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कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2018: भटकल के हिंदू भी चाहते हैं बदनामी से छुटकारा

Sun, 08 Apr 2018 03:58 PM IST
बीबीसी, हिन्दी
बीबीसी, हिन्दी Updated Sun, 08 Apr 2018 03:58 PM IST
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Ground Report: Hindus of Bhatkal want to get rid of defamation
भारत के पश्चिमी घाट पर स्थित तटवर्तीय कर्नाटक का भटकल क़स्बा जो चरमपंथ की 'फ़ैक्ट्री' के रूप में कुख़्यात रहा है। इंडियन मुजाहिदीन बनाने वाले यासीन भटकल यहीं से ताल्लुक रखते हैं। इंडियन मुजाहिदीन पर देश के विभिन्न हिस्सों में धमाके करने का आरोप है और यासीन भटकल फ़िलहाल जेल में हैं। भटकल क़स्बे की बदनामी की वजह से ही यहां के बाशिंदों को शक़ की निगाह से देखा जाने लगा।
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विश्व हिंदू परिषद् का आरोप है कि एक तरफ केरल का कासरगोड और दूसरी तरफ कर्नाटक का भटकल, जहां से चरमपंथी गतिविधियां संचालित होती हैं। मगर क़स्बे के बुज़ुर्ग इस बात को चुनौती देते हैं। समाज के वयोवृद्ध हनीफ़ शोबाब कहते हैं कि जब लोग भटकल से कहीं जाते हैं तो अपनी पहचान छुपाने की कोशिश करते हैं।
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उनका कहना है, "एक तो मुसलमान और उसपर से भटकल का रहने वाला। बस फिर क्या? परेशानियां शुरू। सब कहते हैं कि भटकल चरमपंथ की फ़ैक्ट्री है। ये टैग लग गया है हमारे ऊपर।" शोबाब कहते हैं कि यासीन भटकल और रशीद भटकल ने जो कुछ भी किया उसका भटकल के रहने वालों से कोई लेना-देना नहीं है।
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वो कहते हैं, "अदालत है। क़ानून है। जो कुछ उसने किया अगर सच है तो अदालत उसे सज़ा देगी। मगर हमें उसके साथ क्यों जोड़ते हो। हम न तो यासीन और राशिद भटकल जैसों को बढ़ावा देते हैं और ना ही संरक्षण। उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए।"

सिर्फ़ यासीन, राशिद और इक़बाल भटकल नहीं। यहां पैदा होने वाले अनवर हुसैन भटकल के बारे में सुरक्षा एजेंसियां कहती हैं कि वो अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान से जा मिला था। बाद में सुरक्षा बलों ने उसे मार गिराया था।

ईरानी मुसलमान

Ground Report: Hindus of Bhatkal want to get rid of defamation
स्थानीय इतिहासकारों का कहना है कि यहां सबसे पहले ईरान से नवायथ मुसलमान आकर बसे थे जो व्यवसायी थे। उनके पास ख़ूब पैसा हुआ करता था। नवायथ मुसलमान भटकल से लेकर कराची तक पाए जाते हैं। भटकल में नवायथ मुसलामानों की आबादी 70 प्रतिशत बतायी जाती है जबकि यहां रहने वाले दूसरे मुसलामानों को दखनी मुसलमान कहा जाता है।

भटकल के मुसलमान कन्नड़ की बजाय कोंकणी भाषा में बातचीत करते हैं। चूंकि यहां बड़ी-बड़ी इस्लामिक संस्थाएं खुल गई हैं इसलिए यहां के मुसलमान हिंदी और उर्दू के भी जानकार हैं।

मगर पिछले दो दशकों से यहां के मुसलमान ख़ुद को शक़ के कटघरे में खड़ा पाते हैं। उनकी संस्थाओं पर भी शक़ की सुई घूमती रहती है और उनके पारिवारिक जीवन पर भी, क्योंकि इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने पकिस्तान के कराची में अपनी नवायथ बिरादरी में ही शादी-ब्याह किए हैं और वहां से ये दुल्हनें भारत लेकर आये हैं।

