम्मीदवार रणबीर सिंह को 17,236 वोट से हराया और लगातार दूसरी बार विधानसभा पहुंचे। 2005 में तोशाम से जीते सुरेंद्र सिंह भूपेंद्र हुड्डा सरकार में कृषि मंत्री बने। सुरेंद्र सिंह को मंत्री बने महीने भर भी नहीं हुए थे कि 31 मार्च 2005 को एक हेलिकॉप्टर क्रैश में उनकी मौत हो गई। इस हादसे में हरियाणा सरकार के एक और मंत्री और मशहूर उद्योगपति ओपी जिंदल का भी निधन हो गया था। 

सुरेंद्र सिंह के निधन के बाद तोशाम सीट पर एक बार फिर उप-चुनाव हुआ। इस उपचुनाव में सुरेंद्र सिंह की पत्नी किरण चौधरी यहां से जीतकर विधानसभा पहुंचीं।  

2005 के बाद हरियाणा में अगले विधानसभा चुनाव 2009 में हुए। इस चुनाव में कांग्रेस की तरफ से किरण चौधरी को एक बार फिर टिकट दिया गया। इनेलो ने कर्नल गजराज सिंह को चुनाव मैदान में उतरा। 2009 में कांग्रेस उम्मीदवार किरण को 46107 मतों से एक बड़ी जीत मिली। 

इसके बाद 2014 में तोशाम की सियासी लड़ाई एक बार फिर किरण चौधरी के नाम रही। कांग्रेस के टिकट पर उतरीं किरण ने इनेलो प्रत्याशी कमला रानी को 19741 मतों के अंतर से शिकस्त दी। 2019 के विधानसभा चुनाव में तोशाम का मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच हुआ। कांग्रेस ने किरण चौधरी को तो भाजपा ने शशि रंजन परमार को तोशाम सीट से उम्मीदवार बनाया। इस चुनाव में किरण ने शशि रंजन को 18059 वोटों के अंतर से परास्त कर दिया। कांग्रेस प्रत्याशी को 72699 जबकि भाजपा प्रत्याशी को 54640 वोट मिले।

इस बार कौन आमने-सामने?
अब बात 2024 के चुनाव की कर लेते हैं। हरियाणा की तोशाम सीट पर मुकाबला दिलचस्प हो गया है। पिछली बार की विधायक किरण चौधरी कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गई हैं। हाल ही में किरण हरियाणा से भाजपा की राज्यसभा के लिए निर्विरोध निर्वाचित हुई हैं। 
 

भाजपा से श्रुति चौधरी तो कांग्रेस से उनके चचेरे भाई अनिरुद्ध चौधरी को टिकट मिला है।
भाजपा से श्रुति चौधरी तो कांग्रेस से उनके चचेरे भाई अनिरुद्ध चौधरी को टिकट मिला है। - फोटो : संवाद
किरण के राज्यसभा में जाने के बाद उनकी बेटी और पूर्व सांसद श्रुति चौधरी पहली बार तोशाम से विधानसभा चुनाव में उतार दिया है। भिवानी-महेंद्रगढ़ लोकसभा क्षेत्र से पूर्व सांसद श्रुति चौधरी ने एक निजी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा, 'मैं तोशाम से चुनाव लड़ना चाहती हूं। मैं पूर्व मुख्यमंत्री चौधरी बंसीलाल की सोच को आगे लेकर जाना चाहती हूं। लोगों को काम करना मेरा मकसद है।'

वहीं, कांग्रेस ने अनिरुद्ध चौधरी को टिकट दिया है। अनिरुद्ध चौधरी का ये पहला चुनाव होगा। अनिरुद्ध भी बंसीलाल के पोते हैं। अनिरुद्ध के पिता रणबीर महेंद्रा बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष रह चुके हैं। यानी, चचेरे भाई-बहन इस चुनाव में आमने-सामने होंगे। हालांकि यह पहला मौका नहीं होगा जब बंसीलाल परिवार के दो सदस्य आमने-सामने हैं। इससे पहले भी बंसीलाल परिवार के दो सदस्य चुनावी अखाड़े में आमने-सामने आ चुके हैं। ।

दरअसल, बात 1998 के लोकसभा चुनाव की है। बंसीलाल और उनके छोटे बेटे सुरेंद्र सिंह हरियाणा विकास पार्टी चला रहे थे। जबकि, बंसीलाल के बड़े बेटे रणबीर महेंद्रा उस वक्त भी कांग्रेस में थे। 1998 के लोकसभा चुनाव के दौरान भिवानी लोकसभा सीट से सुरेंद्र सिंह हरियाणा विकास पार्टी के टिकट पर मैदान में उतरे। कांग्रेस ने उनके बड़े भाई रणबीर महेंद्रा को भिवानी सीट से टिकट दे दिया। आमने-सामने की लड़ाई में जीत सुरेंद्र सिंह को मिली थी। रणबीर महेंद्रा तीसरे स्थान पर खिसक गए। जबकि, देवीलाल के पोते अजय सिंह चौटाला इस चुनाव में दूसरे नंबर पर रहे थे
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