Gyanvapi Case: ज्ञानवापी सर्वे से मथुरा के हिंदुओं को उम्मीद, जल्द स्वतंत्र होगी कृष्ण की जन्मभूमि
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विस्तार
ज्ञानवापी में हो रहे सर्वे पर सर्वोच्च न्यायालय ने दो दिनों के लिए रोक लगा दी है, जिससे सर्वे को लेकर मुस्लिम पक्ष इलाहाबाद की उच्च न्यायालय में अपनी बात रख सके। इस प्रकरण के बीच मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही ईदगाह विवाद भी चर्चा में आ गया है। हिंदू पक्ष को उम्मीद है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय मथुरा में विवादित स्थल का सर्वे कराने की अनुमति देगा, जिससे 350 वर्ष पुराने इस विवाद का अंत हो सके।
क्या है विवाद?
मथुरा में श्रीकृष्ण के जन्म स्थान और शाही ईदगाह को मिलाकर कुल 13.7 एकड़ की भूमि है। 11 एकड़ से अधिक भूमि पर श्रीकृष्ण का मंदिर बना हुआ है, जो हिंदुओं के अधिकार में है। शाही ईदगाह दो एकड़ भूमि पर बनी हुई है, जिस पर यह पूरा विवाद है। मुस्लिम पक्ष इस पर अपना दावा करता है। लेकिन हिंदू पक्ष का दावा है कि भगवान कृष्ण की जन्मभूमि का असली गर्भगृह शाही ईदगाह की जमीन पर ही है। वह उसे अपना बताते हुए उसे पाने के लिए प्रयासरत है।
दूसरे स्थान पर भूमि देने को तैयार है हिंदू पक्ष
मथुरा मंदिर मामले के पक्षकार और श्रीकृष्ण जन्मभूमि संघर्ष न्यास के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिनेश शर्मा ने अमर उजाला को बताया कि कई एतिहासिक दस्तावेजों से यह बात सिद्ध होती है कि शाही ईदगाह का निर्माण हिंदू मंदिर को नष्ट करके बनाया गया था। हम सबसे पहले इस स्थल का सर्वे कराना चाहते हैं, जिससे यह सिद्ध किया जा सके कि इस भूमि का असली दावेदार कौन है? यदि पहले सर्वे हो जाता है, तो अदालत में समय बचेगा और जल्द से जल्द सच सामने आ सकेगा।
दिनेश शर्मा ने आरोप लगाया कि मुस्लिम पक्ष सर्वे पर रोक लगाने के लिए इलाहाबाद उच्च न्यायालय से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक में प्रयास कर रहा है। उसकी पूरी कोशिश सर्वे को रुकवाकर सच को सामने आने से रोकना है, जिससे मामले को विवादित बनाए रखा जा सके। लेकिन 350 वर्षों की प्रतीक्षा का अब अंत होना चाहिए और वैज्ञानिक शोधों के आधार पर यह सच सामने लाना चाहिए कि यह भूमि किसकी है। उन्होंने कहा कि जिस तरह अदालती आदेश के बाद ज्ञानवापी में सर्वे शुरू हुआ है, उन्हें उम्मीद है कि जल्द से जल्द मथुरा में भी सर्वे शुरू हो सकेगा।
उन्होंने कहा कि विवादित दो एकड़ भूमि के बदले वे मुस्लिम बहुल मेवात के इलाके में 10 एकड़ भूमि मुस्लिम पक्ष को देने के लिए तैयार हैं। इससे मुस्लिमों की धार्मिक आस्थाएं बनी रहेंगी और हिंदुओं को भी किसी तरह की परेशानी नहीं होगी।
उपासना स्थल कानून 1991 लागू नहीं
पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के समय बने प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 (उपासना स्थल कानून 1991) में यह बात कही गई थी कि 15 अगस्त 1947 से पूर्व बने सभी धार्मिक स्थलों को उसी स्वरूप में बरकरार रखा जाएगा। किसी धार्मिक स्थल को बदलकर किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जाएगा। लेकिन कहा जा रहा है कि चूंकि, मथुरा में अतिक्रमण करके ईदगाह बनाया गया है, इसलिए इस मामले में उपासना स्थल कानून 1991 लागू नहीं होगा।
मुस्लिम पक्ष ने कहा, बरकरार रहे दावा
मथुरा की शाही ईदगाह कमेटी के वकील तनवीर अहमद ने अमर उजाला से कहा कि इस स्थान पर हिंदू-मुस्लिम पक्ष में कभी कोई विवाद नहीं रहा है। बाहरी लोगों ने आकर यहां विवाद बढ़ाया है और मुकदमेबाजी शुरू हुई है। मुस्लिम पक्ष चाहता है कि यथास्थिति बनी रहे और हिंदू-मुस्लिम दोनों पक्ष अपने-अपने धार्मिक स्थलों में पूजा करते रहें।
उन्होंने कहा कि 1968 में हिंदू पक्ष के साथ एक समझौता हुआ था, जिसमें दोनों पक्षों को अपनी-अपनी भूमि पर अधिकार और पूजा करने की स्वतंत्रता बरकरार रखने की बात कही गई थी। इस समझौ पर वे आज भी कायम हैं। लेकिन हिंदू पक्ष इस समझौते को यह कहते हुए अस्वीकार करता है कि जिस 'श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान' से यह समझौता किया गया था, वह जन्मभूमि का मालिक नहीं है। ऐसे में उसे हिंदुओं की ओर से समझौता करने का कोई अधिकार नहीं है।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय में है मामला
मथुरा की सिविल अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए दिसंबर 2022 में विवादित स्थल का सर्वे कराने का आदेश दे दिया था। मुस्लिम पक्ष ने इसे रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील लगाई है। अदालत ने संबंधित पक्षों से तीन सप्ताह में रिपोर्ट मांगी है। वहीं, हिंदू पक्ष भी इलाहाबाद हाई कोर्ट में विवादित स्थल पर शीघ्र सर्वे कराने का आदेश पाने के लिए अपील दाखिल कर चुका है।