ग्राउंड रिपोर्ट बाराबंकी: जिन बच्चों की हुई फिक्र उनकी जिंदगी खिलखिला उठी
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर है जिला बाराबंकी। मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर आगे बहराइच रोड पर मसौली गांव है। यहां रहने वाले इलियास का 14 महीने का बेटा अब्दुल रहमान जब पैदा हुआ तो उसका वजन दो किलोग्राम था। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रायमा बानो उनके संपर्क में थी। दावा है कि रायमा और परिवार के प्रयासों से अब्दुल रहमान 14 महीने में 7.4 किलोग्राम हो गया है।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
राजधानी लखनऊ से 30 किलोमीटर दूर है जिला बाराबंकी। मुख्यालय से लगभग 15 किलोमीटर आगे बहराइच रोड पर मसौली गांव है। यहां रहने वाले इलियास का 14 महीने का बेटा अब्दुल रहमान जब पैदा हुआ तो उसका वजन दो किलोग्राम था। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता रायमा बानो उनके संपर्क में थी। दावा है कि रायमा और परिवार के प्रयासों से अब्दुल रहमान 14 महीने में 7.4 किलोग्राम हो गया है।
इसी गांव की निवासी रन्नो हैं। पांच महीने पहले उन्होंने जुड़वां बेटी-बेटे को जन्म दिया। बिटिया जन्म के समय 1.75 किलोग्राम की थी। जबकि बेटा मात्र 1.9 किलोग्राम का। जन्म से ही कम वजन होने के कारण दोनों को खास देखभाल की जरूरत थी, लेकिन दोनों को ही उनके मां-बाप सरकारी अस्पताल नहीं लेकर गए। कुछ दिन पहले बेटे को बुखार आया और अचानक उसकी मौत हो गई।
रन्नों के जुड़वां बच्चों से पहले तीन बच्चे और हैं। इनमें बेटा शाहिद 15 साल, बेटी नाजिया 13 साल और जाहिद आठ साल का है। चेहरा देखने पर सभी में खून की कमी नजर आती है। 13 साल की नाजिया की तो आंखे पीली हो रही हैं। लेकिन जागरूकता की कमी और दकियानूसी विचारधारा के कारण इलाज नहीं करा रहे। अब्दुल रहमान की तरह ही दो बच्चे और मिले जो जन्म से कुपोषित थे, लेकिन उनके माता-पिता उन्हें कभी सरकारी अस्पताल नहीं ले गए। न ही उन्हें कभी भी पोषण पुनर्वास केंद्र ले जाया गया।
अस्पताल में भर्ती करते तो घर कौन देखता
जयकरनपुर बहरौली गांव को 2012-13 में तत्कालीन डीएम ने गोद लिया था। गलियों में आरसीसी रोड है। सोलर स्ट्रीट लाइट भी हैं। इज्जत घर भी हैं, लेकिन उनकी दशा दयनीय है। यहां कार्य करने वाली आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के अनुसार गांव में पांच कुपोषित बच्चे हैं।
शटरिंग का कार्य करने वाले आलमगीर का तीसरा बेटा डेढ़ साल का मो. शारिफ है। घर पर मां मैमुननिशां मिली। गोद में शारिफ को लेकर बाहर निकलती है। देखने में ही उसका वजन कम लगता है। लेकिन इससे मैमुननिशां को कोई फर्क नहीं पड़ता। बताती है कुछ दिन पहले आंगनबाड़ी केंद्र में ही बच्चे का वजन हुआ था। बताया गया कि वजन कुछ कम है। इसके बाद ढाई किलो गेहूं और एक किलो चावल दिया गया। लॉकडाउन के दौरान तीन पैकेट दलिया मिली थी। कुछ बच्चों ने खाई, जो बची वो जानवरों को डाल दी गई।
बच्चों को लुभाने वाली सुविधाएं लेकिन बच्चे ही नहीं
वहां काउंसलर मंजू सिंह और कुक शालिनी श्रीवास्तव भी थी। शालिनी ने बताया कि कोरोना के कारण बच्चे नहीं आ रहे थे। सात दिसंबर को नटबस्ती से आई शैयदा नाम की बच्ची को भर्ती किया था। 13 दिन भर्ती रखने के बाद उसे डिस्चार्ज कर दिया गया। शैयदा जब भर्ती हुई थी, तब उसका वजन 5.7 किलोग्राम था। डिस्चार्ज के समय वह 7.3 किलोग्राम की हो गई थी।
इसी तरह फतेहपुर ब्लॉक से 10 माह के शिवम को अस्पताल की इमरजेंसी में लाया गया था। उसका भी वजन 5.6 किलोग्राम था। इमरजेंसी से उसे पोषण पुनर्वास केंद्र लाया गया जहां छह दिन रहने के बाद शिवम का वजन 5.85 किलोग्राम हो गया था। लेकिन निमोनिया ठीक न होने के कारण उसे केजीएमयू के लिए रेफर कर दिया गया।
आठ परिवार एनआरसी से बच्चों को बिना बताए ले गए
जिला अस्पताल के सीएमएस डॉ.एसके सिंह का कहना है कि 'कोरोना के कारण बच्चों की भर्ती बंदकर दी गई थी। अब एक बार फिर भर्ती की शुुरुआत हुई है। 14 दिन तक बच्चों को गाइडलाइन के अनुसार भर्ती किया जाता है। बच्चे के साथ रहने वाली उसकी मां के लिए खाने की व्यवस्था की जाती है। डिस्चार्ज के बाद 50 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से मां के खाते में भुगतान किया जाता है। बच्चों को चार बार फॉलोअप के लिए भी बुलाया जाता है।'
आंकड़े एक नजर में
कुल बच्चे जिनका वजन और लंबाई नापी गई- 8,781
अतिकुपोषित बच्चे -330
कुपोषित बच्चे -991