सेवानिवृत्त राजभाषा अधिकारियों की मांग, हिंदी और प्रादेशिक भाषाओं में कामकाज को बढ़ावा दे सरकार
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भारत सरकार के महत्वपूर्ण संस्थानों और बैंकिंग प्रतिष्ठानों के अवकाश प्राप्त शीर्ष राजभाषा अधिकारियों ने 'हिंदी पखवाड़ा' और 'हिंदी मास' की पूर्व संध्या पर शनिवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मांग की कि वे संविधान की भावना के अनुरूप राजभाषा नीति का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराएं और पूरे देश में अंग्रेजी के बजाय हिंदी तथा प्रादेशिक भाषाओं में कामकाज का चलन बढ़ाने के लिए आवश्यक कदम उठाएं।
मांग करनेवाले अधिकारियों में केंद्रीय अनुवाद ब्यूरो (राजभाषा विभाग) के पूर्व निदेशक डॉ श्रीनारायण सिंह समीर, भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड के पूर्व राजभाषा प्रमुख अमजद अली खान, केआईओसीएल के पूर्व राजभाषा प्रमुख डॉ मंगल प्रसाद, भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व महा प्रबंधक डॉ रमाकांत गुप्ता, पंजाब नेशनल बैंक के पूर्व राजभाषा प्रमुख श्रीलाल प्रसाद 'अमन', गेल इंडिया लिमिटेड, मुंबई क्षेत्र के पूर्व राजभाषा प्रमुख श्री उदय कुमार सिंह, सिंडिकेट बैंक के पूर्व राजभाषा प्रमुख डॉ श्याम किशोर पांडेय और यूनियन बैंक की पूर्व राजभाषा प्रमुख डॉ नीरा प्रसाद शामिल हैं।
शीर्ष पूर्व अधिकारियों ने बेंगलूरू में जारी एक बयान में कहा कि भूमंडलीकरण, सूचनाक्रांति और बाजारवाद के कारण आजकल पूरी दुनिया एक दूसरे के पड़ोस में सिमट आई है। इस ' ग्लोबल विलेज.' में वही टिक पाएगा, जिसके पास अनुसंधान की अंतर्दृष्टि एवं विकास के लिए पूंजी होगी। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए अब यह जरूरी हो गया है कि भारत में अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी और देशी भाषाओं को बढ़ावा दिया जाए।
राजभाषा हिंदी के पूर्व दिग्गज अधिकारियों ने अपने बयान में कहा कि भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है और मौलिक विचारों की उद्भावना हमेशा अपनी भाषा में ही संभव होती है। भारत विदेशी भाषा का बोझ सदियों से झेलता आ रहा है। किंतु आज के बदलते भारत में आम आदमी की भाषाई आकांक्षा और सपनों को साकार करने के लिए यह जरूरी हो गया है कि सरकार संविधान के प्रावधानों का पालन सुनिश्चित करे और राजभाषा नीति का कड़ाई से पालन कराए। तभी सरकार के महत्वपूर्ण फैसलों का लाभ देश के आम जन तक पहुंच पाएगा।
बयान में पूर्व राजभाषा अधिकारियों ने प्रधानमंत्री से मांग की कि बहुभाषी भारत की भावात्मक एकता और अखंडता के लिए हिंदी का अधिक से अधिक प्रयोग सुनिश्चित किया जाए। इस हेतु हिंदीतर राज्यों में सरकार की प्रेरणा, प्रोत्साहन, प्रशिक्षण और पुरस्कार की नीति का विस्तार किया जाए एवं इन्हें केवल सरकारी कार्मिकों तक सीमित रखने के बजाए जन साधारण तक पहुंचाया जाए।
बयान में "यूनेस्को के एटलस औफ द वर्ल्ड्स लैंग्वेजेज इन डेंजर" का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारत में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण जनपदीय भाषाएं और बोलियां तेजी से खत्म हो रही हैं। 1961 की जनगणना के अनुसार भारत में 1652 भाषाएं और बोलियां प्रचलन में थीं, जबकि 2001 की जनगणना के मुताबिक देश में मात्र 114 भाषाएं और 234 बोलियाँ ही प्रचलन में बची हैं।
जाहिर है कि भाषाओं के क्षरण के साथ हमारी सांस्कृतिक विरासत और विशिष्टताएं भी खत्म हो रही हैं। यह भारत के बहुलतावादी समाज के लिए बहुत चिंताजनक है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि सरकार भारत की भाषा - समस्या के प्रति गंभीर बने और वह हर संभव कदम उठाए, जिससे कि केंद्रीय सरकार के कामकाज हिंदी में हों और प्रादेशिक सरकारों के कामकाज प्रादेशिक भाषाओं में।
बयान के अनुसार भारतीय समाज के लिए यह कितना विडंबनापूर्ण है कि यहां अंग्रेजी प्रतिष्ठा की भाषा समझी जाती है, जबकि हिंदी सहित तमाम भारतीय भाषाएँ पिछड़े विचार और चिंतन की भाषा मानी जाती हैं। यह प्रवृत्ति अगर समय रहते खत्म नहीं की गई तो देश भाषाई और सांस्कृतिक गुलामी के दलदल में फंस जाएगा। बयान में याद दिलाया गया है कि भाषा मनुष्य की अभिव्यक्ति का माध्यम होती है। साथ ही अपने वक्ता समाज की संस्कृति का वाहक भी।
बयान में प्रधानमंत्री से यह भी अपील की गई है कि एक सुविचारित नीति के तहत सभी हिंदी प्रदेशों में माध्यमिक शिक्षा तक देश के दक्षिणी राज्यों की किसी एक भाषा का तीसरी भाषा के रूप में अध्ययन अनिवार्य किया जाए ताकि पूरे देश में भाषाई समरसता और अपनत्व का भाव पैदा हो।
बयान में शीर्ष पूर्व अधिकारियों ने भारत में अंग्रेज़ी के बढ़ते वर्चस्व और देशी भाषाओं के प्रति हीन भावना को भारत के लोगों में अंतर्दृष्टि तथा मौलिक उद्भावना के विकास के लिए खतरनाक बताया है। साथ ही प्रधानमंत्री से अपील की है कि वे नया भारत और विकसित भारत बनाने के लिए हिंदी और अन्य प्रांतीय भाषाओं के प्रयोग और विकास की दिशा में जरूरी निर्णय लें ।