अपनी जेब से नहीं देगीं, कर्ज माफी की रकम आम आदमी से ही वसूलेंगी सरकारें
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यूपी के बाद अब महाराष्ट्र सरकार ने भी किसानों के कर्ज माफी की घोषणा कर दी है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने किसानों के साथ बैठक में एक सिरे से सभी किसानों का कर्ज माफ करने का ऐलान किया है, हालांकि अभी तक यह तय नहीं हो पाया है कि अमीर किसानों को भी इस दायरे में रखा जाएगा या नहीं।
वहीं, महाराष्ट्र से पहले यूपी सरकार भी किसानों के एक लाख तक के कर्ज माफी की घोषणा कर चुकी है। खास बात ये है कि महाराष्ट्र में किसानों का कर्ज माफ करने से राज्य सरकार पर कम से कम एक लाख करोड़ तक का भार पड़ेगा जबकि यूपी सरकार तो पहले ही 36 हजार करोड़ का भार उठाने की बात कह चुकी है।
कर्ज माफी की इस राजनीति में बड़ा सवाल ये ही है कि आखिर सरकार किसानों का कर्ज माफ करने के लिए इतनी बड़ रकम का इंतजाम कैसे करेंगी। क्योंकि केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो दो दिन पहले साफ कर दिया है कि कर्ज माफी के मामले में केंद्र सरकार राज्य सरकारों की कोई भी मदद करने में असमर्थ है।
इसके लिए फंड जुटाने का इंतजाम राज्य सरकार को अपने स्तर पर ही करना होगा। ऐसे में सवाल ये है कि क्या सरकार अपने वित्तीय बजट में से रकम निकालकर इसकी भरपाई करेंगी या फिर अन्य वित्तीय संसाधनों से इसके लिए रकम जुटाई जाएगी। सवाल ये भी है कि कहीं सरकारें इस कर्ज माफी का बोझ आम आदमी की जेब पर तो नहीं डालेंगी?
जान लें कर्ज माफी का असली गणित
हम इस मुद्दे पर आगे कोई राय रखें उससे पहले यह जान लेना जरूरी है कि राज्य सरकार की आय के संसाधन क्या हैं और किसानों के कर्जे का गणित क्या है? राज्य सरकारों की आय के कुछ सीमित संसाधन होते हैं, मसलन राजस्व वसूली, स्टांप ड्यूटी, कुछ टैक्स, आबकारी, खनन, वाहनों के रजिस्ट्रेशन से मिलने वाला शुल्क आदि।
इनमें से कुछ टैक्स परोक्ष होते हैं कुछ अपरोक्ष। जानकारों की मानें तो सरकार जो लोन माफ करती हैं वो बैंकों का होता है और राज्य सरकारों को सीधे बैंकों का लोन माफ करने का कोई अधिकार नहीं होता। राज्य सरकारें सिर्फ कोओपरेटिव बैंकों का लोन ही माफ कर सकती हैं। या फिर राज्य सरकार सहकारी समितियों का लोन माफी कर सकती हैं जो किसानों को काफी कम ब्याज दर पर दिया जाता है। जबकि ज्यादातर किसान बैंकों से किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) के जरिए लोन लेते हैं जिसे एक साल में जमा करना होता है।
ऐसे में लोन माफी की घोषणा के बाद सीधा सवाल ये है कि किसान के लोन की रकम को जमा करने का जिम्मा राज्य सरकार के मत्थे आ जाता है। केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का दो दिन पहले आया बयान भी इसी कड़ी का हिस्सा है जिसमें उन्होंने राज्यों को सीधे इस जिम्मेदारी को उठाने की हिदायत दे डाली।
यहां से हो सकती है भरपाई
जानकारों की मानें तो कर्ज माफी का यह बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ने की पूरी संभावना है। उसकी बड़ी वजह है केंद्र सरकार के हाथ खड़े करना। अगर केंद्र सरकार इसमें राज्यों को कुछ सहयोग करती तो राज्यों की समस्या कुछ हल हो सकती थी, लेकिन केंद्र को इस बात का पूरा यकीन है कि अगर वह किसी एक राज्य की मदद के लिए हाथ बढ़ाता है तो अन्य राज्यों में भी तुरंत ऐसी मांगें शुरू हो जाएंगी।
तमिलनाडु के किसान तो लंबे समय से इस मुद्दे को लेकर दिल्ली में ही आंदोलन कर रहे हैं लेकिन सरकार उनकी किसी मांग पर कान धरने को तैयार ही नहीं है। ऐसे में गेंद घूम फिर कर फिर राज्य सरकारों के पाले में आती है। जिसमें राज्यों को खुद ही अपने संसाधनों के बलबूते लोन माफी की रकम का इंतजाम करना होगा।
जानकारों की मानें तो इसके लिए सरकार कुछ टैक्सों में आंशिक बढोत्तरी की घोषणा कर सकती है। इसके अलावा आबकारी और स्टांप ड्यूटी जैसे टैक्सों में भी कुछ इजाफा किया जा सकता है। राजस्व वसूली के लिए भी सरकार अपने विभागों का टारगेट बढ़ा सकती है जिसका असर भी आम आदमी की जेब पर पड़ना तय है।
एक संभावना ये भी है कि आम आदमी को मिलने वाली सुविधाओं में कुछ कटौती कर सरकार भी इसकी भरपाई कर सकती है। हालांकि यूपी सरकार ने इसके लिए किसान बांड जारी करने की बात कही है लेकिन इसका कोई खास फायदा मिलने की संभावना कम ही है।