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नक्सलवाद: अबूझमाड़ में नक्सली ठिकानों को ध्वस्त करने की तैयारी, खात्मे के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण

Mon, 01 Jan 2024 05:55 AM IST
गुलाम अहमद एजेंसी, नई दिल्ली
एजेंसी, नई दिल्ली Published by: गुलाम अहमद Updated Mon, 01 Jan 2024 05:55 AM IST
सार

अबूझमाड के वन क्षेत्रों में 237 गांव आते हैं, जहां रहने वाले लगभग 35,000 लोगों की आबादी मुख्यत: आदिवासी हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में केंद्रीय या राज्य पुलिसबल का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। कहा जाता है कि सशस्त्र माओवादी कैडर राज्य के दक्षिण बस्तर क्षेत्र में ओडिशा से लगती सीमा के रास्ते इधर-उधर आते-जाते रहते हैं और प्रशिक्षण भी चलता रहता है।
 

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Govt strategy to demolish maoist network from Naxal stronghold of Abujhmad at Odisha-Chhattisgarh
सांकेतिक तस्वीर (फाइल फोटो) - फोटो : Agency (File Photo)

विस्तार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हाल में कहा था कि सरकार नक्सलवाद पर नकेल कसने में जुटी है और ये समस्या खात्मे के कगार पर पहुंच चुकी है। इसी क्रम में बचे-खुचे नक्सली गढ़ों में आखिरी चरण के अभियान को गति देने के लिए करीब 3,000 बीएसएफ जवानों को ओडिशा से छत्तीसगढ़ भेजा जा रहा है। आधिकारिक सूत्रों के मुताबिक, बीएसएफ की इन तीन बटालियनों के अलावा इतनी ही आईटीबीपी इकाइयां भी अबूझमाड़ के नक्सली गढ़ में आगे बढ़ेंगी।

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गृह मंत्री शाह ने एक दिसंबर को बीएसएफ की स्थापना की 59वीं वर्षगांठ पर जवानों को संबोधित करते हुए कहा था कि वामपंथी उग्रवाद पर बीएसएफ, सीआरपीएफ और आईटीबीपी जैसे बलों के आखिरी प्रहार की प्रक्रिया जारी है। सुरक्षा प्रतिष्ठान से जुड़े सूत्रों ने बताया कि सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) को छत्तीसगढ़ के नारायणपुर जिले में छह नए सीओबी या कंपनी ऑपरेटिंग बेस बनाने का निर्देश दिया गया है, जिसमें शुरुआत में ओडिशा के मलकानगिरी में स्थित अपनी एक बटालियन को अंतर-राज्य सीमा के पार ले जाया जाएगा। बीएसएफ की एक बटालियन में 1,000 से अधिक जवान होते हैं।
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अभी पुलिस का कोई स्थायी ठिकाना नहीं
अबूझमाड के वन क्षेत्रों में 237 गांव आते हैं, जहां रहने वाले लगभग 35,000 लोगों की आबादी मुख्यत: आदिवासी हैं। फिलहाल इस क्षेत्र में केंद्रीय या राज्य पुलिसबल का कोई स्थायी ठिकाना नहीं है। कहा जाता है कि सशस्त्र माओवादी कैडर राज्य के दक्षिण बस्तर क्षेत्र में ओडिशा से लगती सीमा के रास्ते इधर-उधर आते-जाते रहते हैं और प्रशिक्षण भी चलता रहता है।
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सीमावर्ती क्षेत्र पर खास निगरानी...
एक सुरक्षा अधिकारी ने कहा कि नक्सली ओडिशा के मलकानगिरी, कोरापुट और कंधमाल जैसे जिलों में आने-जाने के लिए छत्तीसगढ़ के बस्तर गलियारे का उपयोग कर रहे हैं। इसलिए केंद्रीय बलों को सीमावर्ती क्षेत्र पर अधिक फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस बनाने को कहा गया है। जनवरी में विभिन्न एजेंसियों की बैठक के दौरान छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोध अभियान तेज करने पर रणनीति बनेगी जिसे कगार नाम दिया जा सकता है।

सघन क्षेत्रों की तरफ बढ़ने का निर्देश
सूत्रों ने बताया कि छत्तीसगढ़ के नारायणपुर, राजनांदगांव और कोंडागांव जिलों में अभी भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) की करीब आठ बटालियन तैनात हं, और इन्हें अबूझमाड़ के सघन क्षेत्रों में आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया है। नारायणपुर जिले में करीब 4,000 वर्ग किमी का वन क्षेत्र है, जिसे सशस्त्र नक्सली कैडरों का गढ़ माना जाता है।


आखिरी गढ़ तक सिमटी ताकत, खात्मे के लिए बुनियादी ढांचे का निर्माण
अधिकारियों के मुताबिक, दंतेवाड़ा, सुकमा, बीजापुर से लेकर नारायणपुर और कोंडागांव और आगे उत्तर में कांकेर जिलों वाले बस्तर क्षेत्र ही माओवादियों का आखिरी गढ़ है और इनकी बची-खुची यहीं तक सिमटी हुई है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, इन गढ़ों को ध्वस्त करने के लिए पूरी ताकत इस्तेमाल के साथ बुनियादी ढांचे का भी निर्माण किया जा रहा है ताकि राज्य सरकार विकास कार्यों की शुरुआत कर सके।

10 साल में 52 फीसदी घटी नक्सली हिंसा की घटनाएं

  • गृह मंत्रालय के मुताबिक, पिछले 10 वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 52 फीसदी की कमी आई है।
  • इस दौरान मौतों का आंकड़ा 70 फीसदी तक घटा और प्रभावित जिलों की संख्या 96 से घटकर 45 बची।
  • वामपंथी उग्रवाद प्रभावित थाना क्षेत्रों की संख्या 495 से 176 रह गई। ओडिशा में सिर्फ 242 सक्रिय कैडर बचे।
  • ओडिशा के सक्रिय कैडर में सिर्फ 13 ओडिशा के है, शीर्ष और मध्य स्तर के बाकी सभी कमांडर छत्तीसगढ़ के हैं।
  • छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य स्पेशल जोनल कमेटी के नेतृत्व में लगभग 800-900 कैडर अभी भी सक्रिय हैं।
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