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किसान आंदोलन में 'मीर जाफर' खोज रही है सरकार, इसलिए दे रही है बातचीत के लिए लंबी तारीखें

Thu, 31 Dec 2020 07:31 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Harendra Chaudhary Updated Thu, 31 Dec 2020 07:31 PM IST
सार

योगेंद्र यादव कहते हैं कि तीन कानून, बाजार व जमीन पर किसानों के अधिकार तक को समाप्त कर देंगे। उन्होंने आरोप लगाया कि मोदी सरकार का एमएसपी व सरकारी खरीद जारी रहने का आश्वासन झूठा साबित हो रहा है...

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Government is searching the rebel in Farmers Protest, giving long date to derail the talks
गाजीपुर बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसान - फोटो : अमर उजाला (फाइल)

विस्तार

किसान आंदोलन चल रहा है और यह आगे भी जारी रहेगा। केंद्र सरकार इस आंदोलन में 'मीर जाफर' को ढूंढ रही है, मगर अभी तक नहीं मिला। एक वार्ता खत्म होते ही कई दिनों बाद की तारीख क्यों दे दी जाती है। जब किसानों ने कह दिया है कि तीनों कानूनों को वापस लेना ही होगा तो अब लंबी तारीखों का क्या औचित्य है।

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एआईकेएससीसी से जुड़े किसान नेता बताते हैं, केंद्र सरकार की मंशा है कि आंदोलन को लंबा खींचकर कहीं से कोई 'मीर जाफर' बाहर लाया जाए। ये गलतफहमी सरकार को कई दिनों से है कि किसान आंदोलन को इसके नेताओं में फूट डालकर खत्म करा दिया जाए।
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एआईकेएससीसी के वरिष्ठ सदस्य अविक साहा कहते हैं, सरकार ने आंदोलन को तोड़ने के लिए पहले दिन से ही साजिश रचनी शुरू कर दी थी। जब कोई 'मीर जाफर' है ही नहीं तो वह मिलेगा कैसे। केंद्र सरकार को चाहिए कि वह तीनों कानूनों को बिना किसी शर्त के वापस ले ले। आने वाले दिनों में किसान आंदोलन तेजी से बढ़ेगा।
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एआईकेएससीसी के किसान नेता हन्ना मौला, जो कि केंद्र सरकार के साथ हो रही वार्ता में शामिल रहे हैं, कहते हैं कि सरकार की नीयत साफ नहीं है। अगर नीयत साफ होती और सरकार किसानों की परेशानी को समझती तो वार्ता के बाद लंबी तारीखों का एलान नहीं करती। जब सरकार के बड़े बड़े मंत्री कह रहे हैं कि हम अन्नदाता का सम्मान करते हैं तो उनकी बात क्यों नहीं मान लेते।

देश पर जब कभी संकट आया है, किसान ने तन-मन-धन से साथ दिया है। आज किसान के जीवन पर खतरा है, उसकी जमीन हड़पी जा सकती है तो ऐसे में सरकार उनकी मदद करने के लिए आगे नहीं आ रही। मन में खोट है, इसलिए सरकार बार-बार वार्ता कर रही है।

अविक साहा कहते हैं, सरकार ने प्रयास किया है कि किसान आंदोलन के कुछ संगठनों को अपने पक्ष में कर आंदोलन को तुड़वा दिया जाए। कृषि मंत्री की वार्ता के बाद किसान नेताओं से मनमाना बयान दिलाने के लिए केंद्र सरकार ने कोशिश की है।

ये कानून, कृषि बाजार, भूमि और खाद्यान्न श्रृंखला पर कॉरपोरेट नियंत्रण स्थापित करने में मदद करेंगे। यदि सरकार चाहती है कि मंडी, खेती व किसानों की आय में सुधार हो तो पहले इन कानूनों को रद्द करना होगा। किसान नेता चार जनवरी की वार्ता की तैयारी कर रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आंदोलन कमजोर पड़ जाएगा। ये रोजाना बढ़ रहा है और आगे भी बढ़ता जाएगा।

योगेंद्र यादव कहते हैं कि तीन कानून, बाजार व जमीन पर किसानों के अधिकार तक को समाप्त कर देंगे। एमएसपी का कानूनी अधिकार तो मिलकर रहेगा। यादव ने आरोप लगाया कि मोदी सरकार का एमएसपी व सरकारी खरीद जारी रहने का आश्वासन झूठा साबित हो रहा है।

एआईकेएससीसी के वर्किंग ग्रुप ने कहा है कि भारत सरकार द्वारा तीन कानूनों के रद्द करने की जगह किसानों से विकल्प सुझाने की अपील एक असंभव प्रस्ताव है, क्योंकि इन कानूनों को केन्द्र ने ही अलोकतांत्रिक ढंग से किसानों पर थोपा था। ये कानून खेती के बाजार, किसानों की जमीन और खाद्यान्न श्रृंखला पर कॉरपोरेट तथा विदेशी कंपनियों का नियंत्रण स्थापित करेंगे। इन्हें रद्द किए बिना मंडियों और कृषि प्रक्रिया में किसान पक्षधर परिवर्तनों व कृषि आय दोगुना करने की संभावना शून्य है। एआईकेएससीसी ने कहा कि सरकार को अपना अड़ियल रवैया तथा शब्दों का जाल बिछाना छोड़ देना चाहिए, क्योंकि सभी प्रक्रियाएं उसी के हाथ में है।


एमएसपी को कानूनी अधिकार देकर सरकार को सुनिश्चित करना होगा कि जिस धान की एमएसपी 1868 रुपये प्रति क्विंटल है उसे आज निजी व्यापारी 900 रुपये में खरीद रहे हैं। निजीकरण के पक्ष वाले मंडी कानून-2020 ने धान की एमएसपी व वास्तविक खरीद में फर्क को पिछले साल 0.67 फीसदी से घटाकर 0.48 फीसदी कर दिया है। सरकार को आने वाले दिनों में व्यापक जनविरोध का सामना करना पड़ेगा। विभिन्न राज्यों में किसान यात्राएं और जिला स्तरीय विरोध सभाएं आयोजित करने की तैयारी पूरी हो चुकी है।

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