सुल्तानपुर ग्राउंड रिपोर्ट: तीन माह में एक बार राशन... किसी को दाल, किसी को गेहूं
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मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद पाप धोने के लिए भगवान श्रीराम सुल्तानपुर में आदिगंगा गोमती के तट पर स्नान किया। उस स्थान को आज भी धोपाप के नाम से जाना जाता है। पाप धोने पुण्य लाभ अर्जित करने के लिए आज भी दशहरा पर यहां लोग दूर-दूर से स्नान करने आते हैं। दान करते हैं चले जाते हैं, लेकिन देश के भविष्य नौनिहालों और उनकी मां में खून की कमी और कुपोषण की स्थिति में सुधार करने की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।
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मान्यता है कि रावण का वध करने के बाद पाप धोने के लिए भगवान श्रीराम सुल्तानपुर में आदिगंगा गोमती के तट पर स्नान किया। उस स्थान को आज भी धोपाप के नाम से जाना जाता है। पाप धोने पुण्य लाभ अर्जित करने के लिए आज भी दशहरा पर यहां लोग दूर-दूर से स्नान करने आते हैं। दान करते हैं चले जाते हैं, लेकिन देश के भविष्य नौनिहालों और उनकी मां में खून की कमी और कुपोषण की स्थिति में सुधार करने की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता।
सरकारी मशीनरी के प्रयास भी कागजी साबित हो रहे हैं। पिछले तीन महीने से वही पुराने आंकड़े ऊपर-नीचे किए जा रहे हैं। लंभुआ तहसील के धोपाप गांव के खटिकान मुहल्ले में पहुंचने पर पता चला कि पहले पोषाहार कुछ हद तक मिल जाता था, लेकिन पिछले तीन महीने में सिर्फ एक बार राशन बंटा है। किसी को दाल मिली है, तो किसी को गेहूं या चावल। गांव में पहले और वर्तमान में भी ज्यादातर महिलाओं की शादी कम उम्र हुई है और उनके बच्चे भी एक साल में दो-दो पैदा हो गए। 45 फीसदी मां और बच्चा दोनों एनिमिक हैं।
छह साल में चार बेटियां पैदा हुईं, सभी कुपोषित सांसद मेनका गांधी के संसदीय क्षेत्र के गांव अहिरौली में दीपक की चार बेटियां हैं, सभी कुपोषित हैं। उनकी 15 साल पहले शादी हुई थी, उस समय दोनों की उम्र नाबालिग थी। दीपक के घर पहुंचने पर पता चला कि पत्नी माधुरी बच्चों के साथ मायके गई हैं। फोन से बात करने पर बताया कि छह साल में उनके चार बेटियां पैदा हुईं, सभी कुपोषित थीं। सबसे छोटी बेटी एक साल की है, लेकिन अभी वह चल नहीं पाती है। माधुरी को यह भी नहीं पता कि बेटियां कुपोषित थीं। पड़ोसियों ने माधुरी को बताया था कि कुछ बच्चे देर से चलते हैं, इसलिए ध्यान नहीं दिया। आंगनबाड़ी वाली दीदी ने वजन करने के बाद बताया कि बच्चियां कुपोषित हैं। जो पोषाहार देती थीं, उससे ठीक हो गए।
पोषण मिला तो स्वस्थ हुआ बच्चा
गीतकार व कवि मजरूह सुल्तानपुरी के क्षेत्र सदर निवासी ऐश्वर्या ने बताया कि उनका बच्चा जन्म के समय रोया नहीं था, लेकिन इस तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। बाद में तीन महीने के बाद बच्चे का पेट निकलने पर डाक्टर के पास ले गई तो डॉक्टर ने बताया कि बच्चा कुपोषित है, इसे पोषण पुनर्वास केंद्र पर भर्ती करा दो। इसके बाद बच्चे का तीन महीने तक इलाज चला, अब वह पूरी तरह से स्वस्थ है।
बच्चा कुपोषित है नहीं जान पाते
दिसंबर में नहीं भर्ती हुआ एक भी बच्चा