भटकल की कई चीजें हैं मशहूर

Ground Report: Hindus of Bhatkal want to get rid of defamation
वरिष्ठ चिकित्सक वेंकटेश रमेश सराफ़
मोहिमीन इंजिनीरिंग के छात्र हैं और भटकल के रहने वाले हैं। मुख्य बाज़ार के पास मस्जिद से निकलते हुए उनसे मुलाक़ात हुई। मोहिमीन कहते हैं कि जब वो पढ़ाई के सिलसिले में बाहर जाते हैं और जब ख़ुद को भटकल का बताते हैं तो लोगों का रवैया बदल जाता है।

यहीं के रहने वाले मुब्बशिर बताते हैं कि कभी भटकल की अलग पहचान हुआ करती थी। यहां की बिरयानी, हलवा और स्थानीय भाषा में जिसे मलगी फूल यानी जैस्मीन का फूल (जिसे औरतें बालों में लगाती हैं) बहुत मशहूर हुआ करते थे।

ऐसा नहीं है कि भटकल में सिर्फ़ मुसलामानों की आबादी है। यहां बड़ी तादाद हिन्दुओं की भी है। और इन्हीं में से एक हैं वरिष्ठ चिकित्सक वेंकटेश रमेश सराफ़ जो भटकल में ही पैदा हुए हैं।

आंखों देखी

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प्रिंसिपल एन नरसिंह मूर्ति
वो 1993 में हुए दंगे को याद कर सिहर उठते हैं। उन दिनों नौ दिन तक भटकल में कर्फ़्यू लगा रहा था। डॉक्टर सराफ़ ने बताया कि उस दौरान जब वो किसी बीमार के इलाज के लिए जा रहे थे, तो उन्हें पुलिस की लाठियां खानी पड़ी थीं।

डॉक्टर सराफ़ कहते हैं कि उन्हें मुसलमान समुदाय के लोगों से ज़्यादा सम्मान मिलता है। वो अपनी टेबल पर रखे मोबाइल फ़ोन को दिखाते हुए कहते हैं कि वो उन्हें किसी मुसलमान मरीज़ ने दिया था। सराफ़ का कहना है कि भटकल की एक ऐसी छवि बना दी गई है जिससे लोग यहां आने से डरते हैं। वो कहते हैं कि यह छवि मीडिया ने बनायी है।

हिंदू-मुसलमानों के रिश्ते

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सराफ़ का कहना था, "शुरू-शुरू में तो सरकारी कर्मचारी और अधिकारी भी यहां पोस्टिंग करवाने से डरते हैं। बाद में सिर्फ़ कुछ ही महीनों के अंदर उनको भटकल की आब-ओ हवा इतनी पसंद आती है कि रिटायर होने के बाद वो यहीं मकान बनाकर रहना चाहते हैं।"

डॉक्टर सराफ़ का दावा है कि भटकल के बारे में जो देश के लोगों की राय है वो ग़लत है। उनका यह भी दावा है कि जितना हिंदू और मुसलामानों के बीच बेहतर संबंध भटकल में है, वो शायद दूसरी जगहों पर नहीं।

डॉक्टर सराफ़ की तरह ही यहां के टीचर्स ट्रेनिंग कॉलेज के प्रिंसिपल एन नरसिंह मूर्ति भी हैं जो सिर्फ़ 6 सालों पहले ही भटकल आकर बसे हैं।

वो भी कहते हैं कि जब वो भटकल आ रहे थे तो परिवार के लोगों ने उन्हें मना किया था। मगर अब उन्हें यह जगह बहुत पसंद है। वो कहते हैं कि आज भी यहां के समाज में ऐसी रस्मे हैं जिन्हें हिंदू और मुसलमान मिलकर मनाते हैं। जैसे रथ-यात्रा। जो मुसलमानों के इलाक़े से शुरू होती है और इसे हिन्दू भी मनाते हैं।

भटकल में 1993 में दंगा हुआ था मगर उसके बाद आज तक यहां के समुदायों के बीच भाईचारा ही रहा है। भटकल के मुसलमान हों या हिंदू हर कोई अपने कस्बे की बदनामी से छुटकारा चाहता है।
 
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