अमर उजाला की टीम जिला अस्पताल में संचालति एनआरसी पहुंची तो वहां एक भी बच्चा भर्ती नहीं था। केंद्र पर दस बच्चों को भर्ती करने की सुविधा है। मौके पर केंद्र की न्यूट्रीशियनिस्ट मनजीत महिलाओं से फोन पर बात करते हुए मिलीं। उन्होंने बताया कि जो बच्चे स्वस्थ हुए हैं, उनकी मां को दिए जाने वाले पैसे देने के लिए बुला रही हूं। कोरोना और अधिक सर्दी की वजह से एक भी बच्चा दिसंबर में भर्ती होने के लिए नहीं आया है।
केंद्र पर न बच्चे आते हैं न ही आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सुल्तानपुर से 28 किमी दूर लंभुआ ब्लॉक के दुबौली स्थित प्राथमिक विद्यालय में पहुंचने पर दो महिला शिक्षिका एवं मिड-डे-मील बनाने वाली दो महिला रसोइयां मौजूद थीं। पूछने पर बताया गया कि बच्चे नहीं आते हैं, इसलिए आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कभी-कभी स्कूल आती हैं। पास में ही स्थित जूनियर हाईस्कूल के शिक्षक राकेश यादव ने कार्यकत्री सुधा श्रीवास को फोन किया तो वह पंद्रह मिनट बाद स्कूल पहुंची। उन्होंने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्र तीन बार लगातार आदर्श केंद्र घोषित किया गया था, मौजूदा समय में आदर्श है या नहीं इसकी जानकारी नहीं है।
पंजीरी बंद होने से हो रही परेशानी
रुकवाई गई नाबालिग शादियां
सुनहरा बचपन एनजीओ के संचालक मोहम्मद इलियास ने बताया कि अभी भी ज्यादातर लोगों में मान्यता है कि बेटी पराया धन है, उसकी जितनी जल्दी शादी कर दो, अपने ससुराल जाए। इस चक्कर में लोग जल्दी शादी कर देते हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस की मदद से मार्च से लेकर अब तक नौ शादियां अलग-अलग क्षेत्रों में रुकवाई गईं। इलियास की मानें तो तीन शादियां ऐसी तय हुई थीं, जिनमें लड़का भी नाबालिग था।
29689 बच्चे कुपोषित
मौजूदा समय में 29,689 बच्चे कुपोषण की जद में हैं। इनमें से 23,419 बच्चे ऐसे हैं जो कुपोषित यानी यलो जोन में शमिल हैं। 6,270 बच्चे अतिकुपोषित की श्रेणी में शमिल हैं। नवंबर महीने में दो लाख 23 हजार से अधिक बच्चों का जिले में वजन किया गया। अगर आंकड़ों पर गौर किया जाए तो स्थिति संतोषजनक है, लेकिन इसके साथ ही सवालिया निशान भी खड़ा होता है कि बच्चों का स्कूल आना बंद है। अधिकांश आंगनबाड़ी ऐसी हैं जो दलित एवं मलिन बस्तियों में बच्चों का वजन जानने के लिए अपनी तौहीन समझती हैं। ऐसे में करीब ढाई लाख बच्चों का वजन किया जाना अपने आप में सवाल है।
डीपीओ अजय सिंह का कहना है कि 'जिले में 2,511 आंगनबाड़ी केंद्रों पर दो लाख 84 हजार बच्चे पंजीकृत थे। इनमें तकरीबन 39 हजार मासूम कुपोषण की जद में थे। उसमें 31 हजार 953 कुपोषित तो 7020 बच्चे अति कुपोषित थे जो नवंबर महीने तक कम हुए हैं। सभी सीडीपीओ को नोटिस भेजकर एनआरसी पर बच्चों को भर्ती कराने के निर्देश दिए गए हैं।'
बाल रोग विशेषज्ञ, डॉ. राम अवध यादव ने बताया कि 'ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं या उनके बच्चे इलाज के लिए तब आते हैं, जब उनकी हालत गंभीर हो जाती है। उस स्थिति में बच्चों और महिलाओं में चार से पांच ग्राम हीमोग्लोबिन पहुंच जाता है। मां-बच्चे दोनों कुपोषण की स्थिति में होते हैं।